विकास की राह में अड़चनें और प्रशासन की ज़िम्मेदारी

संवाद 24 संवाददाता। कानपुर में जिलाधिकारी जितेंद्र प्रताप सिंह की अध्यक्षता में आयोजित उद्योग बंधु की बैठक एक बार फिर यह दिखाती है कि विकास केवल योजनाओं से नहीं, बल्कि उनके ईमानदार क्रियान्वयन से होता है। बैठक में उद्यमियों द्वारा उठाई गई समस्याएं सिर्फ व्यक्तिगत शिकायतें नहीं थीं, बल्कि पूरे औद्योगिक ढांचे की जमीनी सच्चाई को उजागर करती हैं।

दो वर्षों से बन रही सड़क, जो आज भी अधूरी है, यह बताती है कि योजनाएं कागज़ों पर कितनी तेज़ी से आगे बढ़ती हैं और ज़मीन पर कितनी धीमी। कोऑपरेटिव इस्टेट में अतिक्रमण का न हटना और ग्रीन बेल्ट पर अवैध कब्ज़े यह सवाल खड़ा करते हैं कि क्या प्रशासनिक आदेशों का वास्तव में पालन होता भी है या नहीं।

उद्यमी धीरेंद्र सिंह भदौरिया का मामला और भी गंभीर है, जहां यूपीसीडा से खरीदे गए 1060 वर्ग मीटर प्लॉट के बदले केवल 800 वर्ग मीटर ज़मीन मिली। यह केवल एक व्यक्ति का नुकसान नहीं है, बल्कि निवेशकों के विश्वास पर चोट है। ऐसे मामलों में जिलाधिकारी द्वारा शेष राशि वापस करने का निर्देश एक सकारात्मक कदम जरूर है, लेकिन इससे भी ज़रूरी है कि भविष्य में ऐसी स्थितियां पैदा ही न हों।

इसी तरह दादानगर-विजयनगर मार्ग, चकेरी औद्योगिक क्षेत्र, पनकी बाईपास और फजलगंज रोड जैसी जगहों पर बुनियादी ढांचे की समस्याएं यह बताती हैं कि औद्योगिक विकास सिर्फ फैक्ट्रियां लगाने से नहीं होता, बल्कि सड़क, जल निकासी, अतिक्रमण मुक्त क्षेत्र और पारदर्शी प्रशासन से होता है।

बैठक में दिए गए निर्देश — जैसे 31 जनवरी तक सड़क निर्माण पूरा करना, नालों से जुड़े पाइप बदलना, गड्ढे भरना, अतिक्रमण हटाना और रिपोर्ट तलब करना — प्रशासनिक इच्छाशक्ति को दर्शाते हैं। लेकिन सवाल यही है कि क्या ये निर्देश भी फाइलों में ही सिमट जाएंगे या ज़मीन पर दिखेंगे?
कानपुर जैसे औद्योगिक शहर के लिए यह बेहद ज़रूरी है कि उद्यमियों की समस्याओं को केवल “शिकायत” नहीं बल्कि विकास की बाधा माना जाए। अगर निवेशक सुरक्षित महसूस करेगा, सुविधाएं समय पर मिलेंगी और प्रशासनिक व्यवस्था पारदर्शी होगी, तभी उद्योग बढ़ेंगे, रोजगार बनेगा और शहर वास्तव में आगे बढ़ेगा।

यह बैठक एक अवसर है — सिर्फ समस्याएं सुनने का नहीं, बल्कि व्यवस्था को सुधारने का। अब निगाहें इस पर टिकी हैं कि दिए गए निर्देश कितनी ईमानदारी से ज़मीन पर उतरते हैं, क्योंकि असली विकास वहीं से शुरू होता है।

Pavan Singh
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