‘5 किमी नहीं, 5 हजार किमी भी कोई दूरी नहीं’: उन्नाव रेप पीड़िता का दर्द
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संवाद 24 नई दिल्ली/उन्नाव। उन्नाव रेप केस की पीड़िता ने पूर्व भाजपा विधायक कुलदीप सिंह सेंगर की सजा निलंबित होने के बाद अपनी जान को लेकर गहरी आशंका जताई है। पीड़िता का कहना है कि अदालत द्वारा लगाई गई “5 किमी दूर रहने” की शर्त उनके लिए कोई सुरक्षा नहीं है। उनके शब्दों में, “5 किमी क्या, 5 हजार किमी भी उसके लिए कुछ नहीं है। वह हमें कहीं से भी मरवा सकता है।”
दिल्ली हाईकोर्ट ने 23 दिसंबर को सेंगर की उम्रकैद की सजा को अपील लंबित रहने तक निलंबित कर दिया। इस फैसले ने पीड़िता और उनके परिवार को मानसिक रूप से झकझोर दिया है। पीड़िता का कहना है कि इस निर्णय से न सिर्फ उनकी, बल्कि देश की तमाम बहन-बेटियों की हिम्मत कमजोर हुई है।
धमकियों के साए में जी रहा परिवार
पीड़िता और उनका परिवार फिलहाल दिल्ली में रह रहा है, जहां CRPF की सुरक्षा तैनात है। इसके बावजूद पीड़िता का दावा है कि उन्हें आज भी खुलेआम धमकियां मिलती हैं। उन्होंने कहा कि लोग इस तरह इशारों में डराते हैं कि सुरक्षाकर्मी भी समझ नहीं पाते।
पीड़िता का कहना है कि अदालत में सुनवाई के दौरान भी उन्हें अपनी बात रखने का मौका नहीं दिया गया और यह अनुभव उनके लिए बेहद पीड़ादायक रहा।
CBI और राजनीतिक दबाव पर सवाल
पीड़िता ने जांच एजेंसी CBI पर भी गंभीर सवाल खड़े किए। उनका आरोप है कि यदि CBI ने मजबूती से बहस की होती, तो सेंगर को राहत नहीं मिलती। उन्होंने दावा किया कि सुनवाई के दौरान सेंगर की बेटी का CBI अधिकारियों से मिलना उन्होंने खुद देखा है।
पीड़िता ने यह भी आरोप लगाया कि कुछ प्रभावशाली राजनीतिक चेहरे, जिनमें भाजपा नेता बृजभूषण शरण सिंह का नाम लिया गया, पर्दे के पीछे सेंगर की मदद कर रहे हैं।
मां का दर्द: “जिसे फांसी होनी चाहिए, उसे जमानत”
पीड़िता की मां ने अदालत के फैसले पर गहरी नाराजगी जताते हुए कहा कि जिस व्यक्ति को फांसी मिलनी चाहिए थी, उसे जमानत मिल गई। उन्होंने याद दिलाया कि उनके पति की हत्या कर दी गई, पूरा परिवार उजड़ गया और बच्चों को अनाथ कर दिया गया।
मां ने मांग की कि सरकार सेंगर की जमानत तत्काल रद्द कराए, अन्यथा वे आंदोलन जारी रखेंगी।
सजा निलंबन का कानूनी आधार
दिल्ली हाईकोर्ट ने यह मानते हुए सेंगर की सजा निलंबित की कि विधायक को ‘पब्लिक सर्वेंट’ नहीं माना जा सकता, और इसी तकनीकी आधार पर POCSO और IPC की धाराओं की व्याख्या की गई। हालांकि, सेंगर अभी भी जेल में है क्योंकि पीड़िता के पिता की हत्या के मामले में उसे 10 साल की सजा मिली हुई है, जिस पर अलग से अपील लंबित है।
कानून के जानकारों की कड़ी प्रतिक्रिया
वरिष्ठ अधिवक्ता और सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष दुष्यंत दवे ने इस फैसले को दुर्भाग्यपूर्ण बताया। उन्होंने कहा कि विधायक जनता द्वारा चुना गया प्रतिनिधि होता है, शपथ लेता है और भत्ते प्राप्त करता है—ऐसे में उसे पब्लिक सर्वेंट न मानना न्याय की भावना के खिलाफ है।
उनका कहना है कि POCSO जैसे कड़े कानून की व्याख्या पीड़िता के हित में होनी चाहिए, न कि दोषी के पक्ष में।
सुप्रीम कोर्ट का रुख
पीड़िता के वकील महमूद प्राचा ने स्पष्ट किया कि इस आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी जाएगी। उनका कहना है कि हाईकोर्ट ने तकनीकी आधारों पर दोषी पर दया दिखाई, जबकि पीड़िता के जीवन, सुरक्षा और न्याय के व्यापक पहलुओं को नजरअंदाज किया गया।
उन्नाव रेप केस का यह मोड़ न केवल एक पीड़िता के संघर्ष की कहानी है, बल्कि यह सवाल भी खड़ा करता है कि क्या न्याय व्यवस्था में तकनीकी व्याख्याएं मानवीय पीड़ा से बड़ी हो गई हैं? संवाद 24 इस मामले से जुड़े हर पहलू पर अपनी नजर बनाए रखेगा।






