संवेदना शर्मसार, व्यवस्था बेबस: इलाज के पैसों के झगड़े में तीन दिन तक सड़ता रहा मासूम का शव, समझौते के बाद हुई चिता प्रज्वलित
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संवाद 24 संवाददाता। उत्तर प्रदेश के Farrukhabad जिले से सामने आया यह मामला न सिर्फ मानवीय संवेदनाओं को झकझोरता है, बल्कि प्रशासनिक उदासीनता पर भी गंभीर सवाल खड़े करता है। इलाज में खर्च हुए 3.70 लाख रुपये के विवाद में एक चार माह की मासूम बच्ची का शव तीन दिन तक उसके ननिहाल में पड़ा रहा। दुर्गंध फैलने के बावजूद न तो तत्काल समाधान निकला, न ही समय पर सख्त कार्रवाई हुई। आखिरकार शुक्रवार शाम पुलिस की मौजूदगी में दोनों पक्षों के बीच समझौते के बाद अंतिम संस्कार कराया गया।
मऊदरवाजा थाना क्षेत्र के गांव जनैया सठैया निवासी मोतीलाल राजपूत ने बताया कि डेढ़ साल पहले उन्होंने बेटी सुमन (20) की शादी एटा जिले के तारा नगला गांव निवासी रमाकांत से की थी। शादी के कुछ समय बाद ससुराल में मारपीट के आरोप सामने आए, जिसके चलते चार माह पहले सुमन को मायके लाया गया। यहां ऑपरेशन के बाद उसने बच्ची धेवती को जन्म दिया, जो जन्म से ही गंभीर रूप से बीमार थी।
दो माह तक अस्पताल में इलाज चला। इस दौरान परिवार ने जेवरात और खेत गिरवी रखकर करीब 3.70 लाख रुपये जुटाए। हालत में कुछ सुधार होने पर पंचायत के बाद ससुराल पक्ष मां-बेटी को ले गया, लेकिन आरोप है कि वहां फिर से मारपीट और लापरवाही हुई, जिससे बच्ची की तबीयत बिगड़ गई। इसके बाद दोनों को दोबारा मायके लाया गया, जहां बुधवार को मासूम ने दम तोड़ दिया।
परिजनों का आरोप है कि मौत की सूचना मिलने पर ससुराल पक्ष आया, लेकिन इलाज में खर्च रकम लौटाने से इनकार कर दिया। ननिहाल पक्ष ने रकम मिलने तक अंतिम संस्कार से मना कर दिया। पुलिस दो बार मौके पर पहुंची, लेकिन कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। शव घर में ही पड़ा रहा और दुर्गंध फैलती रही।
मृत बच्ची की नानी ऊषा ने आरोप लगाया कि पुलिस ने ससुराल पक्ष की बात ज्यादा सुनी। वहीं, मामले पर सफाई देते हुए पुलिस अधीक्षक Aarti Singh ने कहा कि पुलिस लगातार परिजनों को समझाती रही, लेकिन ननिहाल पक्ष इलाज के खर्च की मांग पर अड़ा था। स्थिति नियंत्रित करने के लिए बच्ची के बाबा को थाने में बैठाया गया। अंततः शुक्रवार शाम दोनों पक्षों में समझौते के बाद अंतिम संस्कार कराया गया।
गरीबी, ठंड और ग़म के बीच सवालों में घिरी पुलिस
जनैया सठैया गांव में तीन दिनों तक मातम पसरा रहा। कड़ाके की ठंड में ग्रामीण अलाव जलाकर परिवार को सांत्वना देते रहे। मोतीलाल की आर्थिक हालत बेहद कमजोर है—जेवरात, फसल और खेत तक गिरवी रखने पड़े। गांव वालों का कहना है कि दुख की इस घड़ी में प्रशासन की संवेदनशील मौजूदगी की अपेक्षा थी, लेकिन कार्रवाई देर से हुई।
यह घटना सिर्फ एक परिवार का दुख नहीं, बल्कि उस व्यवस्था पर प्रश्नचिह्न है, जहां कानून और मानवता के बीच संतुलन समय पर नहीं बन पाया। तीन दिन तक सड़ता शव और देर से हुआ अंतिम संस्कार—यह दृश्य समाज और प्रशासन दोनों के लिए आत्ममंथन की मांग करता है।






