प्रणव (ॐ) मंत्र योग: ध्वनि, चेतना और आत्मजागरण का वैज्ञानिक एवं आध्यात्मिक मार्ग

संवाद 24 डेस्क। भारतीय योग परंपरा में प्रणव मंत्र (ॐ) को केवल एक धार्मिक प्रतीक नहीं, बल्कि चेतना की मूल ध्वनि माना गया है। यह मंत्र वेदों, उपनिषदों, योगशास्त्र और ध्यान परंपराओं में अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान रखता है। योग के अनेक मार्गों—राजयोग, ज्ञानयोग, भक्तियोग और मंत्रयोग—में ॐ का जप मन को एकाग्र करने, आंतरिक शांति प्राप्त करने और आत्मबोध की दिशा में अग्रसर होने का साधन माना गया है।
आधुनिक जीवन में बढ़ते तनाव, मानसिक अशांति, अनिद्रा और एकाग्रता की कमी के बीच प्रणव मंत्र योग पुनः वैश्विक स्तर पर ध्यान आकर्षित कर रहा है। वैज्ञानिक अध्ययनों में भी यह पाया गया है कि नियंत्रित श्वास के साथ ॐ का उच्चारण तंत्रिका तंत्र को शांत करने, हृदय गति को संतुलित करने और मानसिक तनाव को कम करने में सहायक हो सकता है।

प्रणव मंत्र योग का उद्देश्य केवल ध्वनि उत्पन्न करना नहीं है; इसका वास्तविक लक्ष्य व्यक्ति को बाहरी विकर्षणों से हटाकर उसकी आंतरिक चेतना से जोड़ना है। यही कारण है कि इसे योग में ध्यान की तैयारी, मन की शुद्धि और आत्मिक जागरण का प्रभावी साधन माना गया है।
प्रणव (ॐ) मंत्र का अर्थ और स्वरूप
ॐ, जिसे ओम्, औम् या प्रणव भी कहा जाता है, संस्कृत का एक पवित्र ध्वनि-चिह्न है। उपनिषदों में इसे ब्रह्म की ध्वनि कहा गया है—अर्थात वह मूल स्पंदन जिससे सम्पूर्ण सृष्टि की उत्पत्ति मानी जाती है।
प्रणव शब्द का अर्थ है—“सर्वोच्च ध्वनि” या “वह ध्वनि जो जीवन को आगे बढ़ाती है”। ॐ तीन ध्वनियों से मिलकर बना माना जाता है:
अ (A) – जाग्रत अवस्था का प्रतीक
उ (U) – स्वप्न अवस्था का प्रतीक
म (M) – सुषुप्ति (गहरी निद्रा) अवस्था का प्रतीक

इन तीनों ध्वनियों के बाद आने वाला मौन चौथी अवस्था तुरीय का संकेत माना जाता है, जो शुद्ध चेतना या आत्मानुभूति की अवस्था है।
इस प्रकार ॐ केवल एक शब्द नहीं, बल्कि मानव चेतना की सम्पूर्ण यात्रा का प्रतीक है—जाग्रत से स्वप्न, स्वप्न से सुषुप्ति और अंततः तुरीय अवस्था तक।
योग दर्शन में प्रणव मंत्र का स्थान
पतंजलि योगसूत्र में प्रणव मंत्र का विशेष उल्लेख मिलता है। योगसूत्र (1.27) में कहा गया है:
“तस्य वाचकः प्रणवः”
अर्थात ईश्वर का वाचक (प्रतीकात्मक ध्वनि) प्रणव अर्थात ॐ है। इसके बाद योगसूत्र (1.28) में कहा गया है कि इस मंत्र का जप और उसके अर्थ का चिंतन मन की एकाग्रता और आंतरिक स्थिरता को बढ़ाता है।

योग दर्शन में मन को चंचलता से मुक्त कर एक बिंदु पर स्थिर करना अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है। प्रणव मंत्र इस कार्य में सहायक माना जाता है क्योंकि इसकी ध्वनि लंबी, गूँजदार और लयबद्ध होती है। जब साधक इसे श्वास के साथ उच्चारित करता है, तो मन धीरे-धीरे बाहरी विचारों से हटकर ध्वनि के अनुभव में स्थिर होने लगता है।
मंत्रयोग में ॐ को सभी मंत्रों का मूल माना गया है। अनेक वैदिक मंत्रों और ध्यान प्रक्रियाओं की शुरुआत ॐ से की जाती है, क्योंकि इसे चेतना को पवित्र और केंद्रित करने वाला माना जाता है।
प्रणव मंत्र योग की प्रक्रिया

प्रणव मंत्र योग का अभ्यास सरल दिखाई देता है, किंतु इसे सही विधि से करने पर इसका प्रभाव अधिक गहरा होता है। अभ्यास के लिए निम्नलिखित चरण उपयोगी माने जाते हैं:
तैयारी
शांत और स्वच्छ स्थान चुनें।
सुखासन, पद्मासन या किसी स्थिर आसन में बैठें।
रीढ़ सीधी रखें और शरीर को सहज रखें।
आँखें बंद कर कुछ क्षण सामान्य श्वास लें।
उच्चारण की विधि
नाक से गहरी श्वास लें।
श्वास छोड़ते हुए “अ” ध्वनि से प्रारंभ करें।
धीरे-धीरे ध्वनि को “उ” में प्रवाहित करें।
अंत में होंठ बंद कर “म्” की गूँज उत्पन्न करें।
ध्वनि समाप्त होने के बाद कुछ क्षण मौन में रहें।
महत्वपूर्ण बिंदु
ध्वनि को जोर से नहीं, बल्कि सहज और लंबा रखें।
श्वास और ध्वनि की लय एक समान रखें।
ध्यान ध्वनि के कंपन पर केंद्रित रखें।
प्रारंभ में 5–10 मिनट पर्याप्त हैं; धीरे-धीरे समय बढ़ाया जा सकता है।
प्रणव मंत्र योग में केवल उच्चारण ही नहीं, बल्कि ध्वनि के बाद आने वाला मौन भी महत्वपूर्ण माना जाता है। यही मौन मन को सूक्ष्म स्तर पर शांत करने में सहायक होता है।

आध्यात्मिक और दार्शनिक महत्व
भारतीय दर्शन में ॐ को नाद ब्रह्म कहा गया है, जिसका अर्थ है—“सृष्टि स्वयं ध्वनि का रूप है।” यह विचार बताता है कि ब्रह्मांड में प्रत्येक वस्तु किसी न किसी स्तर पर स्पंदित हो रही है।
प्रणव मंत्र योग का अभ्यास साधक को इन स्पंदनों के प्रति अधिक संवेदनशील बनाता है। नियमित अभ्यास से व्यक्ति बाहरी शोर से हटकर अपनी आंतरिक ध्वनि, श्वास और चेतना के अनुभव के निकट आ सकता है।
उपनिषदों में ॐ को आत्मा और परमात्मा के बीच सेतु माना गया है। इसका चिंतन व्यक्ति को निम्न अनुभवों की ओर ले जा सकता है:
आत्मचिंतन
अहंकार में कमी
आंतरिक शांति
साक्षीभाव
ध्यान की गहराई
हालाँकि इन अनुभवों की तीव्रता व्यक्ति की साधना, एकाग्रता और नियमितता पर निर्भर करती है।

प्रणव (ॐ) मंत्र योग का वैज्ञानिक पक्ष
यद्यपि प्रणव मंत्र योग की उत्पत्ति प्राचीन भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में हुई है, किंतु पिछले कुछ दशकों में चिकित्सा एवं तंत्रिका विज्ञान (Neuroscience) के क्षेत्र में भी इसके प्रभावों पर अध्ययन किए गए हैं। इन अध्ययनों से यह संकेत मिलता है कि नियंत्रित श्वास के साथ ‘ॐ’ का नियमित एवं सजग उच्चारण शरीर और मस्तिष्क पर सकारात्मक प्रभाव डाल सकता है।

जब कोई व्यक्ति लंबी श्वास लेकर धीमी गति से “ॐ” का उच्चारण करता है, तब श्वास छोड़ने की अवधि बढ़ जाती है। इससे शरीर का पैरासिम्पेथेटिक नर्वस सिस्टम (Parasympathetic Nervous System) अधिक सक्रिय होता है, जिसे शरीर की “आराम और पुनर्स्थापन” (Rest and Digest) प्रणाली भी कहा जाता है। इसके सक्रिय होने से हृदय गति संतुलित होती है, रक्तचाप नियंत्रित रहने में सहायता मिलती है तथा मानसिक तनाव कम होने लगता है।

कुछ वैज्ञानिक अध्ययनों में यह भी देखा गया है कि ॐ के कंपन से गले, छाती और सिर के विभिन्न भागों में सूक्ष्म कंपन उत्पन्न होते हैं। ये कंपन ध्यान की अवस्था को गहरा करने तथा मानसिक एकाग्रता बढ़ाने में सहायक हो सकते हैं। हालांकि इन प्रभावों की सीमा व्यक्ति विशेष तथा अभ्यास की नियमितता पर निर्भर करती है।
आधुनिक मनोविज्ञान यह भी स्वीकार करता है कि यदि कोई व्यक्ति प्रतिदिन कुछ मिनट शांत वातावरण में ध्यानपूर्वक मंत्र जप करता है, तो उसके विचारों की गति धीमी होती है और भावनात्मक संतुलन में सुधार आ सकता है।

प्रणव मंत्र योग के प्रमुख लाभ
प्रणव मंत्र योग का प्रभाव केवल आध्यात्मिक जीवन तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका सकारात्मक प्रभाव मानसिक, शारीरिक और भावनात्मक स्वास्थ्य पर भी देखा गया है। नियमित अभ्यास निम्नलिखित लाभ प्रदान कर सकता है।

मानसिक लाभ
आज की तेज़ रफ्तार जीवनशैली में मानसिक तनाव सामान्य समस्या बन चुका है। ऐसे में प्रणव मंत्र योग मन को स्थिर करने का प्रभावी माध्यम बन सकता है।
नियमित अभ्यास से—

  • मानसिक तनाव कम करने में सहायता मिल सकती है।
  • चिंता और बेचैनी में कमी अनुभव हो सकती है।
  • मन की चंचलता धीरे-धीरे घटने लगती है।
  • सकारात्मक सोच विकसित होने में सहायता मिलती है।
  • निर्णय लेने की क्षमता बेहतर हो सकती है।
  • आत्मविश्वास और मानसिक दृढ़ता में वृद्धि हो सकती है।
    जब व्यक्ति ध्यानपूर्वक मंत्र का उच्चारण करता है, तब उसका ध्यान वर्तमान क्षण में केंद्रित होने लगता है। यही अभ्यास धीरे-धीरे मानसिक स्पष्टता को विकसित करता है।

शारीरिक लाभ
यद्यपि प्रणव मंत्र योग कोई चिकित्सीय उपचार नहीं है, फिर भी नियमित अभ्यास शरीर की अनेक प्राकृतिक प्रक्रियाओं को संतुलित रखने में सहायक माना जाता है।
संभावित लाभ—

  • श्वास की लय में सुधार
  • फेफड़ों की कार्यक्षमता बढ़ाने में सहायता
  • हृदय गति को संतुलित रखने में सहयोग
  • रक्तचाप को नियंत्रित रखने में सहायक अभ्यास
  • गले एवं स्वरयंत्र की मांसपेशियों का संतुलित उपयोग
  • शरीर में विश्राम की अनुभूति
    जब श्वास धीमी और गहरी होती है, तब शरीर में ऑक्सीजन का संतुलित प्रवाह होता है, जिससे थकान कम महसूस हो सकती है।

भावनात्मक लाभ
मानव जीवन केवल शरीर और बुद्धि तक सीमित नहीं है; भावनाएँ भी उसके व्यक्तित्व का महत्वपूर्ण भाग हैं। प्रणव मंत्र योग भावनात्मक संतुलन विकसित करने में भी सहायक माना जाता है।
नियमित अभ्यास से—

  • क्रोध की तीव्रता कम हो सकती है।
  • धैर्य और सहनशीलता बढ़ सकती है।
  • भावनात्मक प्रतिक्रियाओं पर नियंत्रण विकसित हो सकता है।
  • सकारात्मक दृष्टिकोण विकसित होता है।
  • संबंधों में मधुरता लाने में सहायता मिल सकती है।
    धीरे-धीरे व्यक्ति परिस्थितियों पर तुरंत प्रतिक्रिया देने के बजाय उन्हें समझने और स्वीकार करने की क्षमता विकसित करता है।

आध्यात्मिक लाभ
योगशास्त्र में प्रणव मंत्र को आत्मिक उन्नति का श्रेष्ठ साधन माना गया है।
नियमित साधना से—

  • ध्यान की गहराई बढ़ती है।
  • आत्मचिंतन की प्रवृत्ति विकसित होती है।
  • आंतरिक शांति का अनुभव बढ़ सकता है।
  • अहंकार और नकारात्मक भावनाओं में कमी आ सकती है।
  • साक्षीभाव का विकास होता है।
  • ईश्वर, प्रकृति अथवा अपने वास्तविक स्वरूप के प्रति गहरा जुड़ाव अनुभव हो सकता है।
    इन अनुभवों की प्रकृति प्रत्येक साधक के लिए भिन्न हो सकती है, इसलिए इन्हें व्यक्तिगत साधना का विषय माना जाता है।

दैनिक जीवन में प्रणव मंत्र योग का महत्व
प्रणव मंत्र योग केवल आश्रमों या योग केंद्रों तक सीमित अभ्यास नहीं है। इसे सामान्य जीवन में भी आसानी से अपनाया जा सकता है।
एक विद्यार्थी परीक्षा से पहले पाँच मिनट ॐ का ध्यानपूर्वक जप कर मन को शांत कर सकता है। कार्यालय में कार्यरत व्यक्ति दिनभर के तनाव के बाद इसका अभ्यास करके मानसिक विश्राम प्राप्त कर सकता है। वरिष्ठ नागरिक इसे सुबह की दिनचर्या का हिस्सा बनाकर मानसिक संतुलन और सकारात्मकता बनाए रख सकते हैं।

आज अनेक कॉर्पोरेट संस्थान, विद्यालय और योग केंद्र भी ध्यान एवं माइंडफुलनेस कार्यक्रमों में मंत्र ध्यान को शामिल कर रहे हैं। इसका उद्देश्य कर्मचारियों और विद्यार्थियों की एकाग्रता, मानसिक स्वास्थ्य तथा कार्यक्षमता को बेहतर बनाना है।
प्रणव मंत्र योग की सबसे बड़ी विशेषता इसकी सरलता है। इसे किसी विशेष उपकरण, स्थान या आर्थिक संसाधन की आवश्यकता नहीं होती। केवल कुछ मिनट का नियमित अभ्यास भी लाभदायक हो सकता है।

किन लोगों को विशेष सावधानी बरतनी चाहिए?
यद्यपि प्रणव मंत्र योग सामान्यतः सुरक्षित अभ्यास माना जाता है, फिर भी कुछ परिस्थितियों में सावधानी आवश्यक है।

  • यदि किसी व्यक्ति को गंभीर मानसिक या तंत्रिका संबंधी रोग है, तो विशेषज्ञ की सलाह लेकर अभ्यास करना चाहिए।
  • यदि लंबे समय तक श्वास रोकने में कठिनाई हो, तो श्वास को सामान्य रखते हुए अभ्यास करें।
  • अत्यधिक तेज आवाज़ में मंत्र का उच्चारण करने के बजाय सहज एवं प्राकृतिक ध्वनि रखें।
  • अभ्यास के दौरान चक्कर, बेचैनी या असुविधा महसूस होने पर तुरंत रुककर सामान्य श्वास लें।
    यह ध्यान रखना आवश्यक है कि प्रणव मंत्र योग चिकित्सा का विकल्प नहीं, बल्कि स्वस्थ जीवनशैली का एक पूरक अभ्यास है।

प्रणव मंत्र योग के अभ्यास में होने वाली सामान्य गलतियाँ
प्रणव (ॐ) मंत्र योग देखने में सरल प्रतीत होता है, लेकिन इसके प्रभाव अभ्यास की शुद्धता, नियमितता और सजगता पर निर्भर करते हैं। कई लोग केवल ध्वनि का उच्चारण करके ही इसे पूर्ण अभ्यास मान लेते हैं, जबकि वास्तव में इसमें श्वास, ध्यान, ध्वनि और मौन—चारों का संतुलित समन्वय आवश्यक होता है।

सबसे सामान्य गलती बहुत तेज़ या अत्यधिक ऊँची आवाज़ में ॐ का उच्चारण करना है। इससे गले पर अनावश्यक दबाव पड़ सकता है और ध्यान ध्वनि की गुणवत्ता के बजाय उसकी तीव्रता पर केंद्रित हो जाता है। मंत्र का उच्चारण सहज, मधुर और लंबा होना चाहिए।
दूसरी सामान्य त्रुटि जल्दबाज़ी में अभ्यास करना है। कई लोग कुछ ही सेकंड में “ॐ” बोलकर अगला जप प्रारंभ कर देते हैं। जबकि प्रत्येक उच्चारण के बाद कुछ क्षण का मौन भी उतना ही महत्वपूर्ण माना जाता है, क्योंकि इसी दौरान मन ध्वनि के सूक्ष्म प्रभाव का अनुभव करता है।

कुछ साधक अभ्यास करते समय मन में आने वाले विचारों से परेशान हो जाते हैं। वास्तव में विचारों का आना स्वाभाविक प्रक्रिया है। उद्देश्य उन्हें बलपूर्वक रोकना नहीं, बल्कि बिना प्रतिक्रिया दिए पुनः ध्वनि और श्वास पर ध्यान केंद्रित करना है।
इसके अतिरिक्त अनियमित अभ्यास भी अपेक्षित परिणामों में बाधा बन सकता है। यदि प्रतिदिन केवल पाँच से दस मिनट भी नियमित रूप से अभ्यास किया जाए, तो उसके लाभ अनियमित और लंबे अभ्यास की तुलना में अधिक स्थायी हो सकते हैं।

प्रभावी अभ्यास के लिए उपयोगी सुझाव
प्रणव मंत्र योग से अधिकतम लाभ प्राप्त करने के लिए कुछ व्यावहारिक बातों का ध्यान रखना आवश्यक है।
प्रातःकाल ब्रह्ममुहूर्त अथवा सूर्योदय के बाद का समय अभ्यास के लिए सर्वोत्तम माना जाता है, क्योंकि उस समय वातावरण अपेक्षाकृत शांत होता है और मन भी अधिक स्थिर रहता है। यदि सुबह संभव न हो, तो सायंकाल भी इसका अभ्यास किया जा सकता है।

अभ्यास से पहले मोबाइल, टेलीविजन अथवा अन्य इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों से दूरी बनाना एकाग्रता बढ़ाने में सहायक होता है। शांत वातावरण में बैठकर कुछ गहरी श्वास लेने के बाद मंत्र-जप प्रारंभ करना बेहतर माना जाता है।
यदि संभव हो तो प्रतिदिन एक ही स्थान और एक ही समय पर अभ्यास करें। इससे मन उस वातावरण के साथ सहज रूप से जुड़ने लगता है और ध्यान की अवस्था अपेक्षाकृत शीघ्र प्राप्त होती है।

शुरुआत में पाँच मिनट का अभ्यास पर्याप्त है। धीरे-धीरे समय को दस, पंद्रह अथवा बीस मिनट तक बढ़ाया जा सकता है। अभ्यास की अवधि से अधिक महत्वपूर्ण उसकी नियमितता और सजगता है।

आधुनिक जीवन में प्रणव मंत्र योग की प्रासंगिकता
आज का युग तीव्र प्रतिस्पर्धा, डिजिटल व्यस्तता और निरंतर मानसिक दबाव का युग है। ऐसे समय में व्यक्ति के पास भौतिक सुविधाएँ तो बढ़ी हैं, लेकिन मानसिक शांति और आत्मिक संतुलन बनाए रखना चुनौतीपूर्ण होता जा रहा है।
प्रणव मंत्र योग आधुनिक जीवन के लिए इसलिए भी प्रासंगिक है क्योंकि यह किसी विशेष धर्म, आयु या पेशे तक सीमित नहीं है। विद्यार्थी अपनी एकाग्रता बढ़ाने के लिए, पेशेवर लोग तनाव कम करने के लिए, गृहिणियाँ मानसिक संतुलन बनाए रखने के लिए और वरिष्ठ नागरिक आत्मिक शांति के लिए इसका अभ्यास कर सकते हैं।

डिजिटल उपकरणों पर अत्यधिक समय बिताने से मस्तिष्क निरंतर सूचनाओं के दबाव में रहता है। ऐसे में प्रतिदिन कुछ मिनट का प्रणव मंत्र ध्यान मन को विश्राम देने और मानसिक स्पष्टता विकसित करने का प्रभावी माध्यम बन सकता है।
यह अभ्यास व्यक्ति को वर्तमान क्षण में जीने, प्रतिक्रियात्मक व्यवहार को कम करने तथा जीवन के प्रति अधिक संतुलित दृष्टिकोण विकसित करने की प्रेरणा देता है।

प्रणव (ॐ) मंत्र योग भारतीय ज्ञान परंपरा की ऐसी अमूल्य साधना है, जिसने हजारों वर्षों से मानव जीवन को मानसिक शांति, आध्यात्मिक उन्नति और आत्मबोध की दिशा प्रदान की है। इसकी विशेषता यह है कि यह अत्यंत सरल होने के बावजूद गहन प्रभाव वाला अभ्यास माना जाता है।

आधुनिक वैज्ञानिक अनुसंधान भी यह संकेत देते हैं कि नियंत्रित श्वास, ध्यान और मंत्र-जप का संयोजन मानसिक तनाव को कम करने, भावनात्मक संतुलन बनाए रखने तथा एकाग्रता बढ़ाने में सहायक हो सकता है। यद्यपि आध्यात्मिक अनुभव व्यक्तिगत होते हैं और उन्हें वैज्ञानिक रूप से पूर्णतः मापना संभव नहीं है, फिर भी नियमित अभ्यास से मिलने वाले मानसिक एवं शारीरिक लाभों को व्यापक रूप से स्वीकार किया जा रहा है।

प्रणव मंत्र योग का वास्तविक उद्देश्य केवल मंत्र का उच्चारण करना नहीं, बल्कि स्वयं के भीतर स्थित शांति, संतुलन और जागरूकता को अनुभव करना है। जब यह अभ्यास नियमितता, श्रद्धा और सही विधि के साथ किया जाता है, तब यह व्यक्ति के व्यक्तित्व, व्यवहार और जीवन-दृष्टि में सकारात्मक परिवर्तन लाने की क्षमता रखता है।
आज की भागदौड़ भरी जीवनशैली में यदि प्रतिदिन कुछ मिनट भी प्रणव मंत्र योग को दिए जाएँ, तो यह केवल तनाव कम करने का माध्यम नहीं, बल्कि संतुलित, स्वस्थ और सार्थक जीवन की दिशा में एक प्रभावी कदम सिद्ध हो सकता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
प्रश्न 1. प्रणव मंत्र (ॐ) का अर्थ क्या है?
उत्तर: प्रणव या ॐ वह पवित्र ध्वनि है जिसे भारतीय दर्शन में सृष्टि के मूल स्पंदन और परम चेतना का प्रतीक माना गया है।

प्रश्न 2. क्या प्रणव मंत्र योग सभी लोग कर सकते हैं?
उत्तर: सामान्यतः स्वस्थ व्यक्ति इसका अभ्यास कर सकते हैं। यदि किसी को गंभीर स्वास्थ्य या मानसिक समस्या हो, तो विशेषज्ञ की सलाह लेना उचित है।

प्रश्न 3. प्रतिदिन कितनी देर अभ्यास करना चाहिए?
उत्तर: शुरुआती साधक 5–10 मिनट से शुरुआत कर सकते हैं और धीरे-धीरे समय 20 मिनट तक बढ़ा सकते हैं।

प्रश्न 4. क्या प्रणव मंत्र योग तनाव कम करने में मदद करता है?
उत्तर: नियंत्रित श्वास और ध्यान के साथ किया गया नियमित अभ्यास मानसिक तनाव कम करने और भावनात्मक संतुलन बनाए रखने में सहायक हो सकता है।

प्रश्न 5. क्या यह किसी धर्म विशेष तक सीमित है?
उत्तर: यद्यपि इसकी उत्पत्ति भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में हुई है, लेकिन आज इसे ध्यान और मानसिक स्वास्थ्य के अभ्यास के रूप में विश्वभर में विभिन्न पृष्ठभूमि के लोग अपनाते हैं।

Radha Singh
Radha Singh

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