
संवाद 24 मध्य प्रदेश। राज्यसभा चुनाव को लेकर राजनीतिक माहौल लगातार गर्माता जा रहा है। कांग्रेस प्रत्याशी मीनाक्षी नटराजन का नामांकन रद्द होने के बाद पार्टी ने इसे लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर बड़ा सवाल बताते हुए विरोध का मोर्चा खोल दिया है। इसी कड़ी में कांग्रेस नेताओं ने भोपाल स्थित चुनाव आयोग कार्यालय के बाहर धरना दिया और अब बुधवार को भूख हड़ताल के जरिए अपना विरोध दर्ज कराने का फैसला किया है। पार्टी का आरोप है कि उसके उम्मीदवार के साथ अन्याय किया गया है और चुनावी प्रक्रिया को प्रभावित करने की कोशिश की जा रही है।
नामांकन रद्द होने के बाद बढ़ा राजनीतिक विवाद
राज्यसभा की तीन सीटों के लिए होने वाले चुनाव से पहले कांग्रेस उम्मीदवार मीनाक्षी नटराजन का नामांकन रद्द किए जाने से प्रदेश की राजनीति में हलचल मच गई। नामांकन पत्रों की जांच के दौरान उन पर एक मामले की जानकारी हलफनामे में नहीं देने का आरोप लगाया गया, जिसके आधार पर निर्वाचन अधिकारी ने उनका नामांकन निरस्त कर दिया। भाजपा ने इस फैसले को नियमों के अनुरूप बताया, जबकि कांग्रेस ने इसे राजनीतिक दबाव और लोकतांत्रिक अधिकारों का हनन करार दिया है।
चुनाव आयोग के खिलाफ कांग्रेस का प्रदर्शन
नामांकन रद्द होने के बाद कांग्रेस नेताओं और कार्यकर्ताओं ने चुनाव आयोग के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। पार्टी नेताओं ने भोपाल में धरना प्रदर्शन कर फैसले पर पुनर्विचार की मांग उठाई। कांग्रेस का कहना है कि उम्मीदवार के खिलाफ ऐसा कोई मामला नहीं था, जिसके आधार पर नामांकन रद्द किया जा सके। पार्टी नेताओं का आरोप है कि तकनीकी आधार पर लोकतांत्रिक प्रक्रिया को प्रभावित करने का प्रयास किया गया है।
भूख हड़ताल के जरिए बढ़ेगा दबाव
कांग्रेस ने अपने विरोध को और तेज करने का निर्णय लेते हुए भूख हड़ताल की घोषणा की है। पार्टी नेताओं का कहना है कि जब तक मामले में निष्पक्ष सुनवाई नहीं होती और न्याय सुनिश्चित नहीं किया जाता, तब तक आंदोलन जारी रहेगा। कांग्रेस का दावा है कि यह केवल एक उम्मीदवार का मामला नहीं बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों और चुनावी पारदर्शिता की रक्षा का मुद्दा है।
दिल्ली तक पहुंचा मामला
विवाद केवल भोपाल तक सीमित नहीं रहा। कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं ने भी इस मुद्दे को राष्ट्रीय स्तर पर उठाया है। पार्टी के प्रतिनिधिमंडल ने चुनाव आयोग से मुलाकात का समय मांगा और पूरे मामले की शिकायत दर्ज कराई। कांग्रेस नेतृत्व का कहना है कि राज्यसभा चुनाव जैसी महत्वपूर्ण प्रक्रिया में निष्पक्षता बनाए रखना चुनाव आयोग की जिम्मेदारी है और यदि किसी उम्मीदवार को गलत तरीके से बाहर किया गया है तो इसकी समीक्षा होनी चाहिए।
भाजपा और कांग्रेस आमने-सामने
इस पूरे विवाद को लेकर भाजपा और कांग्रेस के बीच आरोप-प्रत्यारोप का दौर भी तेज हो गया है। भाजपा का कहना है कि नामांकन जांच की प्रक्रिया पूरी तरह नियमों के तहत हुई है और किसी भी उम्मीदवार को कानून से ऊपर नहीं माना जा सकता। वहीं कांग्रेस इसे राजनीतिक साजिश बताते हुए लगातार सवाल उठा रही है। दोनों दलों के बयानबाजी के कारण राज्यसभा चुनाव का मुद्दा अब प्रदेश की राजनीति का सबसे बड़ा विषय बन गया है।
राज्यसभा चुनाव पर टिकी निगाहें
18 जून को होने वाले राज्यसभा चुनाव से पहले यह विवाद और अधिक गहराने की संभावना है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि नामांकन रद्द होने की घटना का असर चुनावी रणनीतियों पर भी पड़ सकता है। कांग्रेस जहां इसे लोकतंत्र बचाने की लड़ाई बता रही है, वहीं भाजपा नियमों के पालन की बात कर रही है। ऐसे में आने वाले दिनों में चुनाव आयोग की भूमिका और राजनीतिक दलों की गतिविधियों पर सभी की नजरें टिकी रहेंगी। कुल मिलाकर, राज्यसभा चुनाव से पहले मध्य प्रदेश की राजनीति में नया विवाद खड़ा हो गया है। कांग्रेस का धरना और भूख हड़ताल इस बात का संकेत है कि पार्टी इस मुद्दे को लेकर पीछे हटने के मूड में नहीं है। अब देखना होगा कि चुनाव आयोग और राजनीतिक दलों की अगली रणनीति इस मामले को किस दिशा में ले जाती है।






