
संवाद 24 नई दिल्ली। भारतीय रक्षा क्षेत्र में आज एक ऐतिहासिक अध्याय जुड़ गया है। केंद्र सरकार ने भारतीय वायुसेना की मारक क्षमता को वैश्विक स्तर पर शीर्ष पर ले जाने के लिए 114 मल्टी-रोल लड़ाकू विमानों (MRFA) की खरीद के मेगा डिफेंस सौदे को औपचारिक मंजूरी की दिशा में बड़ा कदम बढ़ाया है। लगभग 3.25 लाख करोड़ रुपये की लागत वाला यह सौदा न केवल भारत की सीमाओं की सुरक्षा को अभेद्य बनाएगा, बल्कि ‘मेक इन इंडिया’ के तहत घरेलू रक्षा विनिर्माण को भी नई ऊंचाइयों पर ले जाएगा।
आसमान का नया सिकंदर: क्यों खास है यह डील?
सूत्रों के अनुसार, वायुसेना को लंबे समय से अपने बेड़े में लड़ाकू विमानों की घटती संख्या को पूरा करने के लिए आधुनिक विमानों की दरकार थी। फ्रांस के साथ हुए पिछले 36 राफेल विमानों के सौदे की सफलता के बाद, अब 114 अतिरिक्त उन्नत राफेल विमानों के लिए बातचीत अंतिम चरण में है। ये विमान अत्याधुनिक रडार सिस्टम, लंबी दूरी की मिसाइलों और इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर तकनीक से लैस होंगे, जो इन्हें दुश्मन के रडार की नजरों से बचकर सटीक हमला करने में सक्षम बनाते हैं।
सिर्फ हथियार नहीं, रोजगार का भी अंबार
इस सौदे की सबसे बड़ी खासियत इसका ‘ऑफसेट क्लॉज’ है। सरकार की योजना के मुताबिक, शुरुआती कुछ विमानों को छोड़कर बाकी सभी विमानों का निर्माण भारत में ही किया जाएगा। इसके लिए फ्रांसीसी कंपनी डसॉल्ट एविएशन भारतीय साझेदारों के साथ मिलकर प्लांट लगाएगी। इससे न केवल हजारों कुशल इंजीनियरों और तकनीशियनों को रोजगार मिलेगा, बल्कि भारत रक्षा निर्यात के क्षेत्र में भी एक बड़ा हब बनकर उभरेगा।
पड़ोसी देशों की उड़ी नींद
चीन और पाकिस्तान के साथ जारी सीमा तनाव के बीच, भारतीय वायुसेना का यह आधुनिकीकरण सामरिक संतुलन को पूरी तरह भारत के पक्ष में झुका देगा। रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि राफेल के नए बेड़े के आने के बाद भारत के पास ‘टू-फ्रंट वॉर’ यानी एक साथ दो मोर्चों पर युद्ध लड़ने की क्षमता कई गुना बढ़ जाएगी। विशेष रूप से हिमालयी क्षेत्रों में राफेल की कार्यक्षमता इसे दुनिया के सर्वश्रेष्ठ लड़ाकू विमानों की सूची में खड़ा करती है।
संसद से लेकर सड़कों तक चर्चा
जहाँ एक ओर रक्षा मंत्रालय इस कदम को ‘विकसित भारत’ के सपने की दिशा में अनिवार्य बता रहा है, वहीं विपक्षी खेमे ने इस भारी-भरकम बजट और पारदर्शिता को लेकर सवाल उठाए हैं। राज्यसभा में आज इस पर तीखी बहस देखने को मिली, लेकिन सरकार का रुख स्पष्ट है— ‘राष्ट्र की सुरक्षा के साथ कोई समझौता नहीं।’






