
संवाद 24 डेस्क। भारत की स्कूली शिक्षा व्यवस्था लंबे समय से विविधता और असमानता, दोनों का मिश्रण रही है। अलग-अलग राज्यों और स्तरों पर संचालित शिक्षा बोर्डों के पाठ्यक्रम, परीक्षा प्रणाली, मूल्यांकन के तरीके और प्रशासनिक मानकों में अंतर देखने को मिलता है। इसी पृष्ठभूमि में संसदीय समिति की एक महत्वपूर्ण सिफारिश ने देश की स्कूली शिक्षा व्यवस्था में संभावित बड़े बदलाव की बहस को तेज कर दिया है। समिति ने देश में काम कर रहे 65 शिक्षा बोर्डों के लिए एक समान राष्ट्रीय नियामक फ्रेमवर्क तैयार करने की सिफारिश की है। इसका उद्देश्य बोर्डों के कामकाज, मूल्यांकन मानदंड और साझा पाठ्यक्रम से जुड़े मानकों में अधिक समानता लाना है। यह सिफारिश लोकसभा में पेश की गई एस्टीमेट्स कमेटी की 2026-27 की दसवीं रिपोर्ट का हिस्सा है।
आखिर 65 बोर्डों की व्यवस्था में समस्या क्या है?
संसदीय समिति के अनुसार भारत में राष्ट्रीय और राज्य स्तर पर नियमित तथा ओपन स्कूल बोर्डों समेत 65 स्कूल शिक्षा बोर्ड कार्यरत हैं। इनमें केंद्रीय स्तर पर सीबीएसई, CISCE और NIOS जैसे प्रमुख बोर्ड हैं, जबकि राज्यों के अपने-अपने बोर्ड भी हैं। इसके अलावा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त बोर्ड भी देश में स्कूल शिक्षा का हिस्सा हैं। समिति ने माना कि सभी बोर्डों में पाठ्यक्रम, मूल्यांकन और प्रशासनिक प्रक्रियाओं का स्तर एक जैसा नहीं है। खासतौर पर कुछ बोर्डों में गुणवत्ता नियंत्रण और मूल्यांकन की मजबूत व्यवस्था है, जबकि कुछ अन्य व्यवस्थाओं में मानकों और प्रक्रियाओं को लेकर असमानता दिखाई देती है।
यही अंतर विद्यार्थियों के लिए महत्वपूर्ण हो जाता है। एक ही कक्षा और समान शैक्षणिक योग्यता के बावजूद अलग-अलग बोर्डों की परीक्षा प्रणाली और मूल्यांकन पद्धति में अंतर होने से छात्रों की उपलब्धियों की तुलना करना कठिन हो सकता है। समिति की चिंता यही है कि इसका असर आगे विश्वविद्यालयों और व्यावसायिक शिक्षा में प्रवेश की प्रतिस्पर्धा पर पड़ सकता है।
क्या अब सभी बोर्डों का पाठ्यक्रम एक जैसा हो जाएगा?
यह सवाल सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है और इसे समझना जरूरी है। संसदीय समिति ने समान राष्ट्रीय नियामक ढांचे की सिफारिश की है। इसका अर्थ यह जरूरी नहीं है कि देश के हर बोर्ड की किताबें, विषय या स्थानीय पाठ्यक्रम शब्दशः एक जैसे हो जाएंगे। भारत की भाषाई, सांस्कृतिक और क्षेत्रीय विविधता को देखते हुए राज्यों को अपनी स्थानीय जरूरतों के अनुसार पाठ्यक्रम विकसित करने की गुंजाइश बनाए रखना भी महत्वपूर्ण है।
दरअसल, राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 स्वयं स्कूली शिक्षा में गुणवत्ता, समान अवसर और सीखने के बेहतर परिणामों पर जोर देती है। NEP में PARAKH को सभी मान्यता प्राप्त स्कूल बोर्डों के लिए छात्र मूल्यांकन और आकलन के मानदंडों, मानकों और दिशानिर्देशों के लिए एक मानक-निर्धारण संस्था के रूप में परिकल्पित किया गया है। नीति का उद्देश्य बोर्डों के बीच शैक्षणिक मानकों की समानता बढ़ाना और मूल्यांकन प्रणाली को आधुनिक बनाना है।
NEP 2020 से कैसे जुड़ी है यह सिफारिश?
नई शिक्षा नीति 2020 का मूल जोर रटने की बजाय समझ, दक्षता, आलोचनात्मक सोच और समग्र विकास पर है। शिक्षा मंत्रालय के अनुसार NEP के तहत मूल्यांकन को नियमित, रचनात्मक और competency-based बनाने पर जोर दिया गया है। बोर्ड परीक्षाओं को भी ऐसी दिशा में बदलने की बात कही गई है, जिसमें विद्यार्थियों की वास्तविक क्षमताओं और समझ का आकलन हो, न कि केवल याद किए गए तथ्यों का।
ऐसे में संसदीय समिति की सिफारिश को केवल प्रशासनिक बदलाव के रूप में देखना पर्याप्त नहीं होगा। यदि इसे प्रभावी ढंग से लागू किया जाता है तो इसका लक्ष्य देशभर में शैक्षणिक मानकों और मूल्यांकन की गुणवत्ता के बीच अंतर कम करना हो सकता है। सरकार पहले से ही NEP के तहत विभिन्न पहलों के माध्यम से स्कूलों में गुणवत्ता और मूल्यांकन व्यवस्था को मजबूत करने की दिशा में काम कर रही है।
नए शिक्षा बोर्डों पर भी कसेगा शिकंजा?
संसदीय समिति ने केवल मौजूदा बोर्डों के बीच समानता की बात नहीं की है, बल्कि नए और निजी शिक्षा बोर्डों को लेकर भी चिंता जताई है। समिति ने सुझाव दिया है कि किसी नए बोर्ड को मान्यता देने से पहले सख्त सिंगल-विंडो क्लीयरेंस सिस्टम बनाया जाए। इसका उद्देश्य ऐसे बोर्डों के विस्तार पर निगरानी रखना है जिनकी मान्यता, गुणवत्ता और शैक्षणिक विश्वसनीयता को लेकर स्पष्ट व्यवस्था नहीं हो सकती।
इसके साथ ही समिति ने एक सार्वजनिक डिजिटल रिपॉजिटरी बनाने की सिफारिश की है। इसमें देश के मान्यता प्राप्त राष्ट्रीय, राज्य और अंतरराष्ट्रीय बोर्डों की जानकारी उपलब्ध कराई जा सकती है। यदि यह व्यवस्था लागू होती है तो अभिभावकों और विद्यार्थियों के लिए किसी स्कूल या बोर्ड की मान्यता की जानकारी हासिल करना आसान हो सकता है।
छात्रों को क्या फायदा हो सकता है?
यदि समान नियामक मानक व्यावहारिक तरीके से लागू किए जाते हैं तो इसका सबसे बड़ा लाभ विद्यार्थियों को मिल सकता है। अलग-अलग बोर्डों से पढ़ने वाले छात्रों के लिए शैक्षणिक उपलब्धियों की तुलनीयता बेहतर हो सकती है। विश्वविद्यालयों और उच्च शिक्षा संस्थानों के लिए भी विभिन्न बोर्डों से आने वाले विद्यार्थियों की योग्यता को समझने में अधिक स्पष्टता आ सकती है।
इसके अलावा मूल्यांकन प्रणाली में समान न्यूनतम मानक होने से बोर्ड परीक्षाओं की विश्वसनीयता बढ़ सकती है। NEP 2020 में भी मूल्यांकन को सीखने की प्रक्रिया का हिस्सा बनाने और विद्यार्थियों में उच्च स्तरीय सोच, विश्लेषण तथा समस्या समाधान जैसी क्षमताओं को बढ़ाने पर जोर दिया गया है।
लेकिन चुनौती भी कम नहीं—राज्यों की स्वायत्तता का क्या होगा?
समान राष्ट्रीय फ्रेमवर्क की राह आसान नहीं होगी। भारत में स्कूली शिक्षा राज्यों और केंद्र के बीच साझा जिम्मेदारी वाले क्षेत्र से जुड़ी है और अलग-अलग राज्यों की भाषाई, सांस्कृतिक तथा सामाजिक जरूरतें अलग हैं। इसलिए किसी भी राष्ट्रीय ढांचे को लागू करते समय यह सुनिश्चित करना होगा कि मानकीकरण और विविधता के बीच संतुलन बना रहे।
एक समान गुणवत्ता मानक का मतलब यह नहीं होना चाहिए कि स्थानीय जरूरतों के लिए उपलब्ध शैक्षणिक स्वतंत्रता समाप्त हो जाए। बेहतर मॉडल वह हो सकता है जिसमें बुनियादी शैक्षणिक गुणवत्ता, मूल्यांकन और पारदर्शिता के लिए राष्ट्रीय मानक तय हों, जबकि राज्य और बोर्ड स्थानीय संदर्भ के अनुरूप अतिरिक्त विषयों और शैक्षणिक प्रयोगों की गुंजाइश बनाए रखें।
असली परीक्षा अब सिफारिश को जमीन पर उतारने की
संसदीय समिति की सिफारिश ने देश की स्कूली शिक्षा में एक महत्वपूर्ण प्रश्न सामने रखा है—क्या अलग-अलग बोर्डों की विविधता को बनाए रखते हुए उनके बीच न्यूनतम शैक्षणिक और मूल्यांकन मानकों में समानता लाई जा सकती है? NEP 2020 और PARAKH की परिकल्पना पहले ही इसी दिशा में एक आधार उपलब्ध कराती है।
अब आगे की चुनौती नीति बनाने से ज्यादा उसके प्रभावी क्रियान्वयन की होगी। यदि राष्ट्रीय फ्रेमवर्क पारदर्शी, व्यावहारिक और राज्यों की भागीदारी से तैयार होता है, तो इससे विद्यार्थियों के बीच शैक्षणिक अवसरों की असमानता कम करने में मदद मिल सकती है। लेकिन यदि मानकीकरण को केवल एकरूपता तक सीमित कर दिया गया, तो भारत की क्षेत्रीय और भाषाई विविधता प्रभावित हो सकती है।
इसलिए 65 शिक्षा बोर्डों के लिए समान नियामक ढांचा केवल बोर्ड परीक्षाओं में बदलाव का प्रस्ताव नहीं है। यह देश की स्कूली शिक्षा में गुणवत्ता, समानता, पारदर्शिता और जवाबदेही के नए संतुलन की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम बन सकता है। अब नजर इस बात पर रहेगी कि केंद्र सरकार समिति की इन सिफारिशों को किस रूप में आगे बढ़ाती है और राज्यों तथा शिक्षा बोर्डों को इस प्रक्रिया में किस तरह शामिल किया जाता है।






