होटल कारोबारी ने लगा ली फांसी, सुसाइड नोट में लिखा “लेनदारी-देनदारी की जिम्मेदारी सिर्फ मेरी

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संवाद 24 संवाददाता। लखनऊ के कोहना थाना क्षेत्र के आर्यनगर स्थित पैशन इनक्लेव में शनिवार सुबह उस वक्त कोहराम मच गया जब 54 वर्षीय होटल व्यवसायी आशीष अग्रवाल अपने ही घर के स्टोर रूम में खिड़की की ग्रिल पर दुपट्टे का फंदा लगाकर लटके मिले। परिजनों की चीख-पुकार से पूरा मोहल्ला एकत्र हो गया। मौके पर पहुंची पुलिस ने शव को नीचे उतारा और पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया।


आशीष अग्रवाल के बड़े भाई मनीष अग्रवाल ने बताया कि उनका होटल ‘आमची मुंबई’ भारतीय रिजर्व बैंक के ठीक सामने स्थित है। ढाई साल पहले मां का निधन हो गया था। मां से बेहद लगाव था, उनकी मौत के बाद आशीष लगातार डिप्रेशन में थे। घरवाले उन्हें बार-बार समझाते थे, लेकिन वह अंदर ही अंदर घुटते रहे।


शनिवार सुबह पत्नी रुचि अग्रवाल सब्जी लेने बाजार गई थीं। बड़ी बेटी खुशी बाथरूम में थी और छोटी बेटी महक घर के कामों में व्यस्त थी। जब खुशी बाहर निकली तो पिता कमरे में नहीं थे। स्टोर रूम में झांकते ही उसकी चीख निकल गई – पापा फंदे पर लटक रहे थे।


सुसाइड नोट में कर्ज का जिक्र, बेटी के व्हाट्सएप पर भी भेजी फोटो
पुलिस को मौके से एक हाथ से लिखा सुसाइड नोट मिला। उसमें आशीष ने लिखा था “मैं दादी के पास जा रहा हूं… अपनी मां और बहन का ख्याल रखना। मेरी जो भी लेनदारी और देनदारी है, उसकी जिम्मेदारी सिर्फ मेरी है।” सबसे चौंकाने वाली बात यह कि आशीष ने सुसाइड नोट की फोटो खींची और उसे अपनी बड़ी बेटी खुशी के व्हाट्सएप पर भेज दिया था।


एसीपी कर्नलगंज अमित चौरसिया ने बताया, “सुसाइड नोट में स्पष्ट रूप से कर्ज का जिक्र है। प्रथम दृष्टया वित्तीय तंगी से परेशान होकर आत्महत्या करने की आशंका है। मृतक का मोबाइल फॉरेंसिक जांच के लिए जब्त कर लिया गया है। परिजन मां की मौत के बाद डिप्रेशन की बात कह रहे हैं। दोनों पहलुओं की गहन जांच की जा रही है।”


परिवार अब भी सदमे में
आशीष की दो बेटियां हैं – खुशी और महक। पत्नी रुचि का रो-रोकर बुरा हाल है। बड़े भाई मनीष कहते हैं, “होटल का कारोबार पहले अच्छा चल रहा था, लेकिन पिछले कुछ सालों में नुकसान हुआ। वह अकेले में बहुत परेशान रहने लगा था। हमें नहीं पता था कि बात इतनी गंभीर हो चुकी थी।”


आर्यनगर के लोग भी स्तब्ध हैं। एक पड़ोसी ने कहा, “आशीष भाई बहुत मिलनसार थे। हमेशा मुस्कुराते रहते थे। किसी को अंदाजा नहीं था कि अंदर से इतना दर्द झेल रहे हैं।” यह घटना एक बार फिर याद दिलाती है कि आर्थिक तनाव और मानसिक अवसाद कितनी खतरनाक साबित हो सकते हैं। अगर कोई अपने करीबी को चुपचाप टूटते देख रहा हो तो उसे अकेला न छोड़ें। एक फोन कॉल, एक बातचीत – कभी-कभी जान बचा सकती है। आशीष अग्रवाल अब इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन उनके सुसाइड नोट की वो पंक्तियाँ आज भी गूंज रही हैं “लेनदारी और देनदारी की जिम्मेदारी सिर्फ मेरी…”

Pavan Singh
Pavan Singh

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