
संवाद 24 डेस्क। राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 के तहत स्कूली शिक्षा में बहुभाषिकता को बढ़ावा देने की दिशा में केंद्र सरकार ने कई कदम उठाए हैं। इसी क्रम में कक्षा 6 से तीसरी भाषा यानी R3 को लागू करने की व्यवस्था भी सामने आई है। हालांकि, अब इस व्यवस्था की जमीनी तैयारी को लेकर संसदीय समिति ने महत्वपूर्ण सवाल उठाए हैं। एस्टीमेट्स कमेटी की 2026-27 की दसवीं रिपोर्ट में कहा गया है कि स्कूलों को तीसरी भाषा लागू करने के लिए पर्याप्त तैयारी का समय नहीं मिला। भाषा शिक्षकों की भर्ती, अध्ययन सामग्री की उपलब्धता और विद्यार्थियों को भाषा चुनने से जुड़ी स्पष्ट जानकारी की कमी के कारण छात्रों, शिक्षकों, अभिभावकों और स्कूल प्रशासन पर अतिरिक्त दबाव पैदा हुआ। रिपोर्ट बुधवार को लोकसभा में पेश की गई।
तीसरी भाषा की जरूरत क्यों महसूस हुई?
भारत की भाषाई विविधता दुनिया में अपनी अलग पहचान रखती है। देश में अलग-अलग क्षेत्रों में अलग भाषाएं और बोलियां प्रचलित हैं। ऐसे में नई शिक्षा नीति ने केवल एक भाषा तक सीमित रहने के बजाय बहुभाषी शिक्षा को प्रोत्साहित करने पर जोर दिया है। NEP 2020 में तीन-भाषा फॉर्मूले को जारी रखते हुए इसमें अधिक लचीलापन रखने की बात कही गई है। नीति के अनुसार किसी राज्य पर कोई भाषा थोपी नहीं जानी चाहिए और विद्यार्थियों की भाषा संबंधी पसंद तथा क्षेत्रीय परिस्थितियों का भी ध्यान रखा जाना चाहिए। साथ ही तीन भाषाओं में कम से कम दो भारतीय भाषाएं होने की व्यवस्था पर जोर दिया गया है।
इस दृष्टि से तीसरी भाषा का उद्देश्य केवल एक अतिरिक्त विषय जोड़ना नहीं है। इसके पीछे बहुभाषिक क्षमता, भारतीय भाषाओं के प्रति समझ और सांस्कृतिक जुड़ाव को मजबूत करने की सोच है। लेकिन संसदीय समिति की टिप्पणी बताती है कि किसी भी शिक्षा नीति का वास्तविक प्रभाव उसके जमीनी क्रियान्वयन पर निर्भर करता है।
R1, R2 और R3 क्या है?
तीन-भाषा व्यवस्था को समझने के लिए R1, R2 और R3 को समझना जरूरी है। इसमें विद्यार्थियों के लिए तीन भाषाओं के अध्ययन की संरचना तैयार की जाती है। CBSE ने शैक्षणिक सत्र 2026-27 से कक्षा 6 में R3 लागू करने के लिए अपने स्कूलों को निर्देश जारी किए हैं। बोर्ड के अनुसार यह व्यवस्था राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा (NCFSE-2023) में बहुभाषिकता पर दिए गए जोर के अनुरूप है।
CBSE ने यह भी स्पष्ट किया है कि कक्षा 6 में स्कूल द्वारा शुरू की गई R3 भाषा आगे कक्षा 9 और 10 में भाषा के विकल्पों को प्रभावित करेगी। स्कूलों को चुनी गई R3 भाषा की जानकारी अपने संबंधित क्षेत्रीय कार्यालय और OASIS पोर्टल पर अपडेट करनी होती है। इसका अर्थ है कि R3 का चयन केवल तत्काल कक्षा की जरूरत तक सीमित नहीं है, बल्कि आगे की शैक्षणिक योजना से भी जुड़ा है।
समस्या भाषा की नहीं, तैयारी की है
संसदीय समिति ने अपनी रिपोर्ट में बहुभाषी शिक्षा की अवधारणा पर आपत्ति नहीं जताई है। उसकी मुख्य चिंता तैयारी और क्रियान्वयन को लेकर है। समिति के अनुसार तीसरी भाषा लागू करने से पहले स्कूलों को पर्याप्त समय मिलना चाहिए था, ताकि वे योग्य भाषा शिक्षकों की नियुक्ति कर सकें, पाठ्य सामग्री जुटा सकें और विद्यार्थियों तथा अभिभावकों को भाषा विकल्पों की स्पष्ट जानकारी दे सकें। इन तैयारियों की कमी से स्कूल स्तर पर तनाव बढ़ा।
यह चिंता इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि भाषा केवल किताब से पढ़ाया जाने वाला विषय नहीं है। किसी भाषा को प्रभावी तरीके से सिखाने के लिए प्रशिक्षित शिक्षक, उपयुक्त पाठ्यपुस्तक, अभ्यास सामग्री, डिजिटल संसाधन और नियमित मूल्यांकन की जरूरत होती है। यदि इनमें से कोई कड़ी कमजोर हो तो नीति का उद्देश्य विद्यार्थियों तक अपेक्षित रूप में नहीं पहुंच पाएगा।
सरकार ने संसाधन तैयार किए, फिर कमी कहां रह गई?
रिपोर्ट में यह भी माना गया है कि शिक्षा मंत्रालय ने बहुभाषी शिक्षा को आगे बढ़ाने के लिए कई महत्वपूर्ण संसाधन तैयार किए हैं। गणित, विज्ञान और सामाजिक विज्ञान की पुस्तकों का 22 अनुसूचित भारतीय भाषाओं में अनुवाद किया गया है। इसके अलावा ब्रिज कोर्स और ई-कंटेंट तैयार किए गए हैं। ‘जादुई पिटारा’ जैसी खेल आधारित शिक्षण सामग्री 22 भाषाओं में उपलब्ध कराने और भाषा संगम जैसे कार्यक्रमों के माध्यम से भाषा से परिचय बढ़ाने का प्रयास किया गया है। केंद्रीय भारतीय भाषा संस्थान (CIIL) के साथ मिलकर 121 मातृभाषा आधारित शुरुआती प्राइमर भी तैयार किए गए हैं।
केंद्रीय विद्यालय संगठन जैसे संस्थानों ने स्थानीय भाषाओं के शिक्षकों को अनुबंध के आधार पर नियुक्त करके भी सहयोग किया है। इसके बावजूद समिति ने पाया कि अध्ययन सामग्री, शिक्षक प्रशिक्षण और भाषा शिक्षकों की वास्तविक जरूरत का पर्याप्त पूर्वानुमान नहीं लगाया गया। यही वह बिंदु है जहां नीति की अच्छी मंशा और उसके क्रियान्वयन की वास्तविक चुनौतियों के बीच अंतर दिखाई देता है।
CBSE ने भी माना कि व्यवस्था के लिए प्रशासनिक तैयारी जरूरी है
तीसरी भाषा को लेकर CBSE ने वर्ष 2026 में लगातार दिशा-निर्देश जारी किए हैं। अप्रैल में जारी परिपत्र में कक्षा 6 के लिए R3 लागू करने की बात कही गई और बाद के निर्देशों में स्कूलों को अपनी भाषा पसंद OASIS पोर्टल पर अपडेट करने तथा प्रशासनिक तैयारियां पूरी करने को कहा गया। CBSE ने निर्धारित भाषाओं के लिए आधिकारिक पाठ्यपुस्तकें उपलब्ध कराने की प्रक्रिया भी बताई है।
जुलाई 2026 तक CBSE की आधिकारिक परिपत्र सूची में तीन-भाषा योजना के कार्यान्वयन से संबंधित नए दिशा-निर्देश भी शामिल किए गए हैं। इससे स्पष्ट है कि नीति के लागू होने के साथ-साथ इसके प्रशासनिक और शैक्षणिक पहलुओं को लेकर भी व्यवस्था विकसित की जा रही है।
क्या तीसरी भाषा का मतलब सिर्फ हिंदी है?
तीन-भाषा फॉर्मूले पर चर्चा के दौरान सबसे बड़ी गलतफहमी यही हो सकती है कि तीसरी भाषा का अर्थ हर जगह हिंदी होगा। NEP 2020 में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि किसी राज्य पर कोई भाषा थोपी नहीं जाएगी और भाषा चयन में राज्यों, क्षेत्रों तथा विद्यार्थियों की परिस्थितियों का ध्यान रखा जाएगा।
CBSE की मौजूदा व्यवस्था में भी भारतीय भाषाओं की विस्तृत सूची उपलब्ध है। R3 के लिए विकसित की जा रही कक्षा 6 की पाठ्यपुस्तकों में असमिया, बंगाली, बोडो, डोगरी, गुजराती, कन्नड़, कश्मीरी, कोंकणी, मैथिली, मलयालम, मणिपुरी, मराठी, नेपाली, ओड़िया, पंजाबी, संताली, सिंधी, तमिल और तेलुगु जैसी भाषाएं शामिल हैं।
इसलिए नीति का मूल सवाल भाषा विशेष को बढ़ावा देना नहीं, बल्कि भारतीय विद्यार्थियों के लिए बहुभाषी सीखने का अवसर उपलब्ध कराना है। हालांकि, विभिन्न राज्यों और स्कूलों में उपलब्ध भाषाओं तथा प्रशिक्षित शिक्षकों की स्थिति अलग-अलग होने के कारण व्यावहारिक चुनौतियां बनी रह सकती हैं।
संसदीय समिति ने क्या सुझाव दिए?
समिति ने सरकार से पाठ्यपुस्तकों, अध्ययन सामग्री और शिक्षक हैंडबुक तैयार करने तथा उनके क्षेत्रीय भाषाओं में अनुवाद की प्रक्रिया तेज करने की सिफारिश की है। इसके साथ ही राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को स्थानीय तथा मातृभाषाओं में शिक्षण के लिए पर्याप्त शिक्षक उपलब्ध कराने में सहायता देने को कहा गया है।
समिति की एक अहम सिफारिश राज्यवार वितरण योजना बनाने की है। इसके तहत यह सुनिश्चित करने पर जोर दिया गया है कि अनुवादित पाठ्यपुस्तकें, बहुभाषी ई-कंटेंट और जादुई पिटारा जैसी शिक्षण सामग्री शैक्षणिक सत्र शुरू होने से पहले ग्रामीण और सरकारी स्कूलों तक पहुंच जाए।
आगे की राह: भाषा सीखना अवसर बने, बोझ नहीं
तीसरी भाषा सीखने की अवधारणा विद्यार्थियों को नई भाषाओं से परिचित कराने और भारत की भाषाई विविधता को समझने का अवसर दे सकती है। लेकिन इसके लिए यह जरूरी है कि नीति का क्रियान्वयन विद्यार्थियों की क्षमता, उम्र और स्कूल की वास्तविक परिस्थितियों को ध्यान में रखकर किया जाए।
संसदीय समिति की आपत्ति को इसी संदर्भ में देखना चाहिए। बहुभाषिक शिक्षा का लक्ष्य तभी सफल होगा, जब शिक्षक पर्याप्त संख्या में हों, पाठ्य सामग्री समय पर उपलब्ध हो, स्कूलों को प्रशासनिक स्पष्टता मिले और अभिभावकों को भी पूरी जानकारी दी जाए। अन्यथा एक अच्छी शैक्षणिक पहल अतिरिक्त अकादमिक दबाव का कारण बन सकती है।






