
संवाद 24 नई दिल्ली। देश में ग्रीन एनर्जी और स्वच्छ ईंधन की महत्वाकांक्षी दौड़ के बीच केंद्र सरकार ने एक बेहद अप्रत्याशित और बड़ा नीतिगत फैसला लिया है। घरेलू बाजार में मिठास की कमी न हो और आम आदमी की रसोई पर महंगाई का बोझ न बढ़े, इसे ध्यान में रखते हुए सरकार ने एथेनॉल उत्पादन में चीनी और गन्ने के सीधे इस्तेमाल पर पूरी तरह से रोक लगा दी है। तेल विपणन कंपनियों (OMCs) द्वारा सप्लाई वर्ष 2026-27 के लिए जारी नए टेंडर में गन्ने के रस (Sugarcane Juice), शुगर सिरप और बी-हैवी शीरे (B-Heavy Molasses) से एथेनॉल बनाने पर तत्काल प्रभाव से ‘शून्य डायवर्जन’ की नीति लागू कर दी गई है। सरकार के इस कदम से चीनी उद्योग, डिस्टिलरी सेक्टर और शेयर बाजार में हड़कंप मच गया है, वहीं उपभोक्ता बाजार को बड़ी राहत मिलने की उम्मीद जताई जा रही है।
आखिर सरकार को क्यों उठाना पड़ा यह कड़ा कदम?
भारत सरकार पिछले कुछ वर्षों से कच्चे तेल के भारी-भरकम आयात बिल को घटाने और प्रदूषण पर लगाम लगाने के लिए पेट्रोल में 20 प्रतिशत एथेनॉल मिश्रण (E-20) के लक्ष्य को तेजी से हासिल करने में जुटी थी। इस अभियान में अतिरिक्त चीनी और गन्ने का रस डिस्टिलरीज का सबसे प्रमुख कच्चा माल बनकर उभरा था। हालांकि, पिछले दो सत्रों के दौरान देश के प्रमुख गन्ना उत्पादक राज्यों – विशेष रूप से महाराष्ट्र और कर्नाटक – में मानसून की अनिश्चितता और कम बारिश के चलते गन्ने की पैदावार पर गंभीर प्रतिकूल असर पड़ने की आशंका गहरा गई। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी चीनी की आपूर्ति को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है। ऐसे में यदि भारी मात्रा में गन्ने का रस या शीरा ईंधन बनाने में खप जाता, तो घरेलू बाजार में चीनी की भारी किल्लत पैदा हो सकती थी और कीमतें आसमान छूने लगतीं। घरेलू खाद्य सुरक्षा और मूल्य स्थिरता को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हुए नीति निर्माताओं ने साफ निर्देश दिया कि पेट्रोल में मिलाने के लिए अब एक भी दाना चीनी या गन्ने का सीधा रस नहीं दिया जाएगा।
टेंडर की नई शर्तें: 11 अरब लीटर के लक्ष्य से गन्ने का रस बाहर
तेल विपणन कंपनियों द्वारा आगामी आपूर्ति सत्र के लिए करीब 11 अरब (1100 करोड़) लीटर एथेनॉल खरीद के लिए विशाल निविदा जारी की गई है। इस निविदा के नियमों में साफ रेखांकित किया गया है कि गन्ने के रस, चीनी के सिरप या बी-हैवी शीरे से तैयार एथेनॉल के लिए कोई बोली स्वीकार नहीं की जाएगी। अब एथेनॉल निर्माताओं के पास गन्ने से जुड़ा केवल एक ही सीमित विकल्प बचा है – सी-हैवी शीरा (C-Heavy Molasses)। तकनीकी रूप से सी-हैवी शीरा वह अवशेष होता है जिसमें से चीनी पूरी तरह निकाली जा चुकी होती है। इसमें सुक्रोज की मात्रा बहुत कम होती है, जिससे एथेनॉल की रिकवरी और उत्पादन क्षमता काफी घट जाती है।
क्या अब अनाज और मक्के पर टिकेगा ग्रीन फ्यूल का दारोमदार?
इस कड़े फैसले के बाद सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि क्या भारत अपना 20 फीसदी एथेनॉल ब्लेंडिंग का राष्ट्रीय लक्ष्य पूरा कर पाएगा? पेट्रोलियम और खाद्य मंत्रालय के अधिकारियों का मानना है कि पिछले दो वर्षों में देश के बायोफ्यूल इकोसिस्टम में संरचनात्मक बदलाव आया है। आज देश में तैयार होने वाले एथेनॉल का लगभग तीन-चौथाई हिस्सा खाद्यान्न, विशेषकर मक्का (Maize) और टूटे हुए चावल (Damaged Food Grains) से उत्पादित हो रहा है। गन्ने पर निर्भरता 12 फीसदी से घटकर पहले ही एक अंक में आ चुकी थी। सरकार का मानना है कि मक्का आधारित डिस्टिलरीज को बढ़ावा देकर और किसानों को मक्के की खेती के लिए प्रोत्साहित करके इस कमी की भरपाई की जा सकती है। इससे किसानों को नई फसल का विकल्प मिलेगा और चीनी की उपलब्धता पर भी कोई आंच नहीं आएगी।
चीनी मिलों के सामने नकद तरलता और भंडारण का संकट
दूसरी ओर, चीनी उद्योग संगठन और डिस्टिलरी संचालक इस सख्त फैसले से असहज नजर आ रहे हैं। मिल मालिकों का तर्क है कि बीते सालों में सरकार के एथेनॉल ब्लेंडिंग विजन को पूरा करने के लिए उन्होंने भारी बैंक ऋण लेकर अत्याधुनिक डिस्टिलरी प्लांट लगाए थे। चीनी से एथेनॉल बनाने से मिलों को हाथों-हाथ नकद भुगतान मिल जाता था, जिससे वे किसानों के गन्ना मूल्य का भुगतान समय पर कर पाते थे।
अचानक लगे इस पूर्ण प्रतिबंध से मिलों के पास नकदी की कमी (लिक्विडिटी क्रंच) हो सकती है और पहले से प्रोसेस कर रखा गया बी-हैवी शीरा डंप होने का खतरा बढ़ गया है। उद्योग जगत का कहना है कि सरकार को पूर्ण प्रतिबंध लगाने के बजाय एक संतुलित कोटा प्रणाली लागू करनी चाहिए थी, ताकि मिलों का पहिया भी घूमता रहे और बाजार में चीनी की सप्लाई भी सुरक्षित रहे। बहरहाल, केंद्र का यह फैसला यह स्पष्ट संदेश देता है कि जब बात ‘ईंधन बनाम भोजन’ की आती है, तो सरकार की प्राथमिकता देश की जनता की थाली को सुरक्षित और सस्ता रखना ही रहेगी।






