वैश्विक तेल संकट: कुवैत ने कच्चे तेल के उत्पादन में की भारी कटौती
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संवाद 24 नई दिल्ली । मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव और ईरान के साथ जारी संघर्ष के बीच वैश्विक तेल बाजार से एक बड़ी और चिंताजनक खबर सामने आ रही है। दुनिया के पांचवें सबसे बड़े तेल उत्पादक देश कुवैत ने अपने कच्चे तेल के उत्पादन और रिफाइनिंग कार्यों में भारी कटौती करने का आधिकारिक निर्णय लिया है। कुवैत पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन (KPC) द्वारा की गई इस अचानक घोषणा ने पूरी दुनिया में खलबली मचा दी है, क्योंकि इससे आने वाले दिनों में कच्चे तेल की कीमतों में जबरदस्त उछाल आने की आशंका बढ़ गई है।
होरमुज जलडमरूमध्य में तनाव है मुख्य कारण
इस कटौती का सबसे बड़ा कारण सामरिक रूप से महत्वपूर्ण ‘होरमुज जलडमरूमध्य’ (Strait of Hormuz) में जहाजों की आवाजाही का ठप होना है। कुवैत का कहना है कि ईरान द्वारा कुवैत के खिलाफ जारी “आक्रामक रुख” और इस समुद्री रास्ते से गुजरने वाले जहाजों को दी जा रही धमकियों के कारण उसने यह ‘एहतियाती कदम’ उठाया है। होरमुज की खाड़ी दुनिया के कुल तेल व्यापार का लगभग पांचवां हिस्सा संभालती है, और वर्तमान में वहां युद्ध जैसी स्थिति के कारण टैंकरों का परिचालन लगभग बंद हो गया है।
स्टोरेज क्षमता हुई खत्म, उत्पादन रोकना मजबूरी
जानकारों के मुताबिक, कुवैत के पास अब कच्चे तेल को स्टोर करने के लिए जगह नहीं बची है। जब तक जहाजों के जरिए तेल का निर्यात नहीं होगा, तब तक नया उत्पादन करना संभव नहीं है। शनिवार से कुवैत ने प्रतिदिन लगभग 1 लाख बैरल की कटौती शुरू की है, जिसे रविवार तक तीन गुना तक बढ़ाया जा सकता है। कुवैत की अल-ज़ौर, मीना अल-अहमदी और मीना अब्दुल्ला जैसी बड़ी रिफाइनरियों में भी प्रसंस्करण दर को कम कर दिया गया है।
ग्लोबल मार्केट पर क्या होगा असर?
इस खबर के बाहर आते ही वैश्विक बाजार में ब्रेंट क्रूड की कीमतें 93 डॉलर प्रति बैरल के करीब पहुंच गई हैं, जो पिछले दो वर्षों का उच्चतम स्तर है। कुवैत से पहले इराक ने भी अपने उत्पादन में 15 लाख बैरल की कटौती की थी, जबकि कतर ने अपने एलएनजी (LNG) निर्यात को रोक दिया है। यदि यह गतिरोध अगले दो-तीन हफ्तों तक जारी रहता है, तो सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) को भी मजबूरन अपना उत्पादन बंद करना पड़ सकता है, जिससे वैश्विक अर्थव्यवस्था में महंगाई का नया तूफान आ सकता है।
भारत के लिए बढ़ती चिंताएं
भारत अपनी जरूरत का लगभग 85% कच्चा तेल आयात करता है, जिसमें से एक बड़ा हिस्सा इसी क्षेत्र से आता है। तेल की कीमतों में वृद्धि से न केवल भारत का व्यापार घाटा बढ़ेगा, बल्कि घरेलू बाजार में पेट्रोल, डीजल और रसोई गैस की कीमतों पर भी सीधा असर पड़ेगा। हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि भारत के पास लगभग 40 दिनों का रणनीतिक तेल भंडार है, लेकिन यदि यह युद्ध लंबा खिंचता है, तो चुनौतियां गंभीर हो सकती हैं।






