
संवाद 24 डेस्क। एक समय था जब याददाश्त कमजोर होना बढ़ती उम्र की स्वाभाविक प्रक्रिया माना जाता था। लेकिन अब स्थिति बदल चुकी है। आज 20 से 30 वर्ष की आयु के युवाओं में भी भूलने की शिकायतें तेजी से बढ़ रही हैं। मोबाइल फोन पर अत्यधिक निर्भरता, लगातार स्क्रीन टाइम, नींद की कमी, तनाव, असंतुलित खानपान और शारीरिक निष्क्रियता जैसी आदतें मस्तिष्क की कार्यक्षमता पर सीधा असर डाल रही हैं। विश्व मस्तिष्क दिवस (22 जुलाई) के अवसर पर न्यूरोलॉजी विशेषज्ञों ने भी चेतावनी दी है कि यदि समय रहते इन कारणों पर ध्यान नहीं दिया गया तो भविष्य में संज्ञानात्मक (कॉग्निटिव) समस्याएं और गंभीर हो सकती हैं।
क्या वास्तव में युवाओं की याददाश्त कमजोर हो रही है?
विशेषज्ञों का कहना है कि अधिकांश युवा अल्जाइमर जैसी बीमारी से नहीं जूझ रहे होते, बल्कि उनकी याददाश्त पर जीवनशैली का नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा होता है। लगातार मल्टीटास्किंग, हर जानकारी के लिए मोबाइल पर निर्भर रहना और एक साथ कई डिजिटल प्लेटफॉर्म का उपयोग करने से मस्तिष्क की एकाग्रता कम होती है। परिणामस्वरूप व्यक्ति छोटी-छोटी बातें भूलने लगता है, जैसे किसी का नाम, सामान कहां रखा या अभी-अभी क्या पढ़ा था।
न्यूरोसाइंस विशेषज्ञ इसे “डिजिटल ओवरलोड” की स्थिति बताते हैं, जिसमें मस्तिष्क को लगातार नई सूचनाएं मिलती रहती हैं, लेकिन उन्हें व्यवस्थित तरीके से याद रखने का पर्याप्त समय नहीं मिल पाता।
मोबाइल और इंटरनेट ने बदल दिया याद रखने का तरीका
आज अधिकांश लोग फोन नंबर, जन्मदिन, रास्ते और जरूरी नोट्स तक मोबाइल में सुरक्षित रखते हैं। इससे मस्तिष्क पर जानकारी याद रखने का अभ्यास कम होता जा रहा है। इसे “डिजिटल डिपेंडेंसी” कहा जाता है।
विशेषज्ञों के अनुसार तकनीक उपयोगी है, लेकिन जब हर छोटी जानकारी के लिए मस्तिष्क की बजाय मोबाइल का उपयोग किया जाने लगे तो स्मरण शक्ति का प्राकृतिक अभ्यास कम होने लगता है। इससे ध्यान केंद्रित करने की क्षमता भी प्रभावित होती है।
नींद की कमी सबसे बड़ा कारण बन रही है
अच्छी याददाश्त के लिए पर्याप्त और गुणवत्तापूर्ण नींद बेहद आवश्यक है। वैज्ञानिक शोध बताते हैं कि सोते समय मस्तिष्क दिनभर सीखी गई जानकारियों को व्यवस्थित करके दीर्घकालिक स्मृति में बदलता है।
यदि कोई व्यक्ति लगातार देर रात तक जागता है, बार-बार नींद टूटती है या प्रतिदिन 7–8 घंटे की गुणवत्तापूर्ण नींद नहीं लेता, तो नई जानकारी याद रखने और पुरानी जानकारी को याद करने की क्षमता प्रभावित हो सकती है।
तनाव और चिंता भी कमजोर कर रहे हैं मस्तिष्क
लगातार मानसिक तनाव शरीर में कोर्टिसोल हार्मोन का स्तर बढ़ा देता है। लंबे समय तक इसका स्तर ऊंचा रहने से मस्तिष्क के हिप्पोकैम्पस क्षेत्र पर प्रभाव पड़ सकता है, जो सीखने और याद रखने के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है।
आज प्रतियोगी परीक्षाओं का दबाव, नौकरी की अनिश्चितता, आर्थिक तनाव और सोशल मीडिया की तुलना की संस्कृति युवाओं में मानसिक दबाव बढ़ा रही है। इसका असर केवल मानसिक स्वास्थ्य पर ही नहीं बल्कि याददाश्त पर भी दिखाई देने लगा है।
खानपान का भी है सीधा संबंध
विशेषज्ञ बताते हैं कि मस्तिष्क को स्वस्थ रखने के लिए संतुलित आहार आवश्यक है। यदि भोजन में पर्याप्त प्रोटीन, ओमेगा-3 फैटी एसिड, विटामिन B12, फोलेट, आयरन और एंटीऑक्सीडेंट नहीं मिलते, तो मस्तिष्क की कार्यक्षमता प्रभावित हो सकती है।
जंक फूड, अत्यधिक चीनी वाले पेय, प्रोसेस्ड फूड और तली-भुनी चीजों का लगातार सेवन भी मस्तिष्क स्वास्थ्य के लिए अच्छा नहीं माना जाता। इसके विपरीत हरी सब्जियां, मेवे, फल, साबुत अनाज और मछली जैसे खाद्य पदार्थ मस्तिष्क के लिए लाभकारी माने जाते हैं।
शारीरिक गतिविधि की कमी भी बढ़ा रही समस्या
नियमित व्यायाम केवल शरीर ही नहीं बल्कि मस्तिष्क के लिए भी फायदेमंद है। व्यायाम से मस्तिष्क में रक्त संचार बेहतर होता है और नई तंत्रिका कोशिकाओं के विकास में मदद मिलती है।
जो लोग दिनभर बैठकर काम करते हैं और किसी प्रकार की शारीरिक गतिविधि नहीं करते, उनमें एकाग्रता और स्मरण शक्ति प्रभावित होने की संभावना अधिक देखी गई है।
कब समझें कि डॉक्टर से मिलने की जरूरत है?
सामान्य भूलने और गंभीर स्मृति समस्या में अंतर समझना जरूरी है। यदि कभी-कभी चाबी या मोबाइल रखना भूल जाएं तो यह सामान्य हो सकता है। लेकिन यदि बार-बार एक ही प्रश्न पूछना, हाल की घटनाएं भूल जाना, परिचित लोगों को पहचानने में कठिनाई होना या रोजमर्रा के कार्य करने में परेशानी होने लगे, तो विशेषज्ञ से परामर्श लेना चाहिए।
विश्व मस्तिष्क दिवस 2026 का संदेश
विश्व मस्तिष्क दिवस 2026 की थीम “Brain Health: Access for All” रखी गई है। विश्व फेडरेशन ऑफ न्यूरोलॉजी का कहना है कि दुनिया में 3.4 अरब से अधिक लोग किसी न किसी न्यूरोलॉजिकल समस्या से प्रभावित हैं। अभियान का उद्देश्य लोगों को मस्तिष्क स्वास्थ्य के प्रति जागरूक करना, समय पर जांच और उपचार उपलब्ध कराना तथा स्वस्थ जीवनशैली अपनाने के लिए प्रेरित करना है।
मस्तिष्क को स्वस्थ रखने के आसान उपाय
विशेषज्ञों के अनुसार कुछ सरल आदतें अपनाकर मस्तिष्क की कार्यक्षमता लंबे समय तक बेहतर रखी जा सकती है।
प्रतिदिन 7–8 घंटे की गुणवत्तापूर्ण नींद लें।
रोज कम से कम 30 मिनट व्यायाम करें।
संतुलित और पोषक आहार लें।
स्क्रीन टाइम सीमित रखें।
नई भाषा, पुस्तक, पहेली या कोई नया कौशल सीखते रहें।
तनाव कम करने के लिए योग और ध्यान करें।
धूम्रपान और अत्यधिक शराब से बचें।
नियमित स्वास्थ्य जांच कराते रहें।
क्या हर भूलने की समस्या अल्जाइमर का संकेत है?
विशेषज्ञ स्पष्ट करते हैं कि ऐसा बिल्कुल नहीं है। अधिकांश युवाओं में भूलने की समस्या जीवनशैली, तनाव, नींद की कमी या पोषण संबंधी कारणों से होती है। हालांकि यदि लक्षण लगातार बढ़ रहे हों और दैनिक जीवन प्रभावित होने लगे तो न्यूरोलॉजिस्ट से जांच कराना आवश्यक है। समय पर पहचान होने पर कई समस्याओं का प्रभावी उपचार और प्रबंधन संभव है।
तेजी से बदलती डिजिटल जीवनशैली ने सुविधाएं तो बढ़ाई हैं, लेकिन इसके साथ मस्तिष्क पर दबाव भी बढ़ा है। 20–30 वर्ष की उम्र में बढ़ती भूलने की समस्या इस बात का संकेत है कि केवल शारीरिक स्वास्थ्य ही नहीं, बल्कि मस्तिष्क के स्वास्थ्य पर भी समान ध्यान देना होगा। पर्याप्त नींद, संतुलित आहार, नियमित व्यायाम, सीमित स्क्रीन टाइम और तनाव प्रबंधन जैसी आदतें न केवल याददाश्त को बेहतर बनाएंगी, बल्कि भविष्य में गंभीर न्यूरोलॉजिकल बीमारियों के जोखिम को भी कम करने में मदद कर सकती हैं। विश्व मस्तिष्क दिवस का संदेश भी यही है कि स्वस्थ मस्तिष्क, स्वस्थ जीवन की सबसे महत्वपूर्ण नींव है।






