उन्नाव केस पर कुलदीप सेंगर की छोटी बेटी की भावुक अपील, बोलीं— थक चुकी हूं, डर के साए में जी रही हूं
Share your love

संवाद 24 नई दिल्ली। उन्नाव रेप केस को लेकर भाजपा के पूर्व विधायक कुलदीप सिंह सेंगर की छोटी बेटी इशिता सेंगर ने आठ साल बाद पहली बार सार्वजनिक रूप से अपनी पीड़ा देश के सामने रखी है। सोमवार को सोशल मीडिया पर लिखे एक भावुक खुले पत्र में इशिता ने खुद को थकी हुई, डरी हुई और टूटते भरोसे के बीच खड़ा बताया। उन्होंने कहा कि वर्षों से उन्हें लगातार रेप और हत्या की धमकियां मिल रही हैं, जिसने उनका जीवन भय के साये में डाल दिया है।

इशिता सेंगर का यह पत्र ऐसे समय सामने आया है, जब सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाईकोर्ट के उस आदेश पर रोक लगा दी है, जिसमें कुलदीप सिंह सेंगर की आजीवन कारावास की सजा को निलंबित किया गया था। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट निर्देश दिया है कि उन्नाव रेप केस में कुलदीप सेंगर जेल से रिहा नहीं होंगे। इस फैसले के बाद इशिता की बड़ी बहन ऐश्वर्या सेंगर ने भी अपनी छोटी बहन के समर्थन में सोशल मीडिया पर लिखा— “लड़ेंगे, हारेंगे नहीं।”

अपने पत्र में इशिता सेंगर ने लिखा कि उन्होंने और उनके परिवार ने बीते आठ वर्षों तक कानून और संविधान पर भरोसा रखते हुए चुप्पी साधे रखी। उन्होंने कभी सड़कों पर प्रदर्शन नहीं किया, न टीवी बहसों में शोर मचाया और न ही सोशल मीडिया ट्रेंड चलाए। उनका विश्वास था कि सच को तमाशे की जरूरत नहीं होती। लेकिन इस मौन की कीमत उन्हें अपनी गरिमा, मानसिक शांति और सुरक्षा के रूप में चुकानी पड़ी।
इशिता का कहना है कि उन्हें केवल “भाजपा विधायक की बेटी” के ठप्पे से देखा गया, जैसे उनकी इंसानियत की कोई कीमत ही न हो। उन्होंने आरोप लगाया कि बिना किसी दस्तावेज, बिना किसी अदालती रिकॉर्ड को देखे, लोगों ने यह मान लिया कि उनका जीवन महत्वहीन है। सोशल मीडिया पर बार-बार उन्हें निशाना बनाया गया, जहां खुले तौर पर कहा गया कि उनका बलात्कार होना चाहिए या उन्हें मार दिया जाना चाहिए।
उन्होंने लिखा कि लगातार अपमान, उपहास और अमानवीय व्यवहार ने उनके पूरे परिवार को भावनात्मक, मानसिक और शारीरिक रूप से तोड़ दिया है। एक दफ्तर से दूसरे दफ्तर तक भटकते हुए, पत्र लिखते हुए और अपनी बात सुने जाने की गुहार लगाते हुए वे पूरी तरह थक चुके हैं। इसके बावजूद उनका कहना है कि उन्हें इसलिए नहीं सुना गया क्योंकि उनके पास तथ्य या सबूत नहीं थे, बल्कि इसलिए क्योंकि उनका सच असुविधाजनक था।
इशिता ने यह भी आरोप लगाया कि जानबूझकर ऐसा डर का माहौल बनाया गया, जिससे जज, पत्रकार, संस्थाएं और आम नागरिक भी चुप रहने को मजबूर हो जाएं। उन्होंने सवाल उठाया कि अगर सच को इतनी आसानी से भीड़ के गुस्से और गलत सूचनाओं में दबाया जा सकता है, तो एक आम नागरिक आखिर जाए तो कहां जाए।
अपने पत्र के अंत में इशिता सेंगर ने स्पष्ट किया कि वह न तो सहानुभूति मांग रही हैं और न ही किसी तरह का संरक्षण। उन्होंने कहा कि वे सिर्फ न्याय की मांग कर रही हैं, एक इंसान होने के नाते। उन्होंने अपील की कि कानून को बिना डर के अपना काम करने दिया जाए, सबूतों को निष्पक्षता से परखा जाए और सच को सच माना जाए। उन्होंने कहा कि वह एक बेटी हैं, जिसे अब भी इस देश और इसकी न्याय व्यवस्था पर भरोसा है, और वह नहीं चाहतीं कि उन्हें उस भरोसे पर पछताना पड़े।






