विकसित भारत बिल्डथॉन: देशभर के छात्र नवाचारों को मिली राष्ट्रीय पहचान, नन्हे वैज्ञानिकों के बड़े कारनामे! जानिए किसने क्या बनाया

संवाद 24 डेस्क। भारत को वर्ष 2047 तक विकसित राष्ट्र बनाने का सपना केवल बड़ी औद्योगिक परियोजनाओं, आधुनिक तकनीक और आर्थिक विकास से पूरा नहीं होगा, बल्कि इसके लिए देश की नई पीढ़ी को भी नवाचार, वैज्ञानिक सोच और रचनात्मकता से जोड़ना आवश्यक है। इसी उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए शुरू किए गए विकसित भारत बिल्डथॉन ने स्कूली विद्यार्थियों को अपनी प्रतिभा दिखाने का एक बड़ा राष्ट्रीय मंच प्रदान किया है। इस पहल के माध्यम से विद्यार्थियों ने अपने आसपास की समस्याओं को पहचाना और उनके समाधान के लिए नए विचार, उपयोगी नमूने तथा तकनीकी परियोजनाएं तैयार कीं।
30 अक्टूबर 2026 को सामने आई विजेताओं और विद्यार्थियों के नवाचारों से जुड़ी खबर ने एक बार फिर यह सवाल महत्वपूर्ण बना दिया है कि क्या भारत के विद्यालय भविष्य के वैज्ञानिकों, उद्यमियों और तकनीकी विशेषज्ञों को तैयार करने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहे हैं? विकसित भारत बिल्डथॉन इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रयास के रूप में देखा जा रहा है।

2.87 लाख से अधिक विचारों ने लिया हिस्सा, 10 टीमों ने बनाई राष्ट्रीय पहचान
विकसित भारत बिल्डथॉन 2025 को स्कूली शिक्षा के क्षेत्र में नवाचार को बढ़ावा देने वाली देश की बड़ी पहलों में शामिल किया गया है। इस प्रतियोगिता में देशभर के विद्यार्थियों ने अपनी कल्पनाशीलता और तकनीकी समझ का परिचय दिया। प्रतियोगिता के अंतर्गत कुल 2,87,967 विचार और नमूने जमा किए गए। इतनी बड़ी संख्या में परियोजनाओं की भागीदारी के चलते इस पहल को गिनीज विश्व रिकॉर्ड में सबसे बड़ी नवाचार समाधान प्रतियोगिता के रूप में स्थान मिला।
इस प्रतियोगिता के राष्ट्रीय स्तर के 10 विजेता दलों को 28 अक्टूबर 2026 को नई दिल्ली में आयोजित समारोह में सम्मानित किया गया। केंद्रीय शिक्षा राज्य मंत्री जयंत चौधरी ने विजेता विद्यार्थियों को पुरस्कार प्रदान किए। प्रतियोगिता में जिला, राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर चयन की व्यवस्था की गई थी। इसमें 10 राष्ट्रीय विजेताओं के अलावा 100 राज्य स्तरीय और 1,000 जिला स्तरीय विजेताओं का चयन किया गया। राष्ट्रीय स्तर के विजेता दलों को कुल 17.50 लाख रुपये की पुरस्कार राशि प्रदान की गई। पूरी प्रतियोगिता के लिए जिला, राज्य और राष्ट्रीय स्तर को मिलाकर एक करोड़ रुपये से अधिक का पुरस्कार कोष निर्धारित किया गया था।

असम के विद्यार्थियों ने बनाया मकड़ी जैसा रोबोट, बम और बारूदी सुरंगों का पता लगाने में होगा उपयोग
प्रतियोगिता में सबसे अधिक चर्चा असम के तिनसुकिया स्थित पीएम श्री केंद्रीय विद्यालय के विद्यार्थियों द्वारा तैयार किए गए मकड़ी के आकार के रोबोट की हो रही है। इस परियोजना का नाम वाडिफ्यूज रखा गया है। यह रोबोट कठिन और ऊबड़-खाबड़ रास्तों पर भी चलने के उद्देश्य से तैयार किया गया है। इसका मुख्य उपयोग खतरनाक बमों और बारूदी सुरंगों का पता लगाने तथा उन्हें निष्क्रिय करने में किया जा सकता है।
इस आविष्कार की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसके माध्यम से सुरक्षा कर्मियों को खतरनाक स्थानों पर सीधे जाने की आवश्यकता कम हो सकती है। दूर से नियंत्रित किए जाने वाले इस रोबोट की मदद से विस्फोटक सामग्री तक पहुंचने और उसे निष्क्रिय करने का प्रयास किया जा सकता है। इससे उन परिस्थितियों में मानव जीवन की सुरक्षा बेहतर बनाने की संभावना है, जहां थोड़ी सी लापरवाही भी गंभीर दुर्घटना का कारण बन सकती है।
हालांकि, इस तरह की तकनीक को वास्तविक सुरक्षा अभियानों में इस्तेमाल करने से पहले उसकी विश्वसनीयता, नियंत्रण प्रणाली और सुरक्षा मानकों का विशेषज्ञों द्वारा परीक्षण आवश्यक होगा। इसके बावजूद विद्यालय स्तर के विद्यार्थियों द्वारा ऐसी गंभीर समस्या पर तकनीकी समाधान तैयार करना उनकी रचनात्मक सोच का उदाहरण है।

उत्तर प्रदेश के विद्यार्थियों का स्मार्ट चश्मा, सुनने में परेशानी वाले लोगों को मिलेगी मदद
उत्तर प्रदेश के गौतमबुद्ध नगर स्थित स्टेप बाय स्टेप स्कूल के विद्यार्थियों ने इकोलेंस नाम से विशेष स्मार्ट चश्मा तैयार किया है। यह चश्मा हड्डियों के कंपन के माध्यम से ध्वनि पहुंचाने वाली तकनीक पर आधारित है। इसे विशेष रूप से उन लोगों की सहायता के उद्देश्य से विकसित किया गया है, जिन्हें सुनने में परेशानी होती है।
आमतौर पर ध्वनि सुनने के लिए कानों तक आवाज पहुंचना जरूरी होता है, लेकिन हड्डी-संचालन तकनीक में कंपन के माध्यम से ध्वनि आंतरिक कान तक पहुंचाई जाती है। इस तकनीक का उपयोग पहले भी कुछ विशेष श्रवण उपकरणों में किया जाता रहा है। विद्यार्थियों ने इसी तकनीक को स्मार्ट चश्मे के रूप में उपयोगी बनाने का प्रयास किया है।
इस आविष्कार का महत्व केवल दिव्यांगजनों की सहायता तक सीमित नहीं है। सुरक्षा बलों के लिए भी इस प्रकार के उपकरण उपयोगी हो सकते हैं, क्योंकि इनके माध्यम से कानों को पूरी तरह ढके बिना संदेश सुनने की सुविधा मिल सकती है। इससे आसपास की गतिविधियों के प्रति सतर्कता बनाए रखने में मदद मिल सकती है।
आज जब तकनीक का उद्देश्य केवल सुविधाएं बढ़ाना नहीं, बल्कि समाज के अलग-अलग वर्गों की समस्याओं का समाधान करना भी है, ऐसे में विद्यार्थियों का यह प्रयास काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

गुजरात के विद्यार्थियों का अर्बन ब्रीदिंग पोल, प्रदूषण से निपटने की नई कल्पना
शहरों में वायु प्रदूषण लगातार एक बड़ी चुनौती बना हुआ है। वाहनों से निकलने वाला धुआं, औद्योगिक उत्सर्जन, निर्माण कार्यों से उड़ने वाली धूल और अन्य प्रदूषक हवा की गुणवत्ता को प्रभावित करते हैं। इस समस्या को ध्यान में रखते हुए गुजरात के विद्यार्थियों ने अर्बन ब्रीदिंग पोल नामक एक विशेष परियोजना तैयार की।
इसकी परिकल्पना एक ऐसे खंभे की है, जो आसपास की प्रदूषित हवा को खींचकर उसे शुद्ध करने के बाद बाहर छोड़े। इसका उद्देश्य शहरी क्षेत्रों में वायु प्रदूषण को कम करने के लिए एक स्थानीय समाधान विकसित करना है।
यदि इस प्रकार की व्यवस्था को बड़े स्तर पर विकसित किया जाता है तो सार्वजनिक स्थानों, व्यस्त सड़कों और अधिक प्रदूषण वाले क्षेत्रों में इसके उपयोग की संभावनाएं तलाश की जा सकती हैं। हालांकि, किसी भी वायु शुद्धिकरण प्रणाली की वास्तविक उपयोगिता उसकी क्षमता, ऊर्जा खपत, रखरखाव और आसपास के वातावरण पर पड़ने वाले प्रभाव से निर्धारित होगी।
यह परियोजना बताती है कि विद्यार्थी अपने आसपास दिखाई देने वाली समस्याओं को केवल पहचान नहीं रहे, बल्कि उनके समाधान के लिए वैज्ञानिक दृष्टिकोण भी अपना रहे हैं।

किसानों के लिए कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित फसल चिकित्सक, बिना इंटरनेट भी करेगा काम
भारत की अर्थव्यवस्था में कृषि की महत्वपूर्ण भूमिका है। किसानों के सामने फसलों में लगने वाले रोग, कीटों का प्रकोप और समय पर सही सलाह नहीं मिलने जैसी समस्याएं बनी रहती हैं। कई ग्रामीण क्षेत्रों में विशेषज्ञ कृषि सलाह तक पहुंच भी आसान नहीं है। इन चुनौतियों को देखते हुए दक्षिण भारत के ग्रामीण विद्यालयों के विद्यार्थियों ने कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित फसल चिकित्सक तैयार करने की पहल की।
इस परियोजना के अंतर्गत एक ऐसा मोबाइल अनुप्रयोग विकसित करने का प्रयास किया गया है, जो इंटरनेट उपलब्ध नहीं होने पर भी काम कर सके। किसान अपनी खराब होती फसल या पौधों की पत्तियों का चित्र लेकर प्रणाली में डाल सकते हैं। इसके बाद कृत्रिम बुद्धिमत्ता की सहायता से पौधे में संभावित बीमारी की पहचान करने और उसके उपचार के बारे में जानकारी देने की परिकल्पना की गई है।
इसमें जैविक खाद और उपयुक्त कीट नियंत्रण उपायों से संबंधित सुझाव भी शामिल किए गए हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में इंटरनेट की सीमित उपलब्धता को ध्यान में रखते हुए इसे तैयार करना विशेष महत्व रखता है।
यदि इस तरह की तकनीक को पर्याप्त आंकड़ों और कृषि विशेषज्ञों की सलाह के साथ विकसित किया जाता है तो छोटे किसानों को काफी मदद मिल सकती है। हालांकि, फसल रोगों की पहचान और उपचार संबंधी सुझावों को वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित करना जरूरी होगा, ताकि गलत जानकारी के कारण किसानों को आर्थिक नुकसान न उठाना पड़े।

नदियों और तालाबों से कचरा हटाएगी रोबोटिक नाव, पर्यावरण संरक्षण की दिशा में प्रयास
जल प्रदूषण देश के सामने मौजूद गंभीर पर्यावरणीय चुनौतियों में से एक है। नदियों, तालाबों और अन्य जलस्रोतों में प्लास्टिक तथा दूसरे प्रकार का कचरा जमा होने से जलीय जीवों और पर्यावरण को नुकसान पहुंचता है। इस समस्या के समाधान के लिए ओडिशा के तटीय क्षेत्र के विद्यार्थियों ने स्मार्ट सीवेज क्लीनिंग बोट नामक परियोजना तैयार की।
यह एक रोबोटिक नाव की परिकल्पना है, जो पानी की सतह पर तैरते हुए प्लास्टिक और अन्य कचरे को एकत्र कर सकती है। इसे सौर ऊर्जा से संचालित करने का भी विचार प्रस्तुत किया गया है। सौर ऊर्जा का इस्तेमाल होने से पारंपरिक ईंधन पर निर्भरता कम करने और पर्यावरण के अनुकूल सफाई व्यवस्था विकसित करने की संभावना बनती है।
इस तरह की तकनीक छोटे तालाबों, जलाशयों और सीमित क्षेत्र वाले जलस्रोतों की सफाई में उपयोगी साबित हो सकती है। यदि इसे बड़े स्तर पर विकसित किया जाता है तो स्थानीय निकायों और पर्यावरण संरक्षण से जुड़े संस्थानों के लिए यह एक सहायक उपकरण बन सकता है।
इस परियोजना की खास बात यह है कि विद्यार्थियों ने स्वच्छता और पर्यावरण संरक्षण जैसी समस्या को तकनीकी नवाचार से जोड़ने का प्रयास किया है।

जंगलों में आग लगने से पहले मिलेगा अलर्ट, उत्तराखंड के विद्यार्थियों का सेंसर आधारित समाधान
गर्मियों के मौसम में जंगलों में आग लगने की घटनाएं वन संपदा, वन्यजीवों और आसपास रहने वाले लोगों के लिए गंभीर खतरा पैदा करती हैं। आग फैलने के बाद उस पर काबू पाना मुश्किल हो जाता है। ऐसे में समय रहते चेतावनी मिलना बेहद महत्वपूर्ण होता है।
उत्तराखंड के विद्यार्थियों ने जंगलों में आग की आशंका का पहले से पता लगाने के लिए एक विशेष चेतावनी प्रणाली तैयार की है। इसमें पेड़ों पर छोटे सेंसर लगाने की परिकल्पना की गई है। ये सेंसर आसपास के तापमान में असामान्य वृद्धि को पहचानकर संबंधित विभाग को सूचना भेज सकते हैं। परियोजना के अनुसार, उपग्रह आधारित संचार के माध्यम से आग की आशंका वाले स्थान की जानकारी वन विभाग तक पहुंचाने का उद्देश्य है।
यदि इस व्यवस्था को सफलतापूर्वक विकसित किया जाता है तो वन विभाग को समय रहते संभावित खतरे की जानकारी मिल सकती है। इससे आग पर नियंत्रण के लिए आवश्यक कदम उठाने में मदद मिल सकती है।
वनों की सुरक्षा के लिहाज से यह आविष्कार इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि जंगलों में आग लगने के कारण केवल पेड़-पौधे ही नष्ट नहीं होते, बल्कि जैव विविधता और प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र पर भी गंभीर प्रभाव पड़ता है।

बिजली की बचत से लेकर चिकित्सा सुविधा तक, विद्यार्थियों के अन्य आविष्कार भी खास
प्रतियोगिता में विद्यार्थियों ने केवल रोबोट और कृत्रिम बुद्धिमत्ता से जुड़े आविष्कार ही नहीं किए, बल्कि ऊर्जा संरक्षण, स्वास्थ्य सेवाओं और सड़क सुरक्षा जैसी समस्याओं पर भी काम किया। महाराष्ट्र के विद्यार्थियों ने बिजली बचाने के लिए एक विशेष सड़क प्रकाश व्यवस्था तैयार की। इसमें सेंसर की मदद से सड़क पर लोगों या वाहनों की मौजूदगी का पता लगाने और आवश्यकता के अनुसार रोशनी बढ़ाने की व्यवस्था की गई है।
इसका उद्देश्य सुनसान सड़कों पर अनावश्यक बिजली की खपत को कम करना है। जब सड़क पर कोई व्यक्ति या वाहन नहीं होगा तो रोशनी कम रहेगी और गतिविधि का पता लगने पर प्रकाश बढ़ जाएगा। इस तरह की व्यवस्था सार्वजनिक प्रकाश व्यवस्था को अधिक ऊर्जा दक्ष बनाने में मदद कर सकती है।
राजस्थान के विद्यार्थियों ने दूरदराज के गांवों में प्राथमिक स्वास्थ्य जांच को आसान बनाने के उद्देश्य से पोर्टेबल चिकित्सा जांच किट तैयार की। इसे एक छोटे बैग के आकार में विकसित करने की परिकल्पना की गई है। इसके माध्यम से रक्त जांच, रक्तचाप, रक्त शर्करा और हृदय की विद्युत गतिविधि से संबंधित जांच करने तथा रिपोर्ट चिकित्सक तक पहुंचाने का प्रयास किया गया है।
पंजाब के विद्यार्थियों ने सड़क दुर्घटनाओं को कम करने के लिए एक विशेष चेतावनी प्रणाली विकसित की। इसमें वाहन के भीतर लगे कैमरे से चालक की आंखों की गतिविधियों पर नजर रखने की व्यवस्था है। चालक को नींद आने या झपकी लेने के संकेत मिलने पर चेतावनी देने और वाहन की गति कम करने की व्यवस्था का उद्देश्य रखा गया है।
इसी तरह झारखंड के धनबाद क्षेत्र के विद्यार्थियों ने कोयला खदानों में मीथेन गैस के रिसाव की समस्या पर काम किया। उनकी परियोजना में गैस का पता लगाने, उसे एकत्र करने और ऊर्जा में बदलने की परिकल्पना की गई है। खदानों में मीथेन गैस का रिसाव आग और विस्फोट जैसी दुर्घटनाओं का कारण बन सकता है। इसलिए इस दिशा में किया गया प्रयास खदानों की सुरक्षा के लिहाज से महत्वपूर्ण है।

पांच नमूना आधारित और पांच विचार आधारित परियोजनाओं को मिला पुरस्कार
विकसित भारत बिल्डथॉन में विद्यार्थियों को उनकी परियोजनाओं के स्वरूप के अनुसार दो प्रमुख श्रेणियों में अवसर दिया गया था। पहली श्रेणी विचार आधारित थी, जबकि दूसरी श्रेणी में विद्यार्थियों को अपने विचार का कार्यशील नमूना तैयार करना था।
विचार आधारित श्रेणी में ऐसे विद्यार्थियों को प्रोत्साहित किया गया, जिन्होंने किसी वास्तविक समस्या का नया समाधान प्रस्तुत किया। वहीं नमूना आधारित श्रेणी में उन विद्यार्थियों को प्राथमिकता दी गई, जिन्होंने अपने विचार को तकनीकी रूप से विकसित करके उसका कार्यशील स्वरूप तैयार किया।
राष्ट्रीय स्तर पर नमूना आधारित श्रेणी की पांच विजेता टीमों को प्रत्येक को 2.50 लाख रुपये दिए गए। वहीं विचार आधारित श्रेणी की पांच विजेता टीमों को प्रत्येक को एक लाख रुपये की पुरस्कार राशि प्रदान की गई। इस प्रकार राष्ट्रीय स्तर के 10 विजेता दलों को कुल 17.50 लाख रुपये दिए गए।
चयन प्रक्रिया को पारदर्शी और व्यापक बनाने के लिए जिला, राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर तीन चरणों में मूल्यांकन किया गया। इसमें अलग-अलग विषयों के विशेषज्ञों ने विद्यार्थियों की परियोजनाओं का आकलन किया।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 से जुड़ी पहल, विद्यार्थियों को किताबी ज्ञान से आगे बढ़ाने का प्रयास
विकसित भारत बिल्डथॉन की एक महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि इसमें विद्यार्थियों को केवल पाठ्यपुस्तकों तक सीमित नहीं रखा गया। उन्हें अपने आसपास की समस्याओं को पहचानने, उन पर विचार करने और स्वयं समाधान विकसित करने के लिए प्रोत्साहित किया गया।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में भी अनुभव आधारित शिक्षा, आलोचनात्मक चिंतन, रचनात्मकता और समस्या समाधान जैसे कौशलों को महत्व दिया गया है। बिल्डथॉन इसी सोच को विद्यालय स्तर पर व्यावहारिक रूप देने का प्रयास है।
इस पहल का आयोजन शिक्षा मंत्रालय के विद्यालय शिक्षा एवं साक्षरता विभाग ने नीति आयोग के अटल नवाचार मिशन और अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद के सहयोग से किया। इसमें छठी से बारहवीं कक्षा तक के विद्यार्थियों को शामिल किया गया था। विद्यार्थियों की टीमों को शिक्षक मार्गदर्शकों की सहायता से अपने विचार विकसित करने और उनके नमूने तैयार करने का अवसर मिला।
इसका उद्देश्य विद्यार्थियों को छोटी उम्र से ही वैज्ञानिक सोच, तकनीकी समझ, सामूहिक कार्य और उद्यमशीलता के प्रति जागरूक करना है।

विकसित भारत 2047 के सपने को साकार करने में युवा नवाचारों की अहम भूमिका
भारत को 2047 तक विकसित राष्ट्र बनाने के लक्ष्य में शिक्षा, अनुसंधान और तकनीकी विकास की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण रहने वाली है। किसी भी देश का भविष्य इस बात पर निर्भर करता है कि वह अपनी युवा पीढ़ी को कितने बेहतर अवसर उपलब्ध कराता है और उनकी प्रतिभा को वास्तविक समस्याओं के समाधान में किस तरह इस्तेमाल करता है।

विकसित भारत बिल्डथॉन ने यह दिखाया है कि स्कूली विद्यार्थी भी सुरक्षा, स्वास्थ्य, कृषि, ऊर्जा, पर्यावरण और परिवहन जैसी गंभीर चुनौतियों पर नए विचार प्रस्तुत कर सकते हैं। इसके लिए हमेशा बड़े अनुसंधान केंद्र या अत्याधुनिक प्रयोगशालाएं ही जरूरी नहीं होतीं। कई बार किसी समस्या को करीब से समझना और उसके लिए व्यावहारिक समाधान तलाशना ही नवाचार की पहली सीढ़ी बन जाता है।
हालांकि, किसी प्रतियोगिता में पुरस्कार जीतना किसी आविष्कार की व्यावसायिक सफलता या व्यापक उपयोग की गारंटी नहीं है। इन परियोजनाओं को आगे बढ़ाने के लिए तकनीकी परीक्षण, विशेषज्ञ मार्गदर्शन, आर्थिक सहायता, बौद्धिक संपदा संरक्षण और उद्योगों से सहयोग की आवश्यकता होगी। विशेष रूप से ग्रामीण और आर्थिक रूप से कमजोर क्षेत्रों के विद्यार्थियों को लगातार संसाधन उपलब्ध कराना जरूरी है, ताकि उनकी प्रतिभा केवल प्रतियोगिता तक सीमित न रह जाए।
इस दिशा में विद्यालयों, शिक्षकों, तकनीकी संस्थानों, उद्योगों और सरकार के बीच मजबूत सहयोग विकसित करना महत्वपूर्ण होगा। यदि विद्यार्थियों के विचारों को आगे विकसित करने और उन्हें वास्तविक जीवन में लागू करने का अवसर मिलता है तो ये छोटे-छोटे प्रयास भविष्य में बड़े बदलाव का आधार बन सकते हैं।
विकसित भारत बिल्डथॉन की उपलब्धि केवल 10 राष्ट्रीय विजेताओं या 2.87 लाख से अधिक प्रस्तुतियों तक सीमित नहीं है। इसकी वास्तविक सफलता इस बात में होगी कि कितने विद्यार्थियों के भीतर वैज्ञानिक सोच विकसित होती है और कितने विचार आगे चलकर समाज की समस्याओं का समाधान बनते हैं। असम का मकड़ी रोबोट, उत्तर प्रदेश का स्मार्ट चश्मा, गुजरात का वायु शुद्धिकरण खंभा और अन्य विद्यार्थियों के नवाचार इस बात का संकेत हैं कि भारत की नई पीढ़ी केवल भविष्य की कल्पना नहीं कर रही, बल्कि उसे बनाने की दिशा में कदम भी बढ़ा रही है।

Geeta Singh
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