ममता का ‘चुनावी’ प्रहार: चुनाव आयोग पर दीदी के तीखे तंज से सियासी गलियारों में भूचाल, क्या बदलेगा बंगाल का समीकरण?

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संवाद 24 पश्चिम बंगाल। राजनीति में एक बार फिर बयानबाजी का तूफान खड़ा हो गया है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने एक बार फिर केंद्रीय चुनाव आयोग (ECI) को अपने निशाने पर लेते हुए एक ऐसा बयान दिया है जिसने राज्य से लेकर देश की राजधानी तक सियासी हलचल तेज कर दी है। दीदी के इस ताजा कटाक्ष को न केवल एक विवाद के रूप में देखा जा रहा है, बल्कि इसे आने वाले चुनावों के लिए एक बड़े ‘पावर गेम’ के तौर पर भी विश्लेषित किया जा रहा है।

आयोग की निष्पक्षता पर सवाल: क्या कहा ममता बनर्जी ने?
कोलकाता में एक जनसभा को संबोधित करते हुए तृणमूल कांग्रेस (TMC) सुप्रीमो ममता बनर्जी ने चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए। उन्होंने संकेत दिया कि आयोग का झुकाव एक विशेष दिशा में है, जिससे स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव की लोकतांत्रिक प्रक्रिया प्रभावित हो रही है। ममता ने तंज कसते हुए कहा कि “लोकतंत्र की रखवाली करने वाली संस्थाएं अब निर्देश पर काम कर रही हैं।” उनके इस बयान के बाद भाजपा और अन्य विपक्षी दलों ने उन पर संवैधानिक संस्थाओं के अपमान का आरोप लगाते हुए मोर्चा खोल दिया है।

बंगाल में ‘दीदी बनाम आयोग’ का पुराना इतिहास
यह पहली बार नहीं है जब ममता बनर्जी और चुनाव आयोग के बीच तलवारें खिंची हों। 2021 के विधानसभा चुनावों के दौरान भी सुरक्षा बलों की तैनाती और मतदान के चरणों को लेकर ममता बनर्जी ने आयोग पर जमकर निशाना साधा था। राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि ममता बनर्जी अक्सर ऐसे बयान देकर अपनी छवि एक ‘फाइटर’ के रूप में पेश करती हैं जो दिल्ली के खिलाफ बंगाल के हक की लड़ाई लड़ रही हैं। इस बार भी उनका यह हमला वोट बैंक को एकजुट करने की एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा हो सकता है।

बीजेपी का पलटवार: ‘हार के डर से बहानेबाजी’
ममता बनर्जी के बयान के कुछ ही घंटों बाद पश्चिम बंगाल भाजपा इकाई ने कड़ा पलटवार किया। बीजेपी नेताओं का कहना है कि जब भी तृणमूल कांग्रेस को अपनी जमीन खिसकती नजर आती है, वे संवैधानिक संस्थाओं को बदनाम करना शुरू कर देते हैं। विपक्ष का आरोप है कि दीदी अपनी सरकार की नाकामियों और भ्रष्टाचार के मुद्दों से ध्यान भटकाने के लिए चुनाव आयोग को निशाना बना रही हैं।

लोकतंत्र के लिए क्या हैं इसके मायने?
चुनाव आयोग जैसे स्वतंत्र निकाय पर बार-बार उठते सवाल भारतीय लोकतंत्र की मजबूती के लिए चिंता का विषय हैं। जानकारों का कहना है कि अगर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच इसी तरह का टकराव जारी रहा, तो जनता का विश्वास इन संस्थाओं से कम हो सकता है। दूसरी ओर, टीएमसी समर्थकों का तर्क है कि संस्थाओं की पारदर्शिता सुनिश्चित करना विपक्ष का धर्म है।

आगे क्या?
ममता बनर्जी के इस बयान के बाद अब सबकी नजरें चुनाव आयोग की आधिकारिक प्रतिक्रिया पर टिकी हैं। क्या आयोग इस पर कोई नोटिस जारी करेगा? या फिर यह विवाद आने वाले चुनावों में एक बड़ा चुनावी मुद्दा बनेगा? बंगाल की तपती राजनीति में यह तो साफ है कि ‘खेला होबे’ का नारा अब नए रूप में सुनाई देने लगा है।

Madhvi Singh
Madhvi Singh

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