चुनावी खर्च पर ऑडिट की सख्ती: निर्वाचन कार्यालय से जीएसटी का दोहरा भुगतान, 8.03 लाख की वसूली की तैयारी
Share your love

संवाद 24 संवाददाता। विधानसभा चुनाव 2022 की तैयारियों में हुए सरकारी खर्च पर की गई ऑडिट जांच ने वित्तीय अनुशासन पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। निर्वाचन कार्यालय द्वारा किए गए भुगतान में लगभग 8.03 लाख रुपये की वित्तीय अनियमितता सामने आई है। जांच में चयनित फर्म को तय कार्य से अधिक भुगतान और जीएसटी का दोहरा भुगतान किए जाने की पुष्टि हुई है। मामले को गंभीर मानते हुए निर्वाचन आयोग ने जिला प्रशासन से विस्तृत जवाब तलब किया है तथा संबंधित राशि की वसूली की प्रक्रिया शुरू की जा रही है।
वित्तीय वर्ष 2021-22 और 2022-23 के दौरान विधानसभा चुनाव की तैयारियों के लिए निर्वाचन आयोग से प्राप्त बजट में करीब एक करोड़ रुपये खर्च किए गए थे। बाद में हुई ऑडिट जांच में भुगतान संबंधी कई विसंगतियां सामने आईं। आयोग के वित्त नियंत्रक ने 12 जुलाई 2023 को जिला प्रशासन से स्पष्टीकरण मांगा था, लेकिन स्थानीय स्तर से संतोषजनक उत्तर न मिलने पर विभागीय पत्राचार लगातार जारी रहा।
10 नवंबर 2025 को वित्त एवं लेखाधिकारी दीपक चंद्र ने आठ बिंदुओं पर विस्तृत जवाब मांगा और आहरण-वितरण अधिकारी से प्रमाणित अभिलेख, बिल तथा जीएसटी भुगतान के साक्ष्य प्रस्तुत करने को कहा। जून 2025 में अपर जिलाधिकारी द्वारा भेजी गई रिपोर्ट भी आयोग को संतोषजनक नहीं लगी।
अपर जिलाधिकारी अरुण कुमार सिंह ने कहा कि सभी ऑडिट आपत्तियों का नियमानुसार निस्तारण कराया जाएगा और जिम्मेदारी तय की जाएगी।
ऑडिट में पाया गया कि निविदा शर्तों के अनुसार कार्य की दरें कर सहित निर्धारित थीं। इसके बावजूद संबंधित फर्म मेसर्स रॉक्सी रिप्रोग्राफिक्स को 1,88,821 रुपये जीएसटी का भुगतान दो बार कर दिया गया। यह राशि अब संबंधित कर्मचारियों और अधिकारियों से वसूलने की तैयारी की जा रही है।
जांच में मतदाता पर्चियों के मुद्रण भुगतान में भी गड़बड़ी सामने आईनिर्धारित दर: 76 पैसे प्रति ए-4 पृष्ठएक पृष्ठ पर दो पर्चियां छपने से वास्तविक दर: 38 पैसे प्रति पर्चीइसके बावजूद फर्म को 5,21,528 रुपये अधिक भुगतान कर दिया गया। इतना ही नहीं, स्वीकृत दरों में कर शामिल होने के बावजूद 93,008 रुपये जीएसटी अलग से दिए गए। इस प्रकार कुल 8,03,357 रुपये की वसूली प्रस्तावित है।
यह मामला केवल लेखांकन त्रुटि भर नहीं माना जा रहा, बल्कि चुनावी खर्च की निगरानी व्यवस्था की प्रभावशीलता पर भी सवाल उठा रहा है। चुनाव जैसे संवेदनशील और उच्च पारदर्शिता वाले कार्य में वित्तीय प्रक्रियाओं की चूक प्रशासनिक जवाबदेही को सीधे प्रभावित करती है।
निर्वाचन आयोग की सख्ती संकेत देती है कि अब ऑडिट आपत्तियों को औपचारिकता मानकर टालना संभव नहीं होगा। यदि वसूली और जिम्मेदारी तय होती है, तो यह अन्य जिलों के लिए भी वित्तीय अनुशासन का उदाहरण बन सकता हअब निगाहें इस बात पर हैं कि—वसूली किस स्तर से होगी,जिम्मेदारअधिकारी-कर्मचारी कौन चिन्हित होंगे,और क्या विभागीय कार्रवाई भी तय होगी।फिलहाल जिला प्रशासन ने सभी आपत्तियों के निस्तारण का भरोसा दिया है, लेकिन अंतिम निर्णय निर्वाचन आयोग की संतुष्टि पर निर्भर करेगा। चुनावी पारदर्शिता की कसौटी पर यह मामला प्रशासनिक व्यवस्था की महत्वपूर्ण परीक्षा बन गया है।






