विदेशी मोबाइल ब्रांडों को टक्कर देने की तैयारी, भारत ला रहा तीन-चार स्वदेशी मोबाइल ब्रांड; क्या बदल जाएगा बाजार का खेल?

संवाद 24 डेस्क। भारत दुनिया के सबसे बड़े मोबाइल फोन बाजारों में शामिल है। देश में करोड़ों लोग हर वर्ष नए मोबाइल फोन खरीदते हैं, लेकिन एक दिलचस्प विरोधाभास लंबे समय से बना हुआ है। भारत में मोबाइल फोन का बड़े पैमाने पर उत्पादन और निर्यात जरूर हो रहा है, लेकिन बाजार में सबसे ज्यादा पहचाने जाने वाले नामों में भारतीय कंपनियों की संख्या बेहद सीमित है। अब केंद्र सरकार इस तस्वीर को बदलने की दिशा में बड़ा कदम उठाने की तैयारी कर रही है।
सरकार अगले करीब एक महीने में भारतीय मोबाइल फोन ब्रांडों के विकास के लिए एक व्यापक रूपरेखा यानी रोडमैप पेश कर सकती है। सूत्रों के अनुसार, करीब तीन से चार निजी कंपनियां अपने भारतीय मोबाइल ब्रांड विकसित करने की दिशा में आगे बढ़ सकती हैं। शुरुआती दौर में इन मोबाइल फोन के एंड्रॉयड आधारित होने की संभावना है। इसका मतलब यह है कि आने वाले समय में भारतीय बाजार में केवल भारत में बने विदेशी ब्रांडों के फोन ही नहीं, बल्कि भारतीय स्वामित्व और पहचान वाले मोबाइल फोन भी दिखाई दे सकते हैं।

सरकार का असली लक्ष्य केवल ‘भारत में बना फोन’ नहीं
इस पूरी पहल को समझने के लिए एक महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है। भारत में मोबाइल फोन का निर्माण पहले से ही बड़े पैमाने पर हो रहा है। सरकार की नई नीति का उद्देश्य केवल किसी विदेशी कंपनी के मोबाइल फोन को भारत में जोड़कर तैयार करना नहीं है। अब लक्ष्य उत्पादन से आगे बढ़कर भारतीय स्वामित्व वाले ब्रांड, भारतीय डिजाइन, अनुसंधान एवं विकास और घरेलू कलपुर्जा आपूर्ति श्रृंखला तैयार करना है।
इसी दिशा में केंद्र सरकार ने 62,500 करोड़ रुपये की मोबाइल फोन विनिर्माण योजना को मंजूरी दी है। यह योजना वित्त वर्ष 2026-27 से 2030-31 तक पांच वर्षों के लिए लागू रहेगी। सरकार का कहना है कि इसका उद्देश्य घरेलू मूल्यवर्धन बढ़ाना, आपूर्ति श्रृंखला मजबूत करना, वैश्विक प्रतिस्पर्धा बढ़ाना और भारतीय मोबाइल ब्रांडों को तकनीकी रूप से मजबूत बनाना है।

तीन-चार कंपनियों के आने से क्या बदलेगा?
सरकार से जुड़े सूत्रों के अनुसार तीन से चार निजी कंपनियों द्वारा भारतीय मोबाइल ब्रांड विकसित किए जाने की उम्मीद है। हालांकि अभी इन सभी कंपनियों के नाम आधिकारिक तौर पर घोषित नहीं किए गए हैं। अगस्त में केंद्रीय इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री अश्विनी वैष्णव ने भी कहा था कि सरकार ने तीन संभावित कंपनियों की पहचान की है, जो प्रतिस्पर्धी भारतीय मोबाइल ब्रांड विकसित करने की क्षमता रखती हैं। उनके अनुसार ऐसे नए भारतीय मोबाइल फोन लगभग 10 से 14 महीनों में बाजार में आ सकते हैं।
अक्टूबर की ताजा जानकारी में तीन से चार निजी कंपनियों के ब्रांड विकसित करने की संभावना सामने आई है। इसलिए यह कहना अधिक उचित होगा कि भारत में स्वदेशी मोबाइल ब्रांडों की वापसी की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है, जबकि बाजार में इनका वास्तविक प्रभाव अगले एक से दो वर्षों में स्पष्ट होगा।

कभी माइक्रोमैक्स और लावा जैसे नामों का था दबदबा
भारत में स्वदेशी मोबाइल ब्रांड का विचार बिल्कुल नया नहीं है। एक समय माइक्रोमैक्स, कार्बन, लावा और इंटेक्स जैसी भारतीय कंपनियां बाजार में काफी मजबूत थीं। 2014 के आसपास भारतीय मोबाइल ब्रांडों की घरेलू बाजार में संयुक्त हिस्सेदारी लगभग 45 प्रतिशत तक बताई गई थी। इसके बाद चीनी कंपनियों के तेजी से विस्तार ने भारतीय ब्रांडों को पीछे छोड़ दिया।
उस दौर में कई भारतीय कंपनियां कम कीमत वाले मोबाइल फोन के सहारे बाजार में प्रतिस्पर्धा करती थीं। लेकिन समय के साथ मोबाइल फोन अधिक जटिल तकनीकी उत्पाद बन गए। कैमरा, चिप, प्रदर्शन, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, 5जी संपर्क सुविधा, डिजाइन, सॉफ्टवेयर और सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में भारी निवेश की जरूरत पड़ने लगी। भारतीय कंपनियां इस तकनीकी दौड़ में उतनी तेजी से आगे नहीं बढ़ सकीं।
अब सरकार जिस मॉडल पर काम कर रही है, वह पुराने दौर की केवल ब्रांडिंग वाली रणनीति से अलग दिखाई देता है। इस बार भारतीय ब्रांड के साथ भारतीय डिजाइन, बौद्धिक संपदा और अनुसंधान एवं विकास को भी महत्व दिया जा रहा है।

मोबाइल फोन बनाने में भारत पहले ही बना बड़ी ताकत
भारत की मौजूदा स्थिति इस योजना के लिए मजबूत आधार देती है। सरकार के अनुसार देश में इस्तेमाल होने वाले करीब 99.2 प्रतिशत मोबाइल फोन अब भारत में ही निर्मित होते हैं। भारत मात्रा के आधार पर दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा मोबाइल फोन निर्माता बन चुका है। वर्ष 2025 में मोबाइल फोन भारत के सबसे बड़े निर्यात उत्पादों में शामिल रहे।
यानी भारत ने विदेशी कंपनियों के लिए मोबाइल फोन बनाने की क्षमता तो हासिल कर ली है, लेकिन अगला सवाल यह है कि क्या भारत अपने नाम से भी ऐसे फोन बना सकता है जो घरेलू और वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धा कर सकें?
सरकार का नया प्रयास इसी सवाल का उत्तर खोजने की कोशिश है।

कलपुर्जों की कहानी भी बदल रही है
मोबाइल फोन का अपना ब्रांड बनाना तभी संभव है जब उसके लिए जरूरी कलपुर्जों की आपूर्ति देश में मजबूत हो। पिछले कुछ वर्षों में सरकार ने इसी क्षेत्र पर भी ध्यान दिया है। ताजा जानकारी के अनुसार भारत में मोबाइल फोन और इलेक्ट्रॉनिक कलपुर्जों के क्षेत्र से जुड़ी करीब 400 से 500 कंपनियों का पारिस्थितिकी तंत्र विकसित हो चुका है।
सूत्रों के अनुसार पिछले वर्ष भारत ने चीन को करीब 35,000 करोड़ रुपये मूल्य के इलेक्ट्रॉनिक कलपुर्जों का निर्यात किया। यह आंकड़ा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि कुछ वर्ष पहले भारत स्वयं मोबाइल फोन के कई कलपुर्जों के लिए बड़े पैमाने पर आयात पर निर्भर था।
सरकार अब इस बदलाव को अगले स्तर तक ले जाना चाहती है—जहां भारत केवल दूसरे देशों के लिए मोबाइल फोन बनाने वाला देश न रहे, बल्कि डिजाइन से लेकर ब्रांड और तकनीक तक अपनी पहचान स्थापित करे।

62,500 करोड़ रुपये की योजना में भारतीय ब्रांडों के लिए क्या खास है?
मोबाइल फोन विनिर्माण योजना को दो प्रमुख हिस्सों में बांटा गया है। पहला हिस्सा मोबाइल फोन के उत्पादन को प्रोत्साहित करता है, जबकि दूसरा भारतीय मोबाइल ब्रांडों को सहायता देने के लिए बनाया गया है।
भारतीय ब्रांडों के लिए पात्र कंपनियों को बिक्री पर 5 प्रतिशत तक प्रोत्साहन मिल सकता है। इसके अलावा भारत में डिजाइन और अनुसंधान एवं विकास करने पर अतिरिक्त 3 प्रतिशत प्रोत्साहन का प्रावधान है। घरेलू स्तर पर महत्वपूर्ण कलपुर्जों की खरीद बढ़ाने पर 1.5 प्रतिशत तक अतिरिक्त प्रोत्साहन भी उपलब्ध हो सकता है।
इस तरह किसी पात्र भारतीय ब्रांड के लिए कुल प्रोत्साहन काफी महत्वपूर्ण हो सकता है। सरकार का उद्देश्य केवल बिक्री बढ़ाना नहीं, बल्कि कंपनियों को देश में तकनीकी क्षमता और आपूर्ति श्रृंखला विकसित करने के लिए प्रेरित करना है।

हर कंपनी को नहीं मिलेगा सरकारी लाभ
यहां एक महत्वपूर्ण शर्त भी है। भारतीय ब्रांड के नाम पर केवल विदेश में डिजाइन किए गए मोबाइल फोन को भारत में बेच देने से सरकारी प्रोत्साहन हासिल नहीं किया जा सकेगा। योजना में भारतीय ब्रांड के लिए स्वामित्व, नियंत्रण, बौद्धिक संपदा और भारत में अनुसंधान एवं डिजाइन क्षमता से जुड़े स्पष्ट मानदंड रखे गए हैं।
सरकारी नियमों के अनुसार भारतीय ब्रांड के लिए कंपनी भारत में पंजीकृत होनी चाहिए, उसका बौद्धिक संपदा अधिकार और व्यापार चिह्न भारत में होना चाहिए, प्रबंधन नियंत्रण भारतीय नागरिकों के पास होना चाहिए तथा 51 प्रतिशत से अधिक हिस्सेदारी भारतीय नागरिकों के पास होनी चाहिए। साथ ही कंपनी के पास भारत में अपनी अनुसंधान एवं डिजाइन क्षमता होनी चाहिए।
मंत्री अश्विनी वैष्णव ने भी स्पष्ट किया है कि सरकार केवल पुराने विदेशी डिजाइन की नकल करने वाले उत्पादों को प्रोत्साहित नहीं करना चाहती। डिजाइन और तकनीक वास्तविक रूप से भारतीय स्वामित्व वाली होनी चाहिए।

कौन-कौन सी भारतीय कंपनियां दौड़ में हो सकती हैं?
अभी सरकार ने संभावित तीन-चार ब्रांडों के नाम आधिकारिक रूप से घोषित नहीं किए हैं। हालांकि उद्योग जगत की रिपोर्टों में लावा इंटरनेशनल, एनएक्सटीक्वांटम शिफ्ट टेक्नोलॉजीज और कुछ अन्य घरेलू कंपनियों की रुचि का उल्लेख हुआ है। डिक्सन टेक्नोलॉजीज और एम्बर एंटरप्राइजेज जैसी घरेलू इलेक्ट्रॉनिक्स कंपनियों ने भी नई मोबाइल फोन विनिर्माण योजना में रुचि दिखाई है।
एनएक्सटीक्वांटम शिफ्ट टेक्नोलॉजीज ‘एआई+’ नाम से मोबाइल फोन पेश कर रही है, जबकि लावा पहले से भारतीय मोबाइल बाजार में मौजूद है। हैदराबाद की एमआईवीआई ने भी मोबाइल फोन क्षेत्र में प्रवेश किया है और भारतीय डिजाइन तथा विनिर्माण क्षमता विकसित करने की दिशा में आगे बढ़ रही है।
हालांकि इन सभी कंपनियों को नई सरकारी योजना के तहत लाभार्थी मान लेना अभी जल्दबाजी होगी। पात्रता और आवेदन की अंतिम प्रक्रिया के बाद ही स्थिति पूरी तरह स्पष्ट होगी।

क्या विदेशी मोबाइल कंपनियों की छुट्टी हो जाएगी?
यह सवाल सबसे ज्यादा चर्चा में है, लेकिन इसका सीधा जवाब है—नहीं, कम से कम अभी ऐसा कहना जल्दबाजी होगी।
भारत में एप्पल, सैमसंग, श्याओमी, वीवो, ओप्पो और अन्य वैश्विक कंपनियों की मजबूत उपस्थिति है। भारतीय कंपनियों के नए ब्रांड आने का अर्थ यह नहीं है कि विदेशी कंपनियां बाजार से बाहर हो जाएंगी। बल्कि इससे प्रतिस्पर्धा बढ़ने की संभावना है।
सरकार की कोशिश बाजार को विदेशी कंपनियों से खाली कराना नहीं, बल्कि ऐसा घरेलू विकल्प तैयार करना है जो तकनीक, गुणवत्ता, कीमत और नवाचार के मामले में वैश्विक कंपनियों को चुनौती दे सके।
यही अंतर इस पूरी नीति को महत्वपूर्ण बनाता है। यदि भारतीय ब्रांड केवल कम कीमत वाले मोबाइल तक सीमित रहेंगे तो उनका प्रभाव सीमित रहेगा। असली चुनौती मध्यम और प्रीमियम श्रेणी में प्रतिस्पर्धा करने की होगी।

सबसे बड़ी चुनौती होगी गुणवत्ता और तकनीक
भारतीय ब्रांड के लिए सबसे बड़ा सवाल यह नहीं होगा कि फोन भारत में बनता है या नहीं। असली सवाल होगा कि क्या वह उपभोक्ता को उतनी ही गुणवत्ता, कैमरा, बैटरी, गति, सुरक्षा, सॉफ्टवेयर अनुभव और लंबे समय तक अद्यतन सुविधा दे पाएगा, जितनी आज वैश्विक कंपनियां देती हैं।
मोबाइल फोन बाजार में केवल कम कीमत के सहारे लंबे समय तक टिकना कठिन है। उद्योग विशेषज्ञों ने भी संकेत दिया है कि भारतीय कंपनियों को उच्च मूल्य वाले खंड में उतरना होगा, क्योंकि केवल 15,000 रुपये से कम कीमत वाले फोन पर निर्भर रहकर मजबूत वैश्विक ब्रांड बनाना कठिन हो सकता है।

भारत के लिए रोजगार और निर्यात का भी बड़ा अवसर
सरकार की 62,500 करोड़ रुपये की मोबाइल फोन विनिर्माण योजना से केवल ब्रांड निर्माण ही नहीं, बल्कि रोजगार और निर्यात को भी बढ़ावा मिलने की उम्मीद है। सरकार के अनुसार योजना की अवधि में देश में लगभग 39 लाख करोड़ रुपये का संचयी मोबाइल फोन उत्पादन हो सकता है और करीब 60,000 प्रत्यक्ष रोजगार पैदा होने की उम्मीद है।
यदि भारतीय ब्रांड घरेलू बाजार में सफल होते हैं और उसके बाद अफ्रीका, दक्षिण-पूर्व एशिया तथा अन्य उभरते बाजारों में पहुंच बनाते हैं तो भारत के लिए मोबाइल फोन निर्यात का नया अध्याय खुल सकता है।

अगले एक-दो साल क्यों होंगे निर्णायक?
अभी तस्वीर पूरी तरह तैयार नहीं है। सरकार करीब एक महीने में भारतीय मोबाइल ब्रांडों के लिए विस्तृत रोडमैप लाने की तैयारी में है। वहीं अगस्त में सरकार ने संकेत दिया था कि तीन संभावित भारतीय कंपनियां 10 से 14 महीनों में अपने नए मोबाइल फोन बाजार में ला सकती हैं। दूसरी ओर सरकार अगले दो वर्षों में पूरी तरह भारतीय डिजाइन और विनिर्माण वाले मोबाइल फोन को बाजार में मजबूत स्थिति में लाने का लक्ष्य देख रही है।
इसलिए 2027 और उसके बाद का समय भारतीय मोबाइल उद्योग के लिए निर्णायक हो सकता है।

क्या भारत फिर से अपना मोबाइल ब्रांड साम्राज्य खड़ा कर पाएगा?
भारत ने मोबाइल फोन निर्माण की पहली बड़ी परीक्षा पास कर ली है। अब चुनौती दूसरी और कहीं अधिक कठिन है—अपने नाम से ऐसा मोबाइल फोन बनाना जिसे भारतीय उपभोक्ता केवल देशी होने के कारण नहीं, बल्कि उसकी गुणवत्ता और तकनीक के कारण खरीदे।
सरकार की 62,500 करोड़ रुपये की योजना, मजबूत होता कलपुर्जा पारिस्थितिकी तंत्र, घरेलू डिजाइन क्षमता और तीन-चार संभावित भारतीय ब्रांड इस दिशा में उम्मीद जरूर जगाते हैं। लेकिन सफलता का वास्तविक पैमाना तब तय होगा जब ये कंपनियां विदेशी ब्रांडों के बराबर तकनीक, गुणवत्ता, बिक्री के बाद सेवा और नवाचार उपलब्ध करा पाएंगी।
इसलिए इसे ‘विदेशी मोबाइल कंपनियों की छुट्टी’ से ज्यादा ‘भारतीय मोबाइल ब्रांडों की वापसी’ के रूप में देखना अधिक सही होगा। यदि सरकार की योजना सफल होती है तो आने वाले वर्षों में भारतीय उपभोक्ता के सामने पहली बार ऐसा विकल्प हो सकता है जिसमें मोबाइल केवल भारत में बना हुआ न हो, बल्कि उसका ब्रांड, डिजाइन, तकनीक और बौद्धिक संपदा भी काफी हद तक भारतीय हो।
यही इस पूरी पहल की सबसे बड़ी उपलब्धि होगी—भारत का लक्ष्य अब दुनिया के मोबाइल फोन बनाने वाला देश बनने से आगे बढ़कर दुनिया के लिए अपना मोबाइल ब्रांड बनाने वाला देश बनना है।

Geeta Singh
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