
संवाद 24 डेस्क।शारदीय नवरात्रि हिंदू धर्म में शक्ति की उपासना का विशेष पर्व है। इन नौ दिनों में मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा की जाती है, जिन्हें नवदुर्गा के नाम से जाना जाता है। मां शैलपुत्री से लेकर मां सिद्धिदात्री तक प्रत्येक स्वरूप की अपनी धार्मिक मान्यता, पौराणिक कथा और आध्यात्मिक संदेश है। कोई देवी तपस्या और संयम की प्रेरणा देती हैं, तो कोई साहस, करुणा, पवित्रता और ज्ञान का प्रतीक मानी जाती हैं।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मां दुर्गा ने महिषासुर जैसे शक्तिशाली असुर का वध करके अधर्म पर धर्म की विजय का संदेश दिया। यही कारण है कि नवरात्रि को केवल पूजा और व्रत का पर्व नहीं, बल्कि आत्मबल बढ़ाने, मन को संयमित करने और जीवन में सकारात्मकता अपनाने का अवसर भी माना जाता है। अमर उजाला की 11 अक्टूबर 2026 को प्रकाशित रिपोर्ट के संदर्भ में आइए जानते हैं कि नवदुर्गा के नौ स्वरूप कौन-से हैं और उनकी पूजा का क्या महत्व है।
नवरात्रि में नौ देवियों की पूजा का क्या है रहस्य?
नवरात्रि में नौ दिनों तक देवी के अलग-अलग स्वरूपों की आराधना करने की परंपरा का विशेष धार्मिक महत्व है। प्रत्येक स्वरूप शक्ति के एक अलग गुण का प्रतिनिधित्व करता है। इन नौ दिनों में श्रद्धालु व्रत रखते हैं, मंत्रों का जाप करते हैं, दुर्गा सप्तशती का पाठ करते हैं और मां से सुख-समृद्धि, साहस तथा कल्याण की कामना करते हैं।
नवदुर्गा की उपासना को जीवन के नौ आध्यात्मिक गुणों की यात्रा के रूप में भी समझा जा सकता है। दृढ़ संकल्प से शुरुआत करते हुए साधक तपस्या, साहस, ऊर्जा, ममता, पराक्रम, निर्भयता और पवित्रता जैसे गुणों को आत्मसात करने का प्रयास करता है। अंतिम स्वरूप मां सिद्धिदात्री साधना की पूर्णता और आध्यात्मिक उपलब्धि का प्रतीक माना जाता है।
पहला दिन: मां शैलपुत्री देती हैं दृढ़ संकल्प की प्रेरणा
नवरात्रि के पहले दिन मां शैलपुत्री की पूजा की जाती है। शैल का अर्थ पर्वत है और पर्वतराज हिमालय की पुत्री होने के कारण देवी को शैलपुत्री कहा जाता है। उनका वाहन वृषभ यानी बैल है। उनके एक हाथ में त्रिशूल और दूसरे हाथ में कमल सुशोभित रहता है।
मां शैलपुत्री को स्थिरता, शक्ति और दृढ़ विश्वास का प्रतीक माना जाता है। उनकी आराधना भक्तों को कठिन परिस्थितियों में धैर्य बनाए रखने और अपने लक्ष्य की ओर निरंतर बढ़ने की प्रेरणा देती है।
दूसरा दिन: मां ब्रह्मचारिणी की पूजा से मिलता है तपस्या का संदेश
नवरात्रि के दूसरे दिन मां ब्रह्मचारिणी की उपासना होती है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, देवी ने भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए कठोर तपस्या की थी। उनके एक हाथ में जपमाला और दूसरे हाथ में कमंडल होता है।
मां ब्रह्मचारिणी का स्वरूप त्याग, साधना, संयम और धैर्य का प्रतीक है। उनकी पूजा से भक्तों को अपने उद्देश्य के प्रति समर्पित रहने तथा कठिनाइयों के बावजूद प्रयास जारी रखने की प्रेरणा मिलती है।
तीसरा दिन: मां चंद्रघंटा की आराधना से जुड़ा है साहस
नवरात्रि के तीसरे दिन मां चंद्रघंटा की पूजा की जाती है। उनके मस्तक पर घंटे के आकार का अर्धचंद्र सुशोभित होता है, इसी कारण उन्हें चंद्रघंटा कहा जाता है। उनका स्वरूप वीरता, सजगता और निर्भयता का प्रतीक माना जाता है।
धार्मिक मान्यता है कि मां चंद्रघंटा अपने भक्तों को संकटों का सामना करने का साहस प्रदान करती हैं। उनकी पूजा यह संदेश देती है कि जीवन में शांति बनाए रखना महत्वपूर्ण है, लेकिन अन्याय के विरुद्ध खड़े होने के लिए साहस भी आवश्यक है।
चौथा दिन: मां कूष्मांडा हैं सृजन और ऊर्जा की प्रतीक
नवरात्रि के चौथे दिन मां कूष्मांडा की पूजा की जाती है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, देवी ने अपनी दिव्य मुस्कान से ब्रह्मांड की रचना की थी। इसलिए उन्हें सृष्टि में ऊर्जा और प्रकाश का संचार करने वाली देवी माना जाता है।
मां कूष्मांडा का स्वरूप जीवन में उत्साह, सकारात्मकता और नई शुरुआत का संदेश देता है। भक्त उनकी आराधना करके सुख-समृद्धि, स्वास्थ्य और कल्याण की कामना करते हैं। उनकी पूजा हमें यह प्रेरणा देती है कि विपरीत परिस्थितियों में भी आशा और आत्मविश्वास बनाए रखना चाहिए।
पांचवां दिन: मां स्कंदमाता में दिखता है मातृत्व और करुणा का स्वरूप
नवरात्रि के पांचवें दिन मां स्कंदमाता की उपासना की जाती है। भगवान कार्तिकेय का एक नाम स्कंद है। उनकी माता होने के कारण देवी को स्कंदमाता कहा जाता है। उनके स्वरूप में वे बाल स्कंद को गोद में धारण करती हैं।
मां स्कंदमाता को ममता, प्रेम, करुणा और संरक्षण का प्रतीक माना जाता है। उनकी पूजा से जुड़ी धार्मिक मान्यताओं में संतान सुख और परिवार की खुशहाली की कामना भी शामिल है। उनका स्वरूप यह संदेश देता है कि वास्तविक शक्ति केवल पराक्रम में नहीं, बल्कि दूसरों की देखभाल करने और जरूरतमंदों का सहारा बनने में भी है।
छठा दिन: मां कात्यायनी की पूजा से मिलता है अन्याय के विरुद्ध लड़ने का संदेश
नवरात्रि के छठे दिन मां कात्यायनी की आराधना की जाती है। पौराणिक मान्यता के अनुसार, महर्षि कात्यायन की तपस्या से प्रसन्न होकर देवी ने उनके यहां पुत्री के रूप में जन्म लिया, इसलिए उनका नाम कात्यायनी पड़ा।
मां कात्यायनी का स्वरूप पराक्रम, न्याय और धर्म की रक्षा का प्रतीक है। देवी दुर्गा की महिषासुर पर विजय की परंपरा भी शक्ति के इसी पक्ष को उजागर करती है। उनकी पूजा भक्तों को अन्याय का विरोध करने, साहस के साथ निर्णय लेने और अपने कर्तव्यों के प्रति सजग रहने की प्रेरणा देती है।
सातवां दिन: मां कालरात्रि की पूजा क्यों है महत्वपूर्ण?
नवरात्रि के सातवें दिन मां कालरात्रि की उपासना की जाती है। नवदुर्गा के सबसे उग्र स्वरूपों में गिनी जाने वाली मां कालरात्रि को भय, अंधकार और दुष्ट शक्तियों का विनाश करने वाली देवी माना जाता है। धार्मिक चित्रण में उनका वर्ण गहरा, केश खुले और स्वरूप प्रभावशाली दिखाई देता है।
मां कालरात्रि की आराधना का संदेश है कि भय और संकटों से भागने के बजाय उनका सामना करना चाहिए। उनका स्वरूप यह भी दर्शाता है कि शक्ति का उद्देश्य केवल विनाश नहीं, बल्कि बुराई को समाप्त करके कल्याण का मार्ग प्रशस्त करना है।
आठवां दिन: मां महागौरी देती हैं पवित्रता और शांति की प्रेरणा
नवरात्रि के आठवें दिन मां महागौरी की पूजा की जाती है। उनका स्वरूप शांति, निर्मलता और पवित्रता का प्रतीक माना जाता है। धार्मिक चित्रण में देवी श्वेत वस्त्र धारण करती हैं और उनका वाहन वृषभ बताया गया है।
पौराणिक मान्यताओं में मां महागौरी की कथा देवी पार्वती की तपस्या से जुड़ी है। भक्त उनकी पूजा करके सुख-शांति, समृद्धि और मन की शुद्धता की कामना करते हैं। उनका स्वरूप हमें अपने विचारों और व्यवहार में विनम्रता, करुणा तथा सद्भाव बनाए रखने की प्रेरणा देता है।
नौवां दिन: मां सिद्धिदात्री की आराधना से पूर्ण होती है नवदुर्गा की साधना
नवरात्रि के नौवें दिन मां सिद्धिदात्री की पूजा की जाती है। सिद्धिदात्री का अर्थ है सिद्धियां प्रदान करने वाली देवी। उन्हें आध्यात्मिक ज्ञान, साधना और सिद्धि का प्रतीक माना जाता है। उनके चार हाथों में शंख, चक्र, गदा और कमल दर्शाए जाते हैं।
धार्मिक मान्यता के अनुसार, मां सिद्धिदात्री की आराधना से साधक को आध्यात्मिक उन्नति का आशीर्वाद प्राप्त होता है। उनका स्वरूप यह संदेश देता है कि जीवन में सफलता के साथ विवेक, ज्ञान और आत्मिक विकास भी जरूरी हैं।
शारदीय नवरात्रि का संदेश: पूजा के साथ जीवन में भी अपनाएं देवी के गुण
नवदुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा भारतीय धार्मिक परंपरा में शक्ति के विभिन्न रूपों का सम्मान करने का अवसर है। इन नौ देवियों की कथाएं भक्तों को दृढ़ संकल्प, तपस्या, साहस, सृजनशीलता, करुणा, न्याय, निर्भयता, पवित्रता और ज्ञान जैसे गुणों का महत्व समझाती हैं।
नवरात्रि के दौरान श्रद्धालु अपनी परंपरा के अनुसार व्रत, पूजा, मंत्र जाप और दुर्गा सप्तशती का पाठ करते हैं। कई स्थानों पर अष्टमी या नवमी को कन्या पूजन और हवन भी किया जाता है। अलग-अलग क्षेत्रों में पूजा की विधियों में भिन्नता हो सकती है, लेकिन देवी के प्रति श्रद्धा और सदाचार का भाव इस पर्व का केंद्रीय संदेश है।
शारदीय नवरात्रि केवल धार्मिक अनुष्ठानों का पर्व नहीं, बल्कि आत्मचिंतन और सकारात्मक बदलाव का अवसर भी है। मां शैलपुत्री से मां सिद्धिदात्री तक नवदुर्गा के सभी स्वरूप हमें याद दिलाते हैं कि जीवन में शक्ति के साथ करुणा, साहस के साथ विवेक और सफलता के साथ विनम्रता भी जरूरी है। यही नवदुर्गा की उपासना का व्यापक आध्यात्मिक महत्व है।






