ट्रंप की ईरान रणनीति पर उठे सवाल : ईरान को दबाने की कोशिश में उलझा अमेरिका
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संवाद 24 नई दिल्ली । मध्य-पूर्व में जारी तनाव अब एक बड़े भू-राजनीतिक संकट का रूप लेता जा रहा है। अमेरिका और इज़राइल द्वारा ईरान के खिलाफ शुरू किए गए सैन्य अभियान के बाद हालात लगातार बिगड़ते दिख रहे हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की आक्रामक रणनीति से युद्ध थमने के बजाय और व्यापक होता नजर आ रहा है, जिससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी चिंता बढ़ गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रंप प्रशासन की योजना ईरान को जल्दी झुकाने में सफल नहीं हो पाई और अब यह संघर्ष पूरे क्षेत्र को अस्थिर करने की दिशा में बढ़ रहा है।
युद्ध की शुरुआत और बढ़ता सैन्य टकराव
मध्य-पूर्व में मौजूदा संघर्ष तब तेज हुआ जब अमेरिका और इज़राइल ने ईरान के सैन्य और परमाणु ठिकानों को निशाना बनाते हुए बड़े पैमाने पर हवाई हमले किए। इस अभियान में ईरान के कई महत्वपूर्ण सैन्य ढांचे को नुकसान पहुंचाने का दावा किया गया। इसके बाद ईरान ने भी जवाबी कार्रवाई करते हुए अमेरिकी ठिकानों और सहयोगी देशों में मिसाइल और ड्रोन हमले किए। रिपोर्टों के अनुसार इस संघर्ष के दौरान कई देशों में अमेरिकी सैन्य ठिकाने भी निशाने पर आए हैं। खाड़ी क्षेत्र में स्थित कुछ बेसों पर हमलों की खबरें सामने आईं, जिससे क्षेत्रीय तनाव और बढ़ गया। इस टकराव के कारण लेबनान, इज़राइल और खाड़ी देशों तक संघर्ष का असर देखने को मिल रहा है।
ट्रंप की कड़ी चेतावनी और ‘बिना शर्त समर्पण’ की मांग
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस पूरे मामले में बेहद सख्त रुख अपनाया है। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि ईरान को “बिना शर्त समर्पण” करना होगा, अन्यथा उसके सैन्य ढांचे को पूरी तरह नष्ट कर दिया जाएगा। ट्रंप ने यह भी संकेत दिया कि यदि जरूरत पड़ी तो ईरान के नेतृत्व को खत्म करने तक की कार्रवाई की जा सकती है। ट्रंप के इस रुख ने कूटनीतिक समाधान की संभावनाओं को और जटिल बना दिया है। कई अंतरराष्ट्रीय विश्लेषकों का मानना है कि ऐसी कठोर भाषा और सैन्य कार्रवाई से बातचीत के रास्ते लगभग बंद हो जाते हैं और संघर्ष लंबा खिंच सकता है।
ईरान का जवाब: दबाव में झुकने से इनकार
ईरान ने भी अमेरिका की मांगों को खारिज कर दिया है। ईरानी नेतृत्व ने स्पष्ट किया कि देश किसी भी बाहरी दबाव के सामने झुकेगा नहीं। साथ ही उन्होंने कहा कि अगर उनके देश या सहयोगियों पर हमले जारी रहे तो जवाबी कार्रवाई भी जारी रहेगी। हालांकि ईरान के राष्ट्रपति ने पड़ोसी खाड़ी देशों को हुए नुकसान के लिए खेद भी जताया और संकेत दिया कि यदि ईरान पर हमला नहीं होता तो वह क्षेत्र में हमले रोक सकता है। इसके बावजूद दोनों पक्षों के बीच तनाव कम होने के बजाय और बढ़ता जा रहा है।
वैश्विक अर्थव्यवस्था पर भी असर
इस संघर्ष का असर केवल सैन्य मोर्चे तक सीमित नहीं है। फारस की खाड़ी के पास स्थित होरमुज जलडमरूमध्य में तनाव बढ़ने से वैश्विक तेल आपूर्ति पर खतरा पैदा हो गया है। दुनिया के लगभग 20 प्रतिशत तेल का परिवहन इसी मार्ग से होता है, इसलिए वहां अस्थिरता से तेल की कीमतों में तेज उछाल देखा गया है। तेल बाजार में अस्थिरता और जहाजों की आवाजाही रुकने से अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर भी दबाव बढ़ा है। कई देशों ने अपने जहाजों को इस क्षेत्र से दूर रखने का फैसला किया है, जिससे वैश्विक ऊर्जा बाजार में अनिश्चितता और बढ़ गई है।
क्या अमेरिका की रणनीति उलटी पड़ रही है?
कुछ अमेरिकी खुफिया और रणनीतिक रिपोर्टों में यह संकेत मिला है कि भारी सैन्य कार्रवाई के बावजूद ईरान की राजनीतिक व्यवस्था पूरी तरह कमजोर नहीं हुई है। बल्कि नए अंतरिम नेतृत्व की व्यवस्था बनाकर ईरान ने अपनी शासन व्यवस्था को बनाए रखा है। विश्लेषकों का मानना है कि यदि यह युद्ध लंबा खिंचता है तो अमेरिका को सैन्य संसाधनों और अंतरराष्ट्रीय समर्थन दोनों के मोर्चे पर चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है। इसके अलावा क्षेत्रीय सहयोगी देशों में भी इस संघर्ष को लेकर असंतोष बढ़ने की आशंका जताई जा रही है।
आगे क्या?
मध्य-पूर्व में जारी यह संघर्ष फिलहाल थमता हुआ नजर नहीं आ रहा। दोनों पक्षों के बीच बयानबाजी और सैन्य कार्रवाई लगातार तेज हो रही है। ऐसे में दुनिया की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि क्या आने वाले दिनों में कूटनीतिक प्रयास शुरू होंगे या यह टकराव एक बड़े क्षेत्रीय युद्ध में बदल सकता है।






