आसमान में गूंजा ‘कोड 7500’: पायलट बोले सब ठीक है, फिर रडार स्क्रीन पर क्यों बजा हाईजैक का सायरन?

संवाद 24 नई दिल्ली। फ्रैंकफर्ट से राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली आ रही एअर इंडिया की अंतरराष्ट्रीय उड़ान में उस वक्त हड़कंप मच गया जब जमीन पर बैठे एयर ट्रैफिक कंट्रोलर्स (ATC) के रडार स्क्रीन पर अचानक एक बेहद खतरनाक अलर्ट फ्लैश होने लगा। विमानन दुनिया में दहशत का दूसरा नाम माना जाने वाला ट्रांसपोंडर ‘कोड 7500’ स्क्रीन पर चमक रहा था। इस गुप्त कोड का सीधा और साफ मतलब होता है – विमान का अपहरण (हाईजैक) या उसमें किसी प्रकार का गैर-कानूनी दखल। आनन-फानन में सुरक्षा एजेंसियों के कान खड़े हो गए, आपातकालीन प्रोटोकॉल सक्रिय कर दिए गए और लगभग 300 यात्रियों से भरे बोइंग 787-9 विमान को तत्काल जयपुर डायवर्ट कर दिया गया। हालांकि, जब कॉकपिट से संपर्क साधा गया तो पायलटों ने किसी भी खतरे से साफ इनकार कर दिया। अब सबसे बड़ा सवाल यही बना हुआ है कि जब सब कुछ सामान्य था, तो फिर यह खौफनाक कोड सिस्टम तक कैसे पहुंचा?

​35 हजार फीट की ऊंचाई पर क्या हुआ था?
​जानकारी के अनुसार, बोइंग 787-9 विमान फ्रैंकफर्ट से दिल्ली की ओर उड़ान पर था। वर्तमान भू-राजनीतिक परिस्थितियों और पाकिस्तानी एयरस्पेस बंद होने के कारण यह विमान लंबे वैकल्पिक मार्ग से होते हुए भारतीय वायुसीमा में दाखिल हुआ था। उड़ान अपने अंतिम चरण की तरफ बढ़ रही थी कि तभी मुंबई एयर ट्रैफिक कंट्रोल (ATC) के रडार सिस्टम पर विमान से ट्रांसपोंडर कोड 7500 रिसीव हुआ। ​नागरिक उड्डयन नियमावली के तहत, रडार स्क्रीन पर 7500 कोड आते ही संबंधित विमान का सिंबल लाल हो जाता है और कंट्रोल रूम में अलार्म बजने लगते हैं। यह संकेत सीधे तौर पर यह बताता है कि विमान अब पायलटों के पूर्ण नियंत्रण में नहीं है या कोई अवांछित तत्व अंदर घुस चुका है।

​पायलटों का दावा: ‘हमने कोई कोड नहीं भेजा’
​अलर्ट मिलते ही मुंबई एटीसी ने तत्परता दिखाते हुए फौरन विमान के पायलटों से संपर्क साधा। पायलटों ने बताया कि फ्लाइट के भीतर हालात पूरी तरह सामान्य हैं, कॉकपिट सुरक्षित है और किसी भी तरह की कोई इमरजेंसी नहीं है। पायलटों ने स्पष्ट रूप से कहा कि उन्होंने ट्रांसपोंडर पर ऐसा कोई कोड सेट ही नहीं किया था। ​इसके बावजूद, विमानन सुरक्षा प्रोटोकॉल इतने कड़े और संवेदनशील होते हैं कि महज मौखिक आश्वासन पर जोखिम नहीं लिया जा सकता। हाईजैक की आशंका के दौरान यह भी माना जाता है कि शायद अपहरणकर्ता के दबाव में पायलट सब कुछ ठीक होने की बात कह रहा हो। इसी आशंका के मद्देनजर निर्धारित मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) का पालन करते हुए दिल्ली की बजाय विमान को तुरंत जयपुर की ओर मोड़ दिया गया।

​जयपुर में आइसोलेशन बे और सघन तलाशी
​जयपुर एयरपोर्ट पर आपात स्थिति घोषित करते हुए विमान को रनवे से दूर एक सुनसान ‘आइसोलेशन बे’ में पार्क कराया गया। वहां सुरक्षा बल, बम निरोधक दस्ता और सीआईएसएफ के कमांडो तैनात थे। विमान में सवार सभी 300 यात्रियों, चालक दल के सदस्यों और उनके समस्त लगेज की बेहद बारीकी से तलाशी ली गई। ​कई घंटों तक चली सघन जांच और सुरक्षा एजेंसियों की संयुक्त पड़ताल के बाद जब किसी भी प्रकार की संदिग्ध गतिविधि या वस्तु नहीं मिली, तब जाकर प्रशासन ने राहत की सांस ली। पूरी तरह संतुष्ट होने के बाद उसी क्रू के साथ विमान को सुरक्षित रूप से दिल्ली के लिए रवाना किया गया।

​गलती से कोड डलने की संभावना ‘खरबों में एक’
​इस पूरे वाकये ने अब एविएशन एक्सपर्ट्स और सुरक्षा एजेंसियों के सामने एक अनसुलझा तकनीकी रहस्य खड़ा कर दिया है। सीनियर पायलट्स का कहना है कि ट्रांसपोंडर में गलती से 7500 कोड सेट हो जाना व्यावहारिक रूप से असंभव है। कॉकपिट में ऐसा कोई सीधा ‘इमरजेंसी बटन’ नहीं होता जिसे गलती से छूने पर यह अलर्ट चला जाए। ट्रांसपोंडर पर हर डिजिट को मैन्युअल रूप से सेलेक्ट करना पड़ता है। आम तौर पर सामान्य संचार विफलता के लिए कोड 7600 और सामान्य आपातकाल के लिए 7700 होता है, जबकि 7500 सिर्फ और सिर्फ हाईजैक के लिए आरक्षित है। ऐसे में पायलट या क्रू की मानवीय भूल की संभावना खरबों में एक मानी जा रही है।

​क्या सॉफ्टवेयर की खामी थी या तकनीकी गड़बड़ी?
​दूसरी तरफ, एयर ट्रैफिक कंट्रोल के अधिकारियों का तर्क है कि मुंबई एटीसी का सिस्टम अत्याधुनिक और नए सॉफ्टवेयर पर संचालित है, जहां खुद-ब-खुद किसी कोड के उत्पन्न होने या सॉफ्टवेयर ग्लिच की गुंजाइश भी न के बराबर है। ​अब डायरेक्टरेट जनरल ऑफ सिविल एविएशन (DGCA), विमानन सुरक्षा ब्यूरो (BCAS) और साइबर सिक्योरिटी विंग संयुक्त रूप से इस रहस्य की तह तक जाने में जुटे हैं। जांच दल विमान के डिजिटल फ्लाइट डेटा रिकॉर्डर, ट्रांसपोंडर यूनिट और ग्राउंड रडार के डेटा पैकेट्स का मिलान कर रहा है ताकि यह साफ हो सके कि यह किसी ग्राउंड सर्वर की तकनीकी गड़बड़ी थी, रेडियो फ्रीक्वेंसी का कोई भ्रम था या ट्रांसपोंडर हार्डवेयर में आया कोई क्षणिक फॉल्ट।

Madhvi Singh
Madhvi Singh

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