
संवाद 24 डेस्क। यूपीआई भुगतान को लेकर हाल में सामने आए नए मर्चेंट डिस्काउंट रेट यानी एमडीआर के प्रावधान ने डिजिटल भुगतान करने वाले ग्राहकों और व्यापारियों के बीच चर्चा बढ़ा दी है। खासकर ₹2,000 से अधिक के कुछ व्यापारी लेन-देन पर एमडीआर लागू होने की व्यवस्था को लेकर यह सवाल उठ रहा है कि आखिर इस शुल्क का भुगतान कौन करेगा और इससे मिलने वाली रकम कहां जाएगी। केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने इस संबंध में स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा है कि एमडीआर को ग्राहक पर नहीं डाला जाएगा और इससे मिलने वाली रकम भारत सरकार के खाते में जमा नहीं होगी।
सबसे पहले समझिए, एमडीआर आखिर है क्या?
मर्चेंट डिस्काउंट रेट यानी एमडीआर वह शुल्क है जो डिजिटल भुगतान की प्रक्रिया में व्यापारी पक्ष से भुगतान तंत्र में शामिल संस्थाओं को दिया जाता है। इसमें बैंक, भुगतान सेवा प्रदाता और यूपीआई एप्लिकेशन प्रदाता जैसे विभिन्न भागीदार शामिल होते हैं। सरकार के अनुसार नया ढांचा यूपीआई के पूरे भुगतान तंत्र को वित्तीय रूप से टिकाऊ बनाने और इसके विस्तार के लिए तैयार किया गया है।
वित्त मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि नया एमडीआर सभी यूपीआई भुगतानों पर लागू नहीं होगा। व्यक्ति से व्यक्ति यानी पी2पी लेन-देन किसी भी राशि का हो, वह निःशुल्क रहेगा। इसी तरह व्यापारियों को किए जाने वाले ₹2,000 तक के यूपीआई भुगतान पर भी एमडीआर नहीं लगेगा। सरकार के अनुसार करीब 96 प्रतिशत व्यापारी यूपीआई लेन-देन इस नए प्रावधान से अप्रभावित रहेंगे।
सीतारमण ने क्यों कहा- सरकार के खाते में नहीं जाएगा पैसा?
एमडीआर को लेकर सबसे महत्वपूर्ण स्पष्टीकरण वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण की ओर से आया है। उन्होंने कहा कि एमडीआर को कर या उपकर समझना सही नहीं है। यह सरकार की ओर से लगाया गया ऐसा शुल्क नहीं है, जिसकी राशि भारत के समेकित कोष में जमा की जाए।
सीतारमण के अनुसार यह भुगतान प्रणाली में शामिल संस्थाओं के बीच होने वाला व्यावसायिक शुल्क है। इससे प्राप्त राशि भुगतान तंत्र में शामिल बैंकों, सेवा प्रदाताओं और अन्य संबंधित भागीदारों के बीच वितरित की जाएगी। इसका उद्देश्य भुगतान प्रणाली के संचालन, रखरखाव और भविष्य में इसके विस्तार के लिए आर्थिक आधार उपलब्ध कराना है।
₹2,000 से ज्यादा के भुगतान पर क्या बदलेगा?
नए ढांचे के तहत निर्धारित व्यक्ति से व्यापारी यानी पी2एम लेन-देन, जिनकी राशि ₹2,000 से अधिक है, उन पर सामान्य रूप से 0.4 प्रतिशत एमडीआर लागू होगा। हालांकि यह व्यवस्था सभी श्रेणियों के लेन-देन के लिए समान नहीं है और कुछ क्षेत्रों के लिए अलग दर निर्धारित की गई है।
₹75,000 या उससे अधिक राशि वाले निर्धारित व्यापारी लेन-देन में एमडीआर की अधिकतम सीमा ₹300 प्रति लेन-देन रखी गई है। इसका अर्थ यह है कि बड़ी राशि के भुगतान पर भी निर्धारित सीमा से अधिक एमडीआर नहीं लिया जा सकेगा।
मसलन, यदि किसी पात्र व्यापारी लेन-देन की राशि ₹10,000 है तो 0.4 प्रतिशत के हिसाब से एमडीआर ₹40 बनता है। वहीं ₹75,000 के लेन-देन पर 0.4 प्रतिशत ₹300 होता है और इसके ऊपर भी निर्धारित सीमा के अनुसार अधिकतम एमडीआर ₹300 ही रहेगा।
ग्राहक के लिए सबसे बड़ी राहत क्या है?
नए प्रावधान को लेकर आम यूपीआई उपयोगकर्ताओं के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात यही है कि एमडीआर ग्राहक से लेने के लिए नहीं है। वित्त मंत्रालय ने कहा है कि बैंकों को यह सुनिश्चित करने की सलाह दी गई है कि व्यापारी एमडीआर का बोझ ग्राहक पर न डालें। यूपीआई एप्लिकेशन प्रदाताओं को प्लेटफॉर्म या छिपे हुए शुल्क लगाने से भी प्रतिबंधित किया गया है।
इसका मतलब यह है कि किसी वस्तु या सेवा का भुगतान यूपीआई से करने वाले ग्राहक से केवल यूपीआई का इस्तेमाल करने के कारण अलग से एमडीआर वसूलने की व्यवस्था नहीं है। वित्त मंत्री ने इसी संदर्भ में कार्ड भुगतान की व्यवस्था का उदाहरण भी दिया और कहा कि व्यापारी सामान्य तौर पर कार्ड भुगतान से जुड़े एमडीआर को ग्राहक के बिल में अलग से नहीं जोड़ते।
छोटे दुकानदारों और रेहड़ी-पटरी वालों के लिए क्या व्यवस्था है?
नए ढांचे में छोटे व्यापारियों को भी विशेष राहत दी गई है। सरकार के अनुसार पी2पीएम श्रेणी में आने वाले छोटे व्यापारी, जो यूपीआई क्यूआर कोड के माध्यम से प्रति माह ₹1 लाख तक प्राप्त करते हैं, उन्हें शून्य एमडीआर की सुविधा जारी रहेगी।
इसका उद्देश्य छोटे दुकानदारों, स्थानीय कारोबारियों और सड़क किनारे सामान बेचने वाले व्यापारियों पर डिजिटल भुगतान की लागत का अतिरिक्त बोझ न पड़ने देना है। वित्त मंत्रालय के अनुसार इस व्यवस्था से छोटे व्यापारियों को डिजिटल भुगतान स्वीकार करने के लिए प्रोत्साहित करने में मदद मिलेगी।
रेलवे, ईंधन और बीमा जैसे क्षेत्रों के लिए अलग दर
सभी क्षेत्रों पर 0.4 प्रतिशत की सामान्य दर लागू नहीं होगी। रेलवे, दूरसंचार, बीमा, ईंधन और कृषि इनपुट जैसे आवश्यक तथा अपेक्षाकृत कम लाभ वाले क्षेत्रों में ₹2,000 से अधिक के पात्र लेन-देन के लिए ₹5 प्रति लेन-देन का निश्चित एमडीआर निर्धारित किया गया है।
सरकार के अनुसार इस व्यवस्था का उद्देश्य ऐसे क्षेत्रों में भुगतान लागत को पूर्वानुमेय बनाए रखना है, जहां कारोबार का मार्जिन अपेक्षाकृत कम हो सकता है।
शेयर बाजार और म्यूचुअल फंड से जुड़े भुगतान का क्या होगा?
पूंजी बाजार से जुड़े कुछ भुगतानों के लिए भी अलग एमडीआर दर रखी गई है। म्यूचुअल फंड, प्रतिभूतियों, स्टॉक ब्रोकरों और डीलरों से संबंधित पात्र भुगतान पर 0.02 प्रतिशत एमडीआर निर्धारित किया गया है, जिसकी अधिकतम सीमा ₹300 प्रति लेन-देन है।
सरकार ने कम दर रखने का उद्देश्य वित्तीय बाजारों में खुदरा भागीदारी को बनाए रखना बताया है।
96 प्रतिशत व्यापारी लेन-देन क्यों रहेंगे प्रभावित होने से बाहर?
सरकारी आंकड़ों के अनुसार नए ढांचे के तहत लगभग 96 प्रतिशत पी2एम यूपीआई लेन-देन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। इसकी वजह यह है कि बड़ी संख्या में व्यापारी लेन-देन ₹2,000 या उससे कम राशि के हैं या वे छोटे व्यापारियों के लिए बनाए गए शून्य-एमडीआर ढांचे में आते हैं।
सरकार के मुताबिक एमडीआर का प्रभाव लगभग 4 प्रतिशत व्यापारी लेन-देन तक सीमित रहने का अनुमान है। यह आंकड़ा सरकार द्वारा उपलब्ध कराए गए लेन-देन संबंधी विश्लेषण पर आधारित है।
व्यक्ति से व्यक्ति यूपीआई भुगतान पर कोई शुल्क नहीं
यदि कोई व्यक्ति अपने बैंक खाते से किसी दूसरे व्यक्ति के खाते में यूपीआई के माध्यम से पैसा भेजता है तो उस पर नए एमडीआर ढांचे का असर नहीं होगा। राशि चाहे कितनी भी हो, पी2पी यूपीआई लेन-देन निःशुल्क रहेगा।
वित्त मंत्रालय के अनुसार यूपीआई के कुल लेन-देन मूल्य में पी2पी लेन-देन की हिस्सेदारी करीब 70 प्रतिशत है। इसलिए एमडीआर की नई व्यवस्था यूपीआई के इस बड़े हिस्से को सीधे प्रभावित नहीं करती।
आखिर एमडीआर लागू करने की जरूरत क्यों पड़ी?
सरकार ने नए ढांचे को यूपीआई की दीर्घकालीन स्थिरता से जोड़कर देखा है। यूपीआई का उपयोग लगातार बढ़ने के साथ इसके संचालन, तकनीकी ढांचे, सुरक्षा और विस्तार पर भी खर्च बढ़ता है। अब तक यूपीआई पर व्यापारिक लेन-देन के लिए व्यापक शून्य-एमडीआर व्यवस्था रही है।
नए ढांचे का घोषित उद्देश्य भुगतान तंत्र से जुड़े संस्थानों के लिए एक सीमित राजस्व मॉडल तैयार करना है, ताकि यूपीआई के संचालन और विस्तार के लिए आवश्यक निवेश जारी रह सके। वित्त मंत्रालय ने कहा है कि इससे प्राप्त राशि भुगतान पारिस्थितिकी तंत्र के प्रतिभागियों के बीच वितरित होगी।
एमडीआर से मिलने वाली राशि का एक हिस्सा छोटे व्यापारियों के लिए
नए ढांचे में छोटे व्यापारियों के बीच यूपीआई के इस्तेमाल को बढ़ावा देने के लिए एक विशेष कोष बनाने का भी प्रावधान किया गया है। सरकार के अनुसार कुल एमडीआर संग्रह के 5 प्रतिशत के बराबर राशि इस कोष में दी जाएगी।
इस राशि का उपयोग छोटे व्यापारियों के बीच यूपीआई स्वीकार्यता बढ़ाने, डिजिटल भुगतान के निरंतर इस्तेमाल को प्रोत्साहित करने और छोटे व्यवसायों को डिजिटल भुगतान व्यवस्था से जोड़ने के लिए किया जाएगा।
सरकार के स्पष्टीकरण से क्या साफ हुआ?
पूरे विवाद और चर्चाओं के बीच तीन बातें स्पष्ट हैं। पहली, यूपीआई का व्यक्ति-से-व्यक्ति भुगतान निःशुल्क रहेगा। दूसरी, ₹2,000 तक के सामान्य व्यापारी भुगतान और निर्धारित छोटे व्यापारियों के लेन-देन पर शून्य एमडीआर की व्यवस्था जारी रहेगी। तीसरी, पात्र ₹2,000 से अधिक के व्यापारी लेन-देन पर लगने वाला एमडीआर ग्राहक से वसूलने के लिए नहीं है और इसकी राशि सरकार के समेकित कोष में जमा नहीं होगी।
हालांकि व्यापारियों के लिए इसका वास्तविक प्रभाव इस बात पर निर्भर करेगा कि उनका कारोबार किस श्रेणी में आता है, उनके लेन-देन का औसत मूल्य कितना है और भुगतान सेवा प्रदाताओं के बीच एमडीआर का वितरण किस प्रकार होता है। इसलिए व्यापारियों के लिए नई दरों और अपनी श्रेणी से जुड़े नियमों को समझना महत्वपूर्ण होगा।
ग्राहकों को फिलहाल किन बातों का ध्यान रखना चाहिए?
यूपीआई उपयोगकर्ताओं को एमडीआर को लेकर अफवाहों के आधार पर अतिरिक्त भुगतान करने से बचना चाहिए। यदि कोई व्यापारी यूपीआई से भुगतान करने पर अलग से शुल्क मांगता है तो ग्राहक को बिल और शुल्क की प्रकृति स्पष्ट रूप से पूछनी चाहिए। सरकार ने बैंकों को यह सुनिश्चित करने के लिए कहा है कि एमडीआर का बोझ ग्राहकों पर न डाला जाए।
साथ ही, किसी भी डिजिटल भुगतान से पहले राशि, व्यापारी का नाम और भुगतान प्राप्तकर्ता की जानकारी जांचना हमेशा जरूरी है। एमडीआर की व्यवस्था और साइबर सुरक्षा अलग-अलग विषय हैं; शुल्क न लगने का अर्थ यह नहीं है कि उपयोगकर्ता को डिजिटल भुगतान के सामान्य सुरक्षा नियमों की अनदेखी करनी चाहिए।
यूपीआई व्यवस्था में यह बदलाव कितना महत्वपूर्ण?
भारत में यूपीआई ने रोजमर्रा के छोटे भुगतान से लेकर व्यापारिक लेन-देन तक डिजिटल भुगतान की तस्वीर बदल दी है। ऐसे में एमडीआर की नई व्यवस्था केवल शुल्क में बदलाव का विषय नहीं है, बल्कि इसके पीछे यूपीआई के आर्थिक मॉडल को लेकर भी एक बड़ा बदलाव दिखाई देता है।
सरकार का कहना है कि नया ढांचा आम नागरिकों और छोटे व्यापारियों को सुरक्षित रखते हुए यूपीआई के दीर्घकालीन विस्तार के लिए भुगतान पारिस्थितिकी तंत्र को आर्थिक आधार देगा। दूसरी ओर, बड़े व्यापारी लेन-देन करने वाले कारोबारियों के लिए एमडीआर एक नई लागत बनेगा, जिसका असर उनके भुगतान संचालन की अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है। इस प्रभाव का वास्तविक आकलन नई व्यवस्था के लागू होने के बाद ही अधिक स्पष्ट होगा।
फिलहाल वित्त मंत्री का स्पष्टीकरण इतना स्पष्ट है कि एमडीआर को सरकार द्वारा वसूला जाने वाला कर नहीं माना गया है और इससे मिलने वाली राशि भारत सरकार के खाते में राजस्व के रूप में जमा नहीं होगी। ग्राहक के लिए भी सरकार ने स्पष्ट किया है कि निर्धारित एमडीआर का बोझ उस पर नहीं डाला जाना चाहिए। ऐसे में यूपीआई उपयोगकर्ताओं के लिए सबसे अहम बात यही है कि सामान्य व्यक्ति-से-व्यक्ति भुगतान और ₹2,000 तक के पात्र व्यापारी भुगतान निःशुल्क बने रहेंगे, जबकि नए शुल्क का दायरा सीमित व्यापारी लेन-देन तक रखा गया है।






