चिप्स के पैकेट में आधी से ज्यादा जगह क्यों होती है? हवा नहीं, इसके पीछे छिपा है खास वैज्ञानिक कारण

संवाद 24 डेस्क। चिप्स का पैकेट खरीदते समय अक्सर एक सवाल मन में आता है—आखिर पैकेट इतना बड़ा क्यों है, जबकि खोलने पर उसमें चिप्स अपेक्षाकृत कम निकलते हैं? कई लोगों को लगता है कि पैकेट में आधी से ज्यादा जगह खाली रखकर कंपनियां ग्राहकों को भ्रमित करती हैं। लेकिन चिप्स के पैकेट का फूला हुआ दिखाई देना केवल पैकेजिंग या मुनाफे का खेल नहीं है। इसके पीछे खाद्य संरक्षण से जुड़ा एक महत्वपूर्ण वैज्ञानिक कारण है। दरअसल, कई स्नैक पैकेटों में सामान्य हवा की जगह नाइट्रोजन का इस्तेमाल किया जाता है। खाद्य पैकेजिंग में इसे modified atmosphere packaging यानी संशोधित वातावरण पैकेजिंग की प्रक्रिया का हिस्सा माना जाता है।

जिसे हम हवा समझते हैं, वह असल में क्या होता है?
चिप्स के पैकेट को हाथ में लेने पर उसमें मौजूद गैस बिल्कुल हवा जैसी महसूस होती है। लेकिन पैकेट में मौजूद गैस और सामान्य वातावरण की हवा एक जैसी होना जरूरी नहीं है। चिप्स जैसे खाद्य पदार्थों की पैकेजिंग में नाइट्रोजन का इस्तेमाल इसलिए किया जाता है ताकि पैकेट के अंदर ऑक्सीजन की मात्रा कम की जा सके। अमेरिकी खाद्य एवं औषधि प्रशासन के अनुसार, खाद्य पैकेजिंग में नाइट्रोजन फ्लशिंग ऑक्सीजन को हटाने या विस्थापित करने के लिए इस्तेमाल की जाती है और इससे खाद्य पदार्थों की शेल्फ लाइफ बनाए रखने में मदद मिल सकती है।
यानी पैकेट में दिखाई देने वाली खाली जगह वास्तव में पूरी तरह ‘खाली’ नहीं होती। उसमें गैस होती है और वह गैस चिप्स की गुणवत्ता बनाए रखने की पैकेजिंग रणनीति का हिस्सा है।

आखिर चिप्स को ऑक्सीजन से बचाने की जरूरत क्यों पड़ती है?
चिप्स को लंबे समय तक कुरकुरा और स्वादिष्ट बनाए रखना आसान नहीं है। इनमें मौजूद तेल और वसा ऑक्सीजन के संपर्क में आने पर ऑक्सीकरण की प्रक्रिया से प्रभावित हो सकते हैं। इससे स्वाद और गंध में बदलाव आ सकता है और लंबे समय में बासी या खराब स्वाद विकसित हो सकता है।
इंस्टीट्यूट ऑफ फूड टेक्नोलॉजिस्ट्स के अनुसार, modified atmosphere packaging में ऑक्सीजन का स्तर कम करके उसकी जगह नाइट्रोजन या अन्य गैसों का इस्तेमाल किया जा सकता है। यह विशेष रूप से ऐसे खाद्य पदार्थों में उपयोगी है जिनमें वसा की मात्रा अधिक होती है, क्योंकि ऑक्सीजन कम करने से lipid oxidation यानी वसा के ऑक्सीकरण को धीमा करने में मदद मिलती है।
यही वजह है कि चिप्स के पैकेट में भरी गैस केवल पैकेट को फुलाने के लिए नहीं होती, बल्कि खाद्य गुणवत्ता की रक्षा करने का काम भी करती है।

नाइट्रोजन ही क्यों? ऑक्सीजन क्यों नहीं?
सामान्य हवा में लगभग 21 प्रतिशत ऑक्सीजन होती है। ऑक्सीजन कई रासायनिक प्रतिक्रियाओं में सक्रिय भूमिका निभाती है। दूसरी ओर, नाइट्रोजन अपेक्षाकृत निष्क्रिय गैस है और खाद्य पैकेजिंग में इसका इस्तेमाल ऑक्सीजन को विस्थापित करने के लिए किया जाता है।
यूटा स्टेट यूनिवर्सिटी के खाद्य संरक्षण संबंधी संसाधन के अनुसार, कुछ खाद्य पदार्थों के कंटेनर में सील करने से पहले नाइट्रोजन जैसी inert gas भरी जाती है, ताकि ऑक्सीजन को हटाया जा सके और ऑक्सीकरण या खराब होने की प्रक्रिया को कम किया जा सके।
यही वैज्ञानिक सिद्धांत चिप्स और दूसरे सूखे स्नैक्स की पैकेजिंग में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

पैकेट फुलाकर रखने का दूसरा बड़ा कारण—चिप्स को टूटने से बचाना
अब सवाल आता है कि अगर उद्देश्य केवल ऑक्सीजन कम करना है तो पैकेट को इतना फुलाया क्यों जाता है? इसका एक महत्वपूर्ण कारण चिप्स की भौतिक सुरक्षा है।
चिप्स बहुत हल्के और नाजुक होते हैं। उत्पादन केंद्र से लेकर गोदाम, ट्रक, दुकान और फिर ग्राहक के घर तक पहुंचने के दौरान पैकेट को कई तरह के दबाव, झटके और वजन का सामना करना पड़ता है। पैकेट में पर्याप्त गैस होने से वह एक तरह के कुशन की भूमिका निभा सकता है और चिप्स को बाहरी दबाव से कुछ हद तक बचाने में मदद करता है।
इंस्टीट्यूट ऑफ फूड टेक्नोलॉजिस्ट्स की शैक्षिक सामग्री में बताया गया है कि चिप्स के पैकेट में नाइट्रोजन का इस्तेमाल परिवहन, हैंडलिंग और भंडारण के दौरान चिप्स को नुकसान से बचाने में मदद करता है।
इसलिए पैकेट में मौजूद अतिरिक्त जगह का एक उद्देश्य यह भी है कि ग्राहक तक पहुंचने तक चिप्स का बड़ा हिस्सा साबुत और कुरकुरा रहे।

अगर पैकेट में सिर्फ चिप्स भर दिए जाएं तो क्या होगा?
कल्पना कीजिए कि चिप्स को एक ऐसे पैकेट में भर दिया जाए जिसमें लगभग कोई गैस न हो। पैकेट बहुत आसानी से दब जाएगा और ऊपर से आने वाला दबाव सीधे चिप्स पर पड़ सकता है। यात्रा के दौरान पैकेट दूसरे सामान के नीचे दब सकता है और कई चिप्स टूट सकते हैं।
फूला हुआ पैकेट इस जोखिम को कम करने में मदद करता है। इसलिए पैकेट को देखकर यह निष्कर्ष निकालना कि उसमें ‘सिर्फ हवा भरी है’, अधूरा आकलन होगा।
हालांकि इसका अर्थ यह भी नहीं है कि हर पैकेट में गैस की मात्रा बिल्कुल समान होगी या हर ब्रांड समान पैकेजिंग तकनीक अपनाता है। पैकेज का आकार, उत्पाद की मात्रा, सामग्री, गैस की संरचना और पैकेजिंग मशीन की प्रक्रिया अलग-अलग हो सकती है।

क्या नाइट्रोजन से चिप्स हमेशा ताजा रहते हैं?
यहां एक जरूरी तथ्य समझना भी महत्वपूर्ण है। नाइट्रोजन पैकेजिंग चिप्स को हमेशा के लिए ताजा नहीं रखती। यह खाद्य संरक्षण की एक तकनीक है, कोई जादुई प्रक्रिया नहीं।
पैकेजिंग की गुणवत्ता, सील की मजबूती, पैकेट की सामग्री, ऑक्सीजन के प्रवेश की दर, तापमान और भंडारण की परिस्थितियां भी उत्पाद की गुणवत्ता को प्रभावित करती हैं। खाद्य पैकेजिंग विशेषज्ञों के अनुसार, गैस फ्लशिंग की प्रभावशीलता पैकेज के barrier properties और सील की गुणवत्ता पर भी निर्भर करती है।
यानी नाइट्रोजन भर देना ही पर्याप्त नहीं है। उसे पैकेट के अंदर बनाए रखने के लिए उचित पैकेजिंग सामग्री और अच्छी सीलिंग भी जरूरी है।

पैकेट खुलते ही चिप्स जल्दी नरम क्यों होने लगते हैं?
जब पैकेट सील होता है, तब उसके अंदर नियंत्रित वातावरण बनाए रखने की कोशिश की जाती है। लेकिन जैसे ही पैकेट खुलता है, बाहरी वातावरण की हवा अंदर आने लगती है। इसके बाद चिप्स नमी और ऑक्सीजन के संपर्क में आने लगते हैं।
विशेष रूप से नमी चिप्स की कुरकुराहट के लिए बड़ी चुनौती है। इसलिए एक बार पैकेट खोलने के बाद उसे लंबे समय तक खुला छोड़ देने पर चिप्स की बनावट बदल सकती है और वह पहले जैसी कुरकुरी नहीं रह सकती।
यही रोजमर्रा का अनुभव इस बात को समझने में मदद करता है कि पैकेजिंग के अंदर नियंत्रित वातावरण बनाए रखना कितना महत्वपूर्ण है।

क्या कंपनियां सिर्फ ज्यादा जगह दिखाने के लिए बड़े पैकेट बनाती हैं?
यह सवाल पूरी तरह खारिज भी नहीं किया जा सकता कि पैकेज का आकार विपणन और डिजाइन से प्रभावित हो सकता है। लेकिन केवल पैकेट में खाली जगह देखकर यह निष्कर्ष निकालना सही नहीं होगा कि उसका उद्देश्य ग्राहकों को धोखा देना है।
खाद्य पैकेजिंग का मूल काम सिर्फ उत्पाद को रखने तक सीमित नहीं है। अमेरिकी कृषि विभाग की पैकेजिंग शब्दावली के अनुसार, पैकेजिंग का उद्देश्य उत्पाद को संभालने, परिवहन, उपयोग और संरक्षण के दौरान सुरक्षित रखना भी है। Modified atmosphere packaging का इस्तेमाल शेल्फ लाइफ बढ़ाने के लिए किया जाता है।
चिप्स के मामले में बड़ा और फूला हुआ पैकेट इसलिए भी उपयोगी हो सकता है क्योंकि यह उत्पाद को बाहरी दबाव से बचाने के साथ-साथ नियंत्रित गैस वातावरण बनाए रखने में मदद करता है।

चिप्स के पैकेट से जुड़ी सबसे बड़ी गलतफहमी क्या है?
सबसे बड़ी गलतफहमी यही है कि पैकेट में दिखाई देने वाली पूरी जगह ‘हवा’ है और उसमें उत्पाद कम भरकर ग्राहक को नुकसान पहुंचाया जा रहा है। वास्तविकता इससे अधिक जटिल है।
पैकेट पर लिखी net quantity ही वह मात्रा है जिसके आधार पर उपभोक्ता को उत्पाद की वास्तविक मात्रा समझनी चाहिए। पैकेट का आकार अपने आप में उत्पाद की मात्रा का प्रमाण नहीं होता।
इसलिए अगली बार जब चिप्स का पैकेट खोलने पर आपको लगे कि ‘इतनी बड़ी पैकिंग में इतने ही चिप्स’, तो यह याद रखना चाहिए कि उस अतिरिक्त जगह का संबंध केवल दिखावे से नहीं, बल्कि उत्पाद की सुरक्षा, गुणवत्ता और परिवहन से भी है।

चिप्स के पैकेट की ‘हवा’ असल में एक तकनीक है
चिप्स के पैकेट में दिखाई देने वाली खाली जगह पहली नजर में भले ही अजीब लगे, लेकिन इसके पीछे खाद्य विज्ञान और पैकेजिंग तकनीक काम करती है। कई स्नैक उत्पादों में नाइट्रोजन का उपयोग ऑक्सीजन को कम करने, ऑक्सीकरण को धीमा करने और उत्पाद की गुणवत्ता बनाए रखने के लिए किया जाता है। साथ ही पैकेट में गैस की मौजूदगी चिप्स को परिवहन और हैंडलिंग के दौरान टूटने से बचाने में मदद करती है।
इसलिए अगली बार फूला हुआ चिप्स का पैकेट हाथ में आए तो उसे सिर्फ ‘आधा खाली पैकेट’ समझने से पहले उसके पीछे छिपे विज्ञान को याद कीजिए। जिस चीज को हम अक्सर बेकार की हवा समझते हैं, वही कई मामलों में चिप्स की कुरकुराहट, स्वाद और सुरक्षित पहुंच सुनिश्चित करने वाली पैकेजिंग रणनीति का अहम हिस्सा होती है।

Geeta Singh
Geeta Singh

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