आईआईटी कानपुर: प्रतिभा का केंद्र या मानसिक दबाव का शिकार?

संवाद 24 संवाददाता। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) कानपुर देश के सबसे प्रतिष्ठित शैक्षणिक संस्थानों में से एक है। यहां प्रवेश पाना लाखों छात्रों का सपना होता है। लेकिन हाल के वर्षों में यह संस्थान लगातार छात्र आत्महत्याओं की घटनाओं से सुर्खियों में रहा है। 29 दिसंबर 2025 को बीटेक अंतिम वर्ष के छात्र जय सिंह मीणा (26 वर्ष) ने हॉस्टल के अपने कमरे में फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली।इससे पहले उन्होंने कलाई की नसें काटने की कोशिश की थी और एक नोटबुक में लिखा था – “Sorry Everyone…”। यह घटना 2025 में संस्थान की चौथी और पिछले 22-26 महीनों में आठवीं आत्महत्या है।

जय सिंह मीणा राजस्थान के अजमेर के रहने वाले थे। उन्होंने 2020 में बायोलॉजिकल साइंसेज एंड बायोइंजीनियरिंग विभाग में दाखिला लिया था। उनका चार वर्षीय कोर्स 2024 में पूरा हो जाना चाहिए था, लेकिन सूत्रों के अनुसार कुछ विषयों में कमजोर प्रदर्शन के कारण बैक पेपर और ईयर बैक की आशंका थी। चर्चा है कि प्लेसमेंट में दो बार शामिल न होने का अवसर न मिलना और पढ़ाई का दबाव उन्हें परेशान कर रहा था। संस्थान ने उनकी एकेडमिक रिपोर्ट तलब की है, लेकिन अभी तक आधिकारिक कारण स्पष्ट नहीं हुआ है। पुलिस और प्रशासन दोनों मानसिक एवं शैक्षणिक पहलुओं की जांच कर रहे हैं।

लगातार बढ़ती घटनाएं: एक चिंताजनक पैटर्न – पिछले कुछ वर्षों में आईआईटी कानपुर में आत्महत्याओं की संख्या चिंताजनक रूप से बढ़ी है। कुछ प्रमुख मामले:
19 दिसंबर 2023: शोध सहायक डॉ. पल्लवी चिल्का
10 जनवरी 2024: एमटेक छात्र विकास कुमार मीणा
18 जनवरी 2024: पीएचडी छात्रा प्रियंका जायसवाल
10 अक्टूबर 2024: पीएचडी छात्रा प्रगति खार्या
10 फरवरी 2025: पीएचडी स्कॉलर अंकित यादव
25 अगस्त 2025: सॉफ्टवेयर डेवलपर दीपक चौधरी
1 अक्टूबर 2025: बीटेक छात्र धीरज सैनी
29 दिसंबर 2025: बीटेक छात्र जय सिंह मीणा

ये घटनाएं बताती हैं कि संस्थान में मानसिक स्वास्थ्य की समस्या गंभीर है। पूरे आईआईटी सिस्टम में भी स्थिति कम चिंताजनक नहीं – 2021 से 2025 तक 65 से अधिक छात्र आत्महत्याएं हुईं, जिनमें अकेले आईआईटी कानपुर में कई मामले शामिल हैं। राष्ट्रीय स्तर पर छात्र आत्महत्याएं बढ़ रही हैं, और आईआईटी जैसे प्रतिस्पर्धी संस्थानों में एकेडमिक स्ट्रेस मुख्य कारण माना जाता है। सर्वे बताते हैं कि 61% छात्र एकेडमिक दबाव को साथी छात्रों की आत्महत्या का प्रमुख कारण मानते हैं।

संस्थान की व्यवस्थाएं: पर्याप्त या अपर्याप्त?
आईआईटी कानपुर प्रशासन का दावा है कि छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य के लिए मजबूत इंतजाम हैं:
10 प्रोफेशनल काउंसलर (मनोवैज्ञानिक और मनोचिकित्सक शामिल), 24 घंटे उपलब्ध।
तीन एम्पेनल्ड साइकियाट्रिस्ट।
24 घंटे ऑनलाइन हेल्पलाइन।
डी-एडिक्शन क्लीनिक।
हर 30 छात्रों पर एक फैकल्टी एडवाइजर।
नए छात्रों की मानसिक स्वास्थ्य स्क्रीनिंग और जरूरतमंदों के लिए फॉलो-अप।

पिछले मामलों के बाद संस्थान ने पोस्टग्रेजुएट स्तर पर ‘नो टर्मिनेशन पॉलिसी’ लागू की और काउंसलिंग टीम को मजबूत किया। हाल ही में मेंटल हेल्थ एंड वेलबीइंग सेंटर स्थापित करने की योजना भी है।
लेकिन लगातार घटनाएं सवाल उठाती हैं: क्या ये व्यवस्थाएं वास्तव में जरूरतमंद छात्रों तक पहुंच रही हैं? क्या स्टिग्मा के कारण छात्र मदद मांगने से हिचकिचाते हैं? या अत्यधिक प्रतिस्पर्धा, प्लेसमेंट का दबाव और एकाकीपन जैसी समस्याएं इतनी गहरी हैं कि मौजूदा सिस्टम पर्याप्त नहीं?

आगे की राह: बदलाव की जरूरत
ये घटनाएं सिर्फ व्यक्तिगत त्रासदियां नहीं, बल्कि पूरे शिक्षा तंत्र की नाकामी का संकेत हैं। आईआईटी जैसे संस्थानों में सफलता का पैमाना केवल ग्रेड और प्लेसमेंट नहीं होना चाहिए। जरूरी है:
काउंसलिंग को अधिक पहुंच योग्य और स्टिग्मा-मुक्त बनाना।
एकेडमिक दबाव कम करने के लिए लचीली नीतियां (जैसे बैक पेपर पर सहानुभूति)।
पीयर सपोर्ट ग्रुप और मेंटॉरशिप को मजबूत करना।
परिवार और समाज से जुड़ाव बढ़ाना।
राष्ट्रीय स्तर पर मानसिक स्वास्थ्य को शिक्षा का अभिन्न हिस्सा बनाना।

Pavan Singh
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