तीसरे विश्वयुद्ध की आहट? अमेरिकी सीनेट का ईरान युद्ध रोकने वाले प्रस्ताव पर ‘नो’, दुनिया भर में मची खलबली!
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संवाद 24 नई दिल्ली । पश्चिम एशिया के सुलगते हालातों के बीच दुनिया की महाशक्ति अमेरिका से एक ऐसी खबर आई है जिसने अंतरराष्ट्रीय कूटनीति और शांति प्रयासों को बड़ा झटका दिया है। अमेरिकी सीनेट ने उस महत्वपूर्ण प्रस्ताव को सिरे से खारिज कर दिया है, जिसका उद्देश्य ईरान के साथ संभावित युद्ध की आशंकाओं को रोकना और सैन्य कार्रवाई पर अंकुश लगाना था। सीनेट के इस कड़े रुख ने न केवल खाड़ी देशों में तनाव बढ़ा दिया है, बल्कि यह संकेत भी दे दिया है कि आने वाले दिनों में ईरान और अमेरिका के बीच सैन्य टकराव की स्थिति और भी गंभीर हो सकती है।
क्या था वह प्रस्ताव और क्यों हुआ खारिज?
अमेरिकी संसद (सीनेट) में पेश किए गए इस प्रस्ताव का मुख्य उद्देश्य राष्ट्रपति की उन शक्तियों को सीमित करना था, जिनके तहत बिना संसद की पूर्ण मंजूरी के ईरान के खिलाफ किसी भी तरह का बड़ा सैन्य अभियान छेड़ा जा सकता है। प्रस्तावक सांसदों का तर्क था कि अमेरिका पहले ही कई दशकों से बाहरी युद्धों में उलझा हुआ है और ईरान के साथ एक नया युद्ध वैश्विक अर्थव्यवस्था और अमेरिकी संसाधनों के लिए आत्मघाती साबित हो सकता है। हालांकि, मतदान के दौरान रिपब्लिकन और कई प्रभावशाली डेमोक्रेट्स ने इस प्रस्ताव के खिलाफ वोट दिया। विरोध करने वाले गुट का मानना है कि ईरान लगातार क्षेत्र में अस्थिरता पैदा कर रहा है और इजरायल जैसे अमेरिकी सहयोगियों के लिए खतरा बना हुआ है। ऐसे में राष्ट्रपति के हाथ बांधना राष्ट्रीय सुरक्षा के साथ समझौता करने जैसा होगा।
युद्ध की आशंका और वैश्विक समीकरण
सीनेट के इस फैसले के बाद रणनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका अब ‘फुल स्ट्राइक मोड’ में रहने की तैयारी कर रहा है। पिछले कुछ महीनों में लाल सागर में हूती विद्रोहियों के हमले और ईरान समर्थित गुटों द्वारा अमेरिकी ठिकानों को निशाना बनाए जाने के बाद वाशिंगटन का धैर्य जवाब दे रहा है। यदि ईरान और अमेरिका के बीच सीधा टकराव होता है, तो इसके परिणाम भयावह होंगे:
कच्चे तेल की कीमतों में आग: ईरान दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल मार्ग ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ को नियंत्रित करने की क्षमता रखता है। युद्ध की स्थिति में कच्चा तेल 150 डॉलर प्रति बैरल के पार जा सकता है, जिससे भारत सहित पूरी दुनिया में महंगाई का तांडव मचेगा।
इजरायल-हमास जंग का विस्तार: यह केवल दो देशों की जंग नहीं रहेगी, बल्कि इसमें लेबनान, यमन और सीरिया भी सीधे तौर पर कूद पड़ेंगे।
परमाणु खतरा: ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर पश्चिमी देश पहले से ही सतर्क हैं। सैन्य कार्रवाई उसे परमाणु हथियार बनाने की दिशा में और तेज कदम उठाने पर मजबूर कर सकती है।
ईरान की प्रतिक्रिया और रूस-चीन का रुख
अमेरिकी सीनेट के इस फैसले पर ईरान ने सख्त रुख अपनाते हुए कहा है कि वह किसी भी आक्रामकता का जवाब देने के लिए पूरी तरह तैयार है। वहीं दूसरी ओर, रूस और चीन इस घटनाक्रम पर पैनी नजर बनाए हुए हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि अमेरिका का यह कदम रूस और चीन को ईरान के और करीब ला सकता है, जिससे दुनिया दो ध्रुवों में बंट जाएगी।
क्या कूटनीति के दरवाजे बंद हो चुके हैं?
हालांकि प्रस्ताव खारिज हो गया है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि कल ही युद्ध शुरू हो जाएगा। व्हाइट हाउस अभी भी ‘दबाव और कूटनीति’ की नीति पर चलने का दावा कर रहा है। लेकिन सीनेट द्वारा सैन्य प्रतिबंध लगाने से इनकार करना साफ़ दर्शाता है कि अमेरिका ‘शांति’ की भाषा के साथ-साथ ‘हथियारों’ को भी तैयार रखना चाहता है। अमेरिकी राजनीति के गलियारों में यह चर्चा आम है कि आगामी चुनावों को देखते हुए बाइडन प्रशासन अपनी छवि को कमजोर नहीं दिखाना चाहता। ईरान के प्रति नरम रुख को विपक्ष ‘राष्ट्रीय कमजोरी’ के रूप में प्रचारित कर सकता है, जो चुनावों में भारी पड़ सकता है।






