
संवाद 24 नई दिल्ली। देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था और चुनावी शुचिता को लेकर सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच छिड़ी राजनीतिक जंग अब देश की सबसे बड़ी अदालत के दहलीज तक पहुंच गई है। मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी ‘स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन’ (SIR) के दौरान बड़े पैमाने पर मतदाताओं के नाम काटे जाने और चुनावी प्रक्रियाओं में गंभीर गड़बड़ियों के आरोपों पर सुप्रीम कोर्ट आज एक बेहद महत्वपूर्ण सुनवाई करने जा रहा है। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी, कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे सहित विपक्षी दलों के प्रमुख नेताओं की ओर से दायर इस संयुक्त याचिका ने चुनाव आयोग की निर्णय प्रक्रिया और तकनीकी व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
सीजेआई की विशेष पीठ करेगी सुनवाई
शीर्ष अदालत की वाद सूची (कौजलिस) के अनुसार, इस संवेदनशील याचिका पर भारत के प्रधान न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत और जस्टिस जोयमाल्या बागची की पीठ सुनवाई करने जा रही है। विपक्षी खेमे की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी सहित कई दिग्गज कानूनविद अदालत में पक्ष रखने के लिए तैयार हैं। याचिकाकर्ताओं में राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खरगे के अतिरिक्त समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव, राजद नेता तेजस्वी यादव, तृणमूल कांग्रेस सांसद सौगत राय, शिवसेना (यूबीटी) नेता संजय राउत और वामपंथी दलों के प्रमुख नेता शामिल हैं। विपक्षी दलों का आरोप है कि यह याचिका केवल किसी एक दल का सियासी एजेंडा नहीं, बल्कि देश के करोड़ों मतदाताओं के संवैधानिक मताधिकार की सुरक्षा का सवाल है।
विपक्ष की सुप्रीम कोर्ट से क्या हैं प्रमुख मांगें?
विपक्ष द्वारा दायर इस जनहित याचिका (PIL) में चुनाव आयोग द्वारा संचालित एसआईआर प्रक्रिया पर तीखे आरोप लगाते हुए कई बड़ी राहतों की गुहार लगाई गई है:
रिटायर्ड जज की अगुवाई में स्वतंत्र जांच समिति: याचिकाकर्ताओं की सबसे प्रमुख मांग है कि सुप्रीम कोर्ट के किसी सेवानिवृत्त न्यायाधीश की अध्यक्षता में तकनीकी विशेषज्ञों और प्रतिष्ठित हस्तियों की एक स्वतंत्र समिति बनाई जाए। यह समिति मतदाता सूची में किए गए बदलावों, हटाए गए नामों और चुनाव आयोग के डिजिटल डेटाबेस का व्यापक ऑडिट करे।
बिना नोटिस और सुनवाई नाम हटाने पर रोक: अदालत से गुहार लगाई गई है कि किसी भी वैध नागरिक का नाम बिना पूर्व कानूनी नोटिस और उचित सुनवाई का अवसर दिए बिना मतदाता सूची से न हटाया जाए।
एसआईआर प्रक्रिया पर अंतरिम रोक: जब तक इस पूरी प्रक्रिया की पारदर्शिता और संवैधानिक वैधता की गहन पड़ताल नहीं हो जाती, तब तक देशभर में चल रही एसआईआर कार्रवाई पर फौरी तौर पर अंतरिम रोक लगाई जाए।
हटाए गए वोटरों का ब्यौरा हो सार्वजनिक: प्रक्रिया के दौरान जिन मतदाताओं के नाम सूची से बाहर किए गए हैं, उनके नाम, कारण और बूथ-वार आंकड़े सार्वजनिक पोर्टल पर जारी किए जाएं ताकि प्रभावित नागरिक पुनः अपना दावा पेश कर सकें।
चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली और डिजिटल सिस्टम पर सवाल
याचिका में केवल जमीनी सर्वे पर ही नहीं, बल्कि चुनाव आयोग के आंतरिक कामकाज और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स (ECINET और ERONET) की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठाए गए हैं। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों के बीच सामूहिक निर्णय लेने की संवैधानिक मर्यादा का उल्लंघन हुआ है। 1995 के ऐतिहासिक टी. एन. शेषन मामले के फैसले का हवाला देते हुए कहा गया है कि आयोग के सभी महत्वपूर्ण निर्णय सर्वसम्मति या बहुमत से होने चाहिए। इसके अलावा, फॉर्म-6 में किए गए ऑनलाइन बदलावों और पंजाब समेत कई राज्यों में लाखों मतदाताओं के नाम मैपिंग न हो पाने के कारण ड्राफ्ट लिस्ट से बाहर होने के आंकड़े अदालत के समक्ष रखे गए हैं। विपक्ष का आरोप है कि सॉफ्टवेयर में ‘रोलबैक’ या गलतियों को तुरंत सुधारने का पुख्ता तंत्र न होने के कारण वास्तविक मतदाताओं के नाम कटने का गंभीर जोखिम पैदा हो गया है।
लोकतंत्र की बुनियाद और अदालत का रुख
दूसरी तरफ, चुनाव आयोग का यह रुख रहा है कि एसआईआर एक नियमित और जरूरी संवैधानिक प्रक्रिया है, जिसका उद्देश्य मतदाता सूची से दोहरे नाम (डुप्लिकेट), स्थानांतरित मतदाता और मृत व्यक्तियों के नाम हटाकर सूची को त्रुटिरहित बनाना है। आयोग के अनुसार ड्राफ्ट स्तर पर चिह्नित किए गए नामों को अंतिम रूप से हटाने से पहले नियमानुसार सत्यापन किया जाता है। अब सबकी निगाहें सुप्रीम कोर्ट के एजलास पर टिकी हैं। क्या शीर्ष अदालत चुनाव आयोग की फाइलों और डिजिटल रिकॉर्ड का स्वतंत्र ऑडिट कराने का निर्देश देगी? या फिर आयोग की दलीलों को स्वीकार करते हुए प्रक्रिया को निर्बाध जारी रखने की अनुमति मिलेगी? आज होने वाली यह सुनवाई न केवल आगामी चुनावों की दिशा तय करेगी, बल्कि भारतीय लोकतंत्र में मतदाता अधिकारों के संरक्षण का एक नया पैमाना भी तय कर सकती है।






