
संवाद 24 डेस्क। हिंदू धर्म में पितृ पक्ष को पूर्वजों के प्रति श्रद्धा, स्मरण और कृतज्ञता व्यक्त करने का महत्वपूर्ण अवसर माना गया है। इस अवधि में परिवार के दिवंगत सदस्यों के लिए उनकी मृत्यु तिथि के अनुसार श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान करने की परंपरा है। वर्ष 2026 में पितृ पक्ष की शुरुआत 27 सितंबर से हो रही है और सर्वपितृ अमावस्या 10 अक्टूबर को होगी। हालांकि 26 सितंबर को भाद्रपद पूर्णिमा का श्राद्ध किया जा रहा है, जिसे कई पंचांग पितृ पक्ष के पूर्व का पूर्णिमा श्राद्ध मानते हैं। इसलिए पितृ पक्ष की शुरुआत और पूर्णिमा श्राद्ध को लेकर अलग-अलग तारीखों की जानकारी सामने आ रही है।
आखिर क्यों महत्वपूर्ण माना जाता है पितृ पक्ष?
भारतीय धार्मिक परंपरा में मनुष्य को देव ऋण, ऋषि ऋण और पितृ ऋण से जुड़ा माना गया है। पितृ पक्ष इसी पितृ ऋण के स्मरण और उसके प्रति कर्तव्य निभाने की परंपरा से जुड़ा है। मान्यता है कि इन दिनों पूर्वजों के लिए श्रद्धापूर्वक किए गए कर्मों से उनका स्मरण होता है और परिवार अपने पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करता है। श्राद्ध का मूल भाव केवल कर्मकांड नहीं, बल्कि श्रद्धा और स्मृति है।
पितृ पक्ष में हर दिन किसी न किसी तिथि से जुड़े पूर्वजों का श्राद्ध किया जाता है। सामान्य नियम यह है कि जिस तिथि को किसी व्यक्ति का निधन हुआ हो, पितृ पक्ष में उसी तिथि पर उसका श्राद्ध किया जाए। यदि मृत्यु तिथि मालूम नहीं हो या परिवार में अनेक पूर्वजों का श्राद्ध एक साथ करना हो, तो सर्वपितृ अमावस्या का विशेष महत्व माना जाता है।
तर्पण और श्राद्ध में क्या अंतर है?
अक्सर लोग तर्पण और श्राद्ध को एक ही मान लेते हैं, जबकि दोनों के स्वरूप में अंतर है। तर्पण में जल, तिल आदि के माध्यम से पितरों का स्मरण करते हुए उन्हें जल अर्पित किया जाता है। दूसरी ओर श्राद्ध एक व्यापक कर्म है, जिसमें संकल्प, पिंडदान, पितरों के निमित्त भोजन, ब्राह्मण सत्कार, दान और तर्पण जैसी परंपराएं शामिल हो सकती हैं।
इसलिए केवल जल अर्पित करना और पूर्ण श्राद्ध कर्म करना समान नहीं है। परिवार की परंपरा, क्षेत्रीय मान्यता और पुरोहित द्वारा बताए गए विधान के अनुसार श्राद्ध की प्रक्रिया अलग हो सकती है।
पितरों को तर्पण देने की सही विधि क्या है?
पितृ तर्पण करते समय सबसे पहले स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करने की परंपरा है। इसके बाद शांत स्थान पर बैठकर पितरों का स्मरण किया जाता है। पारंपरिक विधि में दक्षिण दिशा की ओर मुख करके तर्पण करने का उल्लेख मिलता है। तर्पण के लिए जल में काले तिल मिलाए जाते हैं और श्रद्धापूर्वक पितरों का नाम एवं गोत्र लेकर जल अर्पित किया जाता है।
कई परंपराओं में तांबे के पात्र का प्रयोग किया जाता है। जल में काले तिल और गंगाजल मिलाने की परंपरा भी प्रचलित है। हालांकि अलग-अलग संप्रदायों और परिवारों में तर्पण की विधि भिन्न हो सकती है। इसलिए यदि परिवार में पहले से कोई निश्चित परंपरा चली आ रही है तो उसी का पालन करना अधिक उचित माना जाता है।
तर्पण के दौरान मन को शांत रखना और श्रद्धा के साथ पूर्वजों का स्मरण करना महत्वपूर्ण है। इसे केवल औपचारिक प्रक्रिया की तरह करने के बजाय अपने दिवंगत परिजनों के प्रति कृतज्ञता और सम्मान की भावना से करना इस परंपरा का मूल उद्देश्य माना जाता है।
श्राद्ध के लिए कौन सा समय माना जाता है शुभ?
पितृ पक्ष के श्राद्ध को सामान्यतः दिन के अपराह्न काल में करने की परंपरा है। पंचांगों में कुतुप मुहूर्त, रौहिण मुहूर्त और उसके बाद का अपराह्न काल श्राद्ध कर्म के लिए महत्वपूर्ण बताए जाते हैं। श्राद्ध के अंत में तर्पण करने की परंपरा भी बताई गई है।
कुतुप मुहूर्त और रौहिण मुहूर्त का वास्तविक समय प्रत्येक स्थान के सूर्योदय और स्थानीय पंचांग के अनुसार बदलता है। इसलिए किसी एक शहर का समय पूरे देश के लिए समान मानना सही नहीं होगा।
2026 में किस तिथि को किसका श्राद्ध होगा?
2026 में पितृ पक्ष की प्रमुख तिथियां इस प्रकार हैं। यहां दिए गए दिन व्यापक पंचांग गणना के अनुसार हैं; स्थानीय पंचांग में कुछ समय का अंतर संभव है।
26 सितंबर—पूर्णिमा श्राद्ध: भाद्रपद शुक्ल पूर्णिमा का श्राद्ध 26 सितंबर को है। प्रयागराज क्षेत्र के पंचांग के अनुसार इस दिन कुतुप मुहूर्त लगभग सुबह 11:30 से 12:18 बजे, रौहिण मुहूर्त 12:18 से 1:06 बजे और अपराह्न काल 1:06 से 3:30 बजे तक है।
27 सितंबर—प्रतिपदा श्राद्ध: पितृ पक्ष की प्रतिपदा तिथि का श्राद्ध 27 सितंबर को होगा। दिल्ली-एनसीआर के आसपास समय स्थानीय पंचांग के अनुसार लगभग दोपहर के समय रहेगा। प्रतिपदा तिथि 26 सितंबर की रात से शुरू होकर 27 सितंबर की रात तक रहने की जानकारी पंचांगों में दी गई है।
28 सितंबर—द्वितीया श्राद्ध: द्वितीया तिथि का श्राद्ध 28 सितंबर को किया जाएगा।
29 सितंबर—तृतीया श्राद्ध और महाभरणी: 29 सितंबर को तृतीया श्राद्ध के साथ महाभरणी का भी विशेष उल्लेख मिलता है। भरणी नक्षत्र से जुड़ी इस तिथि को पितृ कर्म के लिए विशेष माना जाता है।
30 सितंबर—चतुर्थी श्राद्ध: 30 सितंबर को चतुर्थी श्राद्ध रहेगा। कुछ पंचांगों में तिथि की स्थिति के कारण इसी दिन पंचमी श्राद्ध भी बताया गया है।
1 अक्टूबर—पंचमी श्राद्ध: कुछ स्थानीय पंचांगों में पंचमी श्राद्ध 1 अक्टूबर को माना गया है। इस वर्ष चतुर्थी और पंचमी की तिथियों को लेकर पंचांग भेद देखने को मिल रहा है। इसलिए अपने स्थानीय पंचांग को प्राथमिकता देना आवश्यक है।
2 अक्टूबर—षष्ठी और सप्तमी: कुछ पंचांगों में षष्ठी और सप्तमी के श्राद्ध को एक ही दिन बताया गया है, जबकि अन्य गणनाओं में सप्तमी का अलग दिन मिलता है। यही कारण है कि पितृ पक्ष में स्थानीय पंचांग से तिथि की पुष्टि करना महत्वपूर्ण हो जाता है।
3 अक्टूबर—अष्टमी श्राद्ध: अष्टमी तिथि से संबंधित पूर्वजों का श्राद्ध इस दिन किया जाएगा।
4 अक्टूबर—नवमी/मातृ नवमी: नवमी को मातृ नवमी के नाम से भी जाना जाता है। परंपरा में इसे दिवंगत माता तथा परिवार की अन्य दिवंगत महिला सदस्यों के श्राद्ध के लिए विशेष माना जाता है।
5 अक्टूबर—दशमी श्राद्ध: दशमी तिथि को दिवंगत हुए पूर्वजों का श्राद्ध इस दिन किया जाएगा।
6 अक्टूबर—एकादशी श्राद्ध: एकादशी तिथि से संबंधित पूर्वजों का श्राद्ध 6 अक्टूबर को रहेगा।
7 अक्टूबर—द्वादशी और मघा श्राद्ध: द्वादशी श्राद्ध के साथ मघा नक्षत्र से जुड़ा विशेष पितृ कर्म भी इस दिन पड़ रहा है।
8 अक्टूबर—त्रयोदशी श्राद्ध: त्रयोदशी तिथि के अनुसार श्राद्ध 8 अक्टूबर को होगा।
9 अक्टूबर—चतुर्दशी श्राद्ध: चतुर्दशी श्राद्ध 9 अक्टूबर को किया जाएगा। परंपरा में अकाल मृत्यु या असामान्य परिस्थितियों में मृत्यु को प्राप्त हुए लोगों के लिए चतुर्दशी श्राद्ध का विशेष उल्लेख मिलता है।
10 अक्टूबर—सर्वपितृ अमावस्या: पितृ पक्ष का समापन सर्वपितृ अमावस्या से होगा। जिन पूर्वजों की मृत्यु तिथि ज्ञात नहीं है या जिनका नियमित तिथि श्राद्ध किसी कारण से नहीं हो पाता, उनके लिए इस दिन सामूहिक रूप से श्राद्ध और तर्पण करने की परंपरा है।
श्राद्ध में पिंडदान क्यों किया जाता है?
श्राद्ध कर्म में पिंडदान की भी महत्वपूर्ण भूमिका है। परंपरागत रूप से चावल या जौ आदि से पिंड बनाए जाते हैं और उन्हें पितरों के निमित्त अर्पित किया जाता है। पिंडदान का धार्मिक अर्थ पूर्वजों के प्रति श्रद्धा और तृप्ति की भावना से जुड़ा हुआ है।
हालांकि पिंडदान की विधि क्षेत्र और परिवार की परंपरा के अनुसार अलग हो सकती है। गया जैसे प्रमुख तीर्थों पर पिंडदान की विशिष्ट परंपराएं हैं, जबकि घर पर किए जाने वाले श्राद्ध में स्थानीय पुरोहित द्वारा बताए गए विधान का पालन किया जाता है।
श्राद्ध के बाद भोजन और दान की परंपरा
श्राद्ध कर्म के बाद पितरों के निमित्त भोजन तैयार करने और ब्राह्मण को भोजन कराने की परंपरा कई परिवारों में चली आ रही है। पंचबलि की परंपरा में गाय, कौवा, कुत्ता, देव और चींटियों के लिए भोजन निकालने का भी उल्लेख मिलता है। इसके बाद ब्राह्मण भोजन, वस्त्र, अन्न और दक्षिणा देने की परंपरा है।
इन परंपराओं का मुख्य भाव सेवा, दान और पूर्वजों की स्मृति से जुड़ा है। आधुनिक समय में भी अनेक परिवार अपनी क्षमता के अनुसार जरूरतमंदों को भोजन, वस्त्र और अन्य आवश्यक सामग्री दान करते हैं।
क्या श्राद्ध केवल पुरुष ही कर सकते हैं?
श्राद्ध कर्म को केवल पुरुषों तक सीमित मानना एक जटिल विषय है, क्योंकि अलग-अलग धर्मशास्त्रीय परंपराओं और परिवारों में इसके नियम अलग रहे हैं। आज अनेक परिवारों में परिस्थितियों के अनुसार महिलाएं भी अपने माता-पिता अथवा अन्य दिवंगत परिजनों के लिए तर्पण और श्राद्ध कर्म करती हैं।
इसलिए किसी परिवार में यदि परंपरागत कर्ता उपलब्ध न हो तो केवल इसी कारण पितरों का स्मरण छोड़ देना उचित नहीं माना जाना चाहिए। ऐसी स्थिति में परिवार के कुलाचार और स्थानीय विद्वान या पुरोहित की सलाह के अनुसार विधि तय की जा सकती है।
तिथि मालूम न हो तो क्या करें?
कई बार परिवार को दिवंगत व्यक्ति की मृत्यु की सही हिंदू तिथि मालूम नहीं होती। ऐसी स्थिति में सर्वपितृ अमावस्या को विशेष महत्व दिया जाता है। यह दिन उन पूर्वजों के सामूहिक स्मरण के लिए रखा जाता है जिनकी श्राद्ध तिथि ज्ञात नहीं है या जिनका नियमित तिथि श्राद्ध किसी कारण से नहीं हो पाया।
यही कारण है कि पितृ पक्ष की अंतिम अमावस्या को कई परिवार विशेष रूप से अपने सभी ज्ञात-अज्ञात पूर्वजों के लिए तर्पण और श्राद्ध करते हैं।
श्राद्ध करते समय किन बातों का रखें ध्यान?
पितृ कर्म में सबसे महत्वपूर्ण बात श्रद्धा और शुद्ध भावना है। भोजन सात्विक रखने, नशे तथा तामसिक आहार से बचने और कर्मकांड के दौरान संयम बनाए रखने की परंपरा है। श्राद्ध के दिन दिखावे के बजाय सामर्थ्य के अनुसार दान और सेवा को महत्व देना चाहिए।
सबसे जरूरी बात यह है कि तिथि और मुहूर्त को लेकर इंटरनेट पर उपलब्ध किसी एक सूची को अंतिम मानने के बजाय अपने शहर के पंचांग से समय की पुष्टि करें। एक ही दिन के कुतुप, रौहिण और अपराह्न मुहूर्त में शहर के अनुसार अंतर हो सकता है। उदाहरण के लिए दिल्ली में 2 अक्टूबर 2026 को सप्तमी श्राद्ध के लिए कुतुप मुहूर्त 11:46 से 12:34 बजे, रौहिण 12:34 से 1:21 बजे और अपराह्न काल 1:21 से 3:44 बजे तक दिया गया है।
पितृ पक्ष का संदेश केवल कर्मकांड तक सीमित नहीं
पितृ पक्ष भारतीय संस्कृति में स्मृति और पीढ़ियों के बीच संबंध का भी प्रतीक है। पूर्वजों को याद करना केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि परिवार के इतिहास, संस्कार और उन लोगों के योगदान को याद करने का अवसर भी है जिनकी वजह से वर्तमान पीढ़ी अस्तित्व में है।
इसी भाव से देखा जाए तो श्राद्ध का महत्व केवल पिंडदान या तर्पण तक सीमित नहीं है। परिवार में बुजुर्गों का सम्मान, जरूरतमंदों की सहायता, अन्नदान और अपने पूर्वजों के अच्छे संस्कारों को आगे बढ़ाना भी पितृ स्मरण की व्यापक भावना से जुड़ा हुआ माना जा सकता है।
पितृ पक्ष 2026 में 27 सितंबर से 10 अक्टूबर तक चलेगा और इस दौरान मृत्यु तिथि के अनुसार श्राद्ध करने की परंपरा निभाई जाएगी। 26 सितंबर को भाद्रपद पूर्णिमा का श्राद्ध है, जबकि 10 अक्टूबर को सर्वपितृ अमावस्या के साथ पितृ पक्ष का समापन होगा।
श्राद्ध के लिए सामान्यतः कुतुप, रौहिण और अपराह्न काल को महत्वपूर्ण माना गया है, लेकिन इनका वास्तविक समय स्थान के अनुसार बदलता है। इसलिए तर्पण या श्राद्ध करने से पहले स्थानीय पंचांग में तिथि और मुहूर्त अवश्य देखना चाहिए। सबसे बढ़कर, पितृ कर्म का आधार श्रद्धा, स्मरण, कृतज्ञता और सेवा की भावना है।






