
नई दिल्ली। देशभर में मंगलवार, 20 अक्टूबर 2026 को विजयादशमी और दशहरे का पर्व धार्मिक आस्था, पारंपरिक उत्साह और उल्लास के साथ मनाया गया। यह पर्व बुराई पर अच्छाई, अधर्म पर धर्म तथा असत्य पर सत्य की विजय का प्रतीक है। नवरात्र के समापन के साथ देश के विभिन्न हिस्सों में धार्मिक अनुष्ठान, रामलीला और अन्य पारंपरिक कार्यक्रम आयोजित किए गए।
भगवान श्रीराम की विजय से जुड़ी है पर्व की परंपरा
दशहरे का प्रमुख धार्मिक महत्व भगवान श्रीराम द्वारा रावण पर विजय प्राप्त करने की मान्यता से जुड़ा है। रामायण की कथा के माध्यम से यह पर्व संदेश देता है कि अन्याय और अहंकार चाहे कितने ही शक्तिशाली क्यों न हों, अंततः सत्य और धर्म की विजय होती है। इसी मान्यता के चलते दशहरा भारतीय संस्कृति में विशेष स्थान रखता है।
रामलीला और रावण दहन रहे उत्सव के प्रमुख आकर्षण
उत्तर भारत में दशहरे के अवसर पर रामलीला मंचन और रावण दहन की परंपरा विशेष रूप से प्रचलित है। अनेक स्थानों पर रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतलों का दहन किया जाता है। इन आयोजनों के माध्यम से भगवान श्रीराम के आदर्शों और बुराइयों के त्याग का संदेश जन-जन तक पहुंचाया जाता है। देश के विभिन्न क्षेत्रों में स्थानीय परंपराओं के अनुसार उत्सव मनाया गया।
मां दुर्गा की महिषासुर पर विजय का भी है धार्मिक महत्व
विजयादशमी का संबंध केवल रामायण की परंपरा तक सीमित नहीं है। देश के कई हिस्सों में यह पर्व मां दुर्गा की महिषासुर पर विजय के रूप में भी मनाया जाता है। पश्चिम बंगाल सहित पूर्वी भारत के अनेक क्षेत्रों में विजयादशमी के साथ दुर्गा पूजा का समापन होता है तथा परंपरानुसार मां दुर्गा की प्रतिमाओं का विसर्जन किया जाता है। यह पर्व शक्ति, साहस और धर्म की स्थापना का प्रतीक माना जाता है।
राष्ट्रपति ने देशवासियों को दीं विजयादशमी की शुभकामनाएं
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने 19 अक्टूबर को विजयादशमी की पूर्व संध्या पर देशवासियों को शुभकामनाएं दीं। अपने संदेश में उन्होंने भगवान श्रीराम के जीवन से जुड़े धर्म, नैतिक आचरण और न्याय के आदर्शों का उल्लेख किया। उन्होंने देशवासियों से भारतीय सांस्कृतिक विरासत के उच्च आदर्शों पर चलते हुए विकसित भारत और समावेशी समाज के निर्माण में योगदान देने का आह्वान किया।
पर्व का संदेश: अपने भीतर की बुराइयों पर भी पाएं विजय
दशहरा केवल पुतला दहन या उत्सव मनाने का अवसर नहीं, बल्कि आत्ममंथन और सकारात्मक संकल्प लेने का भी पर्व है। यह दिन अहंकार, क्रोध, लोभ, छल और अन्याय जैसी बुराइयों को त्यागकर सत्य, संयम, कर्तव्य और सदाचार के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है। पर्व की सार्थकता तभी है, जब इसके आदर्श हमारे व्यक्तिगत जीवन और सामाजिक व्यवहार में भी दिखाई दें।






