लोहिया अस्पताल में बायो-वेस्ट जलाने से फैला जहरीला धुआं, मरीज-तीमारदार परेशान प्रशासन की चुप्पी पर उठे सवाल
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संवाद 24 संवाददाता। जिला मुख्यालय स्थित डॉ. राममनोहर लोहिया संयुक्त चिकित्सालय में सोमवार रात गंभीर लापरवाही का मामला सामने आया। अस्पताल परिसर में ओपीडी के सामने खाली मैदान में कूड़ा और बायो-मेडिकल वेस्ट जलाए जाने से उठे जहरीले धुएं ने मरीजों और उनके तीमारदारों को घंटों तक परेशान किया। आंखों में जलन, सांस लेने में तकलीफ और घुटन की शिकायतें सामने आईं, लेकिन देर रात तक अस्पताल प्रशासन की ओर से कोई प्रभावी कार्रवाई नहीं की गई।
प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार देर शाम अस्पताल परिसर में पड़े कूड़े के ढेर में आग लगा दी गई। आग धीरे-धीरे बायो कचरे तक पहुंच गई, जिससे काला और तीखा धुआं उठने लगा। ओपीडी और वार्डों के आसपास मौजूद मरीजों व तीमारदारों को नाक-मुंह ढंककर बैठना पड़ा। कई लोगों ने आंखों में तेज जलन और सांस लेने में दिक्कत की शिकायत की।
धुआं देर रात तक फैलता रहा। आग भले ही बाद में स्वयं बुझ गई, लेकिन धुएं की परत लंबे समय तक परिसर में छाई रही। अस्पताल में भर्ती मरीजों, विशेषकर बुजुर्गों और बच्चों को सबसे अधिक परेशानी हुई।
स्थानीय लोगों का कहना है कि अस्पताल परिसर में कूड़ा जलाने की घटना पहली बार नहीं है। अक्सर कूड़े के ढेर को आग लगा दी जाती है, जिससे वार्डों और ओपीडी तक धुआं पहुंचता है। स्वास्थ्य सेवाओं के लिए बनाए गए संवेदनशील परिसर में इस तरह की लापरवाही को लेकर लोगों में नाराजगी है।
तीमारदारों ने आरोप लगाया कि ओपीडी जैसे संवेदनशील स्थान के सामने कचरा जलाना मरीजों की सुरक्षा से खिलवाड़ है। कई लोगों ने कहा कि यदि समय रहते आग फैल जाती तो बड़ा हादसा भी हो सकता था।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार अस्पतालों से निकलने वाला बायो-मेडिकल वेस्ट सामान्य कूड़े की तरह नष्ट नहीं किया जा सकता। इसके निस्तारण के लिए पृथक संग्रह, पैकेजिंग और अधिकृत एजेंसी के माध्यम से वैज्ञानिक विधि से उपचार (इंसिनरेशन/ट्रीटमेंट) अनिवार्य होता है। खुले में जलाने से डाइऑक्सिन, फ्यूरान जैसे जहरीले रसायन वातावरण में फैलते हैं, जो सांस संबंधी रोग, एलर्जी और संक्रमण का खतरा बढ़ाते हैं।
इस तरह खुले में बायो-वेस्ट जलाना न केवल पर्यावरण मानकों का उल्लंघन है बल्कि बायो-मेडिकल वेस्ट मैनेजमेंट नियम 2016 के भी खिलाफ माना जाता है।
घटना के कई घंटे बाद तक जिम्मेदार अधिकारियों की ओर से कोई स्पष्ट प्रतिक्रिया नहीं मिली। न तो तत्काल आग बुझाने की व्यवस्था दिखाई दी और न ही धुएं से प्रभावित मरीजों के लिए विशेष इंतजाम किए गए।
स्थानीय नागरिकों ने जिला प्रशासन से मामले की जांच कर जिम्मेदार कर्मियों के खिलाफ कार्रवाई और अस्पताल परिसर में कचरा प्रबंधन की स्थायी व्यवस्था सुनिश्चित करने की मांग की है।
सरकारी अस्पतालों में पहले ही सीमित संसाधनों और भारी मरीज भार की समस्या रहती है। ऐसे में परिसर के भीतर ही बायो-मेडिकल कचरा जलाया जाना स्वास्थ्य सुरक्षा मानकों पर गंभीर सवाल खड़े करता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय रहते व्यवस्था नहीं सुधारी गई तो संक्रमण और पर्यावरणीय जोखिम दोनों बढ़ सकते हैं।
अब देखना यह होगा कि संबंधित विभाग इस घटना को महज लापरवाही मानकर टाल देता है या इसे सुधार के अवसर के रूप में लेकर अस्पतालों में बायो-वेस्ट प्रबंधन की ठोस व्यवस्था लागू करता है।






