नेपाल की सत्ता की दहलीज पर बालेन शाह: पुराने दिग्गजों का सूपड़ा साफ, मधेसी चेहरे के हाथों में देश की कमान की तैयारी!
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संवाद 24 नई दिल्ली । हिमालयी राष्ट्र नेपाल की राजनीति उस मोड़ पर आ खड़ी हुई है, जहाँ से वापसी का रास्ता पुराने ढर्रे वाली पार्टियों के लिए बंद नजर आ रहा है। नेपाल के आम चुनावों के जो नतीजे और रुझान सामने आ रहे हैं, उन्होंने काठमांडू के मेयर और युवाओं के ‘पोस्टर बॉय’ बालेन शाह को देश के अगले प्रधानमंत्री पद का सबसे मजबूत दावेदार बना दिया है। यदि समीकरण इसी तरह बने रहे, तो बालेन शाह नेपाल के इतिहास के पहले मधेसी प्रधानमंत्री बनकर एक नया कीर्तिमान स्थापित करेंगे।
भले ही अंतिम गठबंधन और शपथ ग्रहण की प्रक्रिया अभी बाकी है, लेकिन जमीन पर बालेन शाह की लहर ने यह साफ कर दिया है कि नेपाल की जनता अब बदलाव का मन बना चुकी है।
नेपाली राजनीति का नया ‘पावर सेंटर’
बालेन शाह, जो पेशे से एक स्ट्रक्चरल इंजीनियर हैं, ने निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर अपनी यात्रा शुरू की थी। काठमांडू के मेयर पद पर रहते हुए उन्होंने जिस तरह से शहर की व्यवस्था को सुधारा, उसने उन्हें रातों-रात पूरे देश का हीरो बना दिया। आज जब संसदीय चुनाव के परिणाम घोषित हो रहे हैं, तो बालेन के समर्थित उम्मीदवारों और उनकी विचारधारा वाली ताकतों ने नेपाली कांग्रेस और कम्युनिस्ट पार्टियों के मजबूत किलों को ढहा दिया है। राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि बालेन शाह की सबसे बड़ी ताकत उनका ‘एंटी-एस्टेब्लिशमेंट’ होना है। जनता दशकों से वही पुराने चेहरे और उनके बीच के सत्ता संघर्ष को देख रही थी। बालेन ने एक ऐसा विकल्प दिया है जो तकनीक, पारदर्शिता और राष्ट्रवाद का मिश्रण है।
मधेसी पहचान और राष्ट्रीय एकता
बालेन शाह का मधेसी मूल का होना इस पूरी चुनावी प्रक्रिया का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है। नेपाल की राजनीति में लंबे समय से ‘पहाड़ी बनाम मधेसी’ का विवाद रहा है। बालेन ने इस खाई को पाटने का काम किया है। उन्होंने खुद को केवल मधेस का नेता नहीं, बल्कि पूरे नेपाल का नेता साबित किया है। यदि वे प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुँचते हैं, तो यह नेपाल के सामाजिक ताने-बाने के लिए एक बहुत बड़ा और सकारात्मक संदेश होगा।
चुनावी समीकरण और प्रधानमंत्री पद की दौड़
वर्तमान रुझानों के अनुसार, किसी भी एक पार्टी को स्पष्ट बहुमत मिलता नहीं दिख रहा है। ऐसे में बालेन शाह ‘किंगमेकर’ से आगे बढ़कर खुद ‘किंग’ बनने की स्थिति में आ गए हैं। कई छोटी पार्टियां और निर्दलीय सांसद बालेन के नाम पर एकजुट हो रहे हैं। सूत्रों की मानें तो काठमांडू के गलियारों में गठबंधन की बातचीत तेज हो गई है और बालेन शाह के नाम पर सहमति बनने के आसार 90% से भी ज्यादा हैं।
पड़ोसी देशों की धड़कनें तेज
बालेन शाह की संभावित ताजपोशी ने भारत और चीन जैसे पड़ोसी देशों को भी सतर्क कर दिया है। बालेन शाह अपनी ‘नेपाल प्रथम’ (Nepal First) नीति के लिए जाने जाते हैं। वे न तो पूरी तरह भारत के पक्ष में झुकते दिखते हैं और न ही चीन के। उनका रुख बेहद कूटनीतिक और देशहित को सर्वोपरि रखने वाला है। भारत के लिए वे एक सांस्कृतिक सेतु हो सकते हैं, जबकि चीन के लिए वे एक कठिन सौदेबाज साबित हो सकते हैं।
चुनौतियों का हिमालय
प्रधानमंत्री पद की कगार पर खड़े बालेन के सामने चुनौतियों का भी हिमालय खड़ा है। नेपाल की गिरती अर्थव्यवस्था, युवाओं का पलायन और भ्रष्टाचार कुछ ऐसे मुद्दे हैं जिन पर उन्हें तुरंत काम करना होगा। इसके अलावा, पुरानी पार्टियों के चतुर राजनेता उन्हें घेरने की हर संभव कोशिश करेंगे।
निष्कर्ष:
नेपाल आज एक ऐतिहासिक बदलाव के मुहाने पर खड़ा है। बालेन शाह का प्रधानमंत्री पद का प्रमुख उम्मीदवार बनना इस बात का प्रमाण है कि अब राजनीति केवल विरासत से नहीं, बल्कि काम और विजन से चलेगी। काठमांडू की सड़कों पर उमड़ा जनसैलाब चिल्ला-चिल्ला कर कह रहा है कि ‘नया नेपाल’ तैयार है। अब बस कुछ औपचारिकताओं का इंतजार है, जिसके बाद बालेन शाह देश की कमान संभाल सकते हैं।






