आगरा–लखनऊ एक्सप्रेसवे मुआवजा घोटाला: कई अधिकारियों पर गिरेगी गाज
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आगरा–लखनऊ एक्सप्रेसवे के भूमि अधिग्रहण में हुए कथित मुआवजा घोटाले ने प्रशासनिक हलकों में खलबली मचा दी है। प्रारंभिक तथ्य बताते हैं कि बड़ी संख्या में अधिकारियों की संलिप्तता इस प्रकरण में सामने आ सकती है। मामले की गंभीरता को देखते हुए राजस्व परिषद के अध्यक्ष अनिल कुमार ने लखनऊ के जिलाधिकारी विशाख जी को जांच का दायित्व सौंप दिया है। जांच के आदेश मिलते ही सरकारी महकमे में हलचल तेज हो गई है।
कैसे खुला घोटाले का जाल
एक्सप्रेसवे निर्माण के दौरान किसानों और लाभार्थियों को दी गई मुआवजा राशि में अनियमितताओं की शिकायतें लंबे समय से सामने आती रही थीं। इन्हीं शिकायतों को आधार बनाकर राजस्व परिषद ने दस्तावेजों की पड़ताल की, जिसमें कई चौंकाने वाले तथ्य उजागर हुए। परिषद अध्यक्ष ने पाया कि तत्कालीन एसडीएम, तहसीलदार, राजस्व निरीक्षक और लेखपाल की भूमिका कई मामलों में संदिग्ध है।
जिलाधिकारी को निर्देश दिया गया है कि मुआवजे से जुड़े सभी फाइलों की बिंदुवार जांच कर दो सप्ताह के भीतर रिपोर्ट पेश करें। साथ ही गलत तरीके से जारी की गई राशि की वसूली भी अधिकारियों, कर्मचारियों और संबंधित लाभार्थियों से की जाएगी।
ऐसे किया गया था फर्जी कब्जे का खेल
13 मई 2013 को तत्कालीन मुख्य सचिव के आदेश पर लखनऊ, आगरा, फिरोजाबाद, मैनपुरी, इटावा, औरैया, कन्नौज, कानपुर नगर, उन्नाव और हरदोई के जिलाधिकारियों को यूपीडा के लिए जमीन उपलब्ध कराने के निर्देश दिए गए थे। इसी प्रक्रिया में 302 किमी लंबे एक्सप्रेसवे की संरेखण भी तय की गई थी।
इसी दौरान लखनऊ के सरोसा-भरोसा गांव में गाटा संख्या-3 की 68 बीघा भूमि में लगभग दो बीघा हिस्से पर अनुसूचित जाति के दो व्यक्तियों भाई लाल और बनवारी लाल का वर्ष 2007 से पहले से कब्जा दिखाकर 1,09,86,415 रुपये का मुआवजा जारी कर दिया गया।
तत्कालीन लेखपाल ने लाभार्थियों और पड़ोसियों के बयानों के आधार पर रिपोर्ट में इन्हें कास्तकार बताते हुए कब्जा मान लिया। इसके बाद राजस्व निरीक्षक, तहसीलदार और एसडीएम ने भी बिना ठोस जांच के उसी रिपोर्ट को आधार बनाकर मुआवजा जारी कर दिया।
रिवीजन में उघड़ी परतें
2 नवंबर 2022 को लखनऊ मंडल के अपर आयुक्त प्रशासन के समक्ष दायर एक आवेदन में दावा किया गया कि जिस भूमि के लिए मुआवजा दिया गया है, उसमें चौहद्दी का कोई स्पष्ट उल्लेख नहीं है। इस आवेदन पर सुनवाई के दौरान लाभार्थियों की ओर से 18 मार्च 2024 को राजस्व परिषद में पुनरीक्षण को चुनौती दी गई।
इसके बाद परिषद अध्यक्ष अनिल कुमार की अदालत ने यूपीडा से अधिग्रहण से जुड़े सभी अभिलेख तलब किए। दस्तावेजों की जांच में यह स्पष्ट हुआ कि भू-अभिलेखों में गंभीर हेराफेरी कर ग्राम समाज की जमीन पर अनुसूचित जाति के व्यक्तियों का कब्जा दिखाया गया और अवैध रूप से भारी रकम जारी कर दी गई।
अन्य जिलों में भी गड़बड़ियों की आशंका
जांच रिपोर्ट में यह भी संकेत मिले हैं कि सरोसा-भरोसा गांव के अलावा नटकौरा, दोना सहित तीन अन्य गांवों में भी इसी तरह के फर्जी मुआवजे की शिकायतें हैं। इसके साथ ही एक्सप्रेसवे से जुड़े आठ जिलों में इसी प्रकार की अनियमितताओं की संभावना जताई गई है।
जांच के दायरे का विस्तार होने के बाद कई अधिकारियों की मुश्किलें बढ़ती दिख रही हैं। जिलाधिकारी की रिपोर्ट आने के बाद दोषियों पर सख्त कार्रवाई तय मानी जा रही है, जिसके बाद यह घोटाला प्रदेश की बड़ी प्रशासनिक कार्रवाई में बदल सकता है।






