
संवाद 24 डेस्क। भारत में दीपावली का त्योहार केवल दीप जलाने, मिठाइयां बांटने और मां लक्ष्मी की पूजा करने तक सीमित नहीं है। देश के अलग-अलग क्षेत्रों में इस पर्व को मनाने की अपनी विशिष्ट परंपराएं और सांस्कृतिक पहचान हैं। कहीं लोकगीतों की मधुर धुन सुनाई देती है तो कहीं पारंपरिक नृत्य और संगीत उत्सव की रौनक बढ़ाते हैं। उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र में दीपावली का एक ऐसा ही अनूठा आकर्षण देखने को मिलता है, जिसे दिवारी नृत्य के नाम से जाना जाता है। ढोल-नगाड़ों की गूंज, पैरों में बंधे घुंघरुओं की झंकार और हाथों में लंबी लाठियां लेकर करतब दिखाते कलाकार इस लोकनृत्य को बेहद रोमांचक बना देते हैं।
दिवारी नृत्य केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं है, बल्कि यह बुंदेलखंड की वीरता, सामूहिक एकता, धार्मिक आस्था और लोकजीवन का प्रतीक भी माना जाता है। इस नृत्य में कलाकार जिस फुर्ती और कौशल के साथ लाठियों का संचालन करते हैं, उसे देखकर दर्शक आश्चर्यचकित रह जाते हैं। विशेष बात यह है कि इस परंपरा का संबंध भगवान श्रीकृष्ण और द्वापर युग की एक लोकप्रिय धार्मिक मान्यता से भी जोड़ा जाता है। यही वजह है कि दीपावली के आसपास बुंदेलखंड के गांवों और कस्बों में दिवारी नृत्य की विशेष धूम रहती है।
क्या है बुंदेलखंड का दिवारी नृत्य?
दिवारी नृत्य बुंदेलखंड की प्रमुख पारंपरिक लोककलाओं में से एक है। इसे कुछ स्थानों पर पाई डंडा नृत्य, बरेदी या अहीरी नृत्य के नाम से भी जाना जाता है। स्थानीय परंपराओं के अनुसार, इस नृत्य में मुख्य रूप से अहीर और यादव समुदाय के लोग भाग लेते हैं। कलाकार समूह बनाकर पारंपरिक वेशभूषा में नृत्य करते हैं और हाथों में लाठियां लेकर एक-दूसरे के सामने युद्धकला जैसे करतब प्रस्तुत करते हैं।
इस नृत्य की सबसे बड़ी विशेषता इसकी लय और ताल है। ढोलक, नगाड़े और अन्य पारंपरिक वाद्ययंत्रों की आवाज के साथ कलाकार एक निश्चित ताल में कदम बढ़ाते हैं। इसके बाद लाठियों को घुमाने, आपस में टकराने, प्रहार करने और उनसे बचाव करने की गतिविधियां शुरू होती हैं। यह पूरा प्रदर्शन इतना तालमेल भरा होता है कि देखने वालों को युद्ध के मैदान जैसा रोमांच महसूस होता है।
दिवारी नृत्य में केवल शारीरिक फुर्ती ही नहीं, बल्कि एकाग्रता, अनुशासन और आपसी तालमेल की भी जरूरत होती है। कलाकारों को यह समझना पड़ता है कि किस समय लाठी का प्रहार करना है और किस समय उससे बचाव करना है। जरा-सी असावधानी से चोट लग सकती है। इसलिए इस लोककला का प्रदर्शन करने वाले कलाकार लंबे समय तक अभ्यास करते हैं।
द्वापर युग से कैसे जुड़ी है दिवारी नृत्य की कहानी?
दिवारी नृत्य की उत्पत्ति को लेकर बुंदेलखंड में कई लोकमान्यताएं प्रचलित हैं। इनमें सबसे लोकप्रिय मान्यता भगवान श्रीकृष्ण और गोवर्धन पर्वत से जुड़ी हुई है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, द्वापर युग में जब भगवान श्रीकृष्ण ने ब्रजवासियों और उनके पशुधन को इंद्रदेव के प्रकोप से बचाने के लिए गोवर्धन पर्वत को अपनी छोटी उंगली पर उठा लिया था, तब गोकुल और आसपास के ग्वाल-बालों में प्रसन्नता की लहर दौड़ गई थी।
कथा के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण ने लगातार वर्षा से लोगों और पशुओं की रक्षा की थी। गोवर्धन पर्वत के नीचे कई दिनों तक आश्रय लेने के बाद जब संकट समाप्त हुआ, तब ब्रजवासियों ने खुशी मनाई। इसी प्रसन्नता में ग्वाल-बालों ने लाठियां लेकर नृत्य और उत्सव किया। लोकविश्वास के अनुसार, इसी परंपरा से आगे चलकर दिवारी नृत्य का विकास हुआ।
अहीर और यादव समुदाय के लोग भगवान श्रीकृष्ण को अपना आराध्य मानते हैं। भगवान कृष्ण का जीवन ग्वाल-बालों, गायों और ग्रामीण संस्कृति से गहराई से जुड़ा हुआ है। इसलिए दिवारी नृत्य के माध्यम से यह समुदाय अपनी धार्मिक आस्था और सांस्कृतिक विरासत को अभिव्यक्त करता है।
हालांकि, यह ध्यान रखना जरूरी है कि द्वापर युग से इस नृत्य की शुरुआत होने की बात धार्मिक लोकमान्यता है। इसके ऐतिहासिक आरंभ की कोई निश्चित तिथि या समकालीन लिखित प्रमाण उपलब्ध नहीं है। लोककलाओं का इतिहास अक्सर पीढ़ियों से चली आ रही मौखिक परंपराओं, धार्मिक कथाओं और स्थानीय स्मृतियों के माध्यम से सुरक्षित रहता है।
चंदेल राजाओं के शासनकाल से भी जुड़ती है परंपरा
दिवारी नृत्य के इतिहास को लेकर एक अन्य मान्यता इसे बुंदेलखंड के चंदेल राजाओं के शासनकाल से जोड़ती है। कुछ स्थानीय इतिहासकारों और संस्कृति के जानकारों का मानना है कि चंदेल शासन के दौरान इस लोकविधा को विशेष प्रोत्साहन मिला। उस समय समाज में शारीरिक क्षमता, युद्धकौशल और आत्मरक्षा को महत्वपूर्ण माना जाता था।
ऐसा माना जाता है कि गांवों में युवाओं को शारीरिक रूप से मजबूत और साहसी बनाने के उद्देश्य से लाठी चलाने जैसी कलाओं को बढ़ावा दिया जाता था। धीरे-धीरे इन अभ्यासों ने उत्सव और सामूहिक प्रदर्शन का रूप ले लिया। धार्मिक आस्था और लोकगीतों के साथ जुड़ने के बाद यह कला दिवारी नृत्य के रूप में लोकप्रिय हुई।
बुंदेलखंड का इतिहास वीरता और संघर्ष की अनेक गाथाओं से भरा हुआ है। यहां के लोकजीवन में साहस, स्वाभिमान और सामुदायिक सहयोग को विशेष महत्व दिया जाता रहा है। ऐसे वातावरण में लाठी संचालन और युद्धकौशल से जुड़ी लोककलाओं का विकसित होना स्वाभाविक माना जा सकता है।
फिर भी चंदेल काल में ही दिवारी नृत्य की शुरुआत हुई थी, इसे निर्विवाद ऐतिहासिक तथ्य के बजाय एक प्रचलित ऐतिहासिक मान्यता के रूप में समझना अधिक उचित है। इसकी वास्तविक ऐतिहासिक यात्रा को समझने के लिए स्थानीय अभिलेखों, लोकसाहित्य और मौखिक परंपराओं के व्यवस्थित अध्ययन की आवश्यकता है।
दीपावली से भाई दूज तक गांव-गांव में होता है आयोजन
बुंदेलखंड में दिवारी नृत्य का आयोजन मुख्य रूप से दीपावली के आसपास किया जाता है। कई क्षेत्रों में इसकी शुरुआत दीपावली के अगले दिन यानी गोवर्धन पूजा या परेवा से होती है। इसके बाद भाई दूज तक कलाकारों की टोलियां गांवों और कस्बों में अपनी कला का प्रदर्शन करती हैं। कुछ स्थानों पर कार्तिक मास के दौरान भी इस नृत्य की प्रस्तुतियां देखने को मिलती हैं।
दीपावली के बाद गांवों में उत्सव का वातावरण बना रहता है। इसी दौरान दिवारी खेलने वाले कलाकार अपनी टोलियां बनाकर निकलते हैं। वे अलग-अलग घरों, चौपालों और सार्वजनिक स्थानों पर पहुंचकर नृत्य प्रस्तुत करते हैं। ग्रामीण बड़ी संख्या में एकत्र होकर इस पारंपरिक कला का आनंद लेते हैं।
कई जगह कलाकारों को सम्मान और पारंपरिक आतिथ्य भी दिया जाता है। इस प्रकार दिवारी नृत्य केवल कलाकारों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरा गांव इसमें भागीदार बनता है। बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक सभी के लिए यह आयोजन आकर्षण का केंद्र होता है।
बुंदेलखंड के बांदा, चित्रकूट, महोबा, हमीरपुर, झांसी और आसपास के इलाकों में इस लोककला की अलग-अलग शैलियां देखने को मिलती हैं। मध्य प्रदेश के सागर, टीकमगढ़ और अन्य बुंदेलखंडी क्षेत्रों में भी दीपावली के अवसर पर इससे जुड़ी परंपराएं निभाई जाती हैं।
लाठी, घुंघरू और रंगीन वेशभूषा है इस नृत्य की पहचान
दिवारी नृत्य की प्रस्तुति में कलाकारों की वेशभूषा और साज-सज्जा का विशेष महत्व होता है। पारंपरिक रूप से नर्तक रंग-बिरंगे कपड़े पहनते हैं। उनके पैरों में घुंघरू बांधे जाते हैं, कमर में पट्टा लगाया जाता है और हाथों में मजबूत लाठियां रहती हैं। कुछ क्षेत्रों में कलाकार अपने पहनावे में मोरपंख भी लगाते हैं। प्रमुख कलाकार के हाथ में मोरपंखों का गुच्छा दिखाई देना भी इस परंपरा की एक विशेष पहचान है।
नृत्य के दौरान कलाकारों के कदमों की गति और शरीर की मुद्राएं संगीत के अनुरूप बदलती रहती हैं। ढोलक और नगाड़ों की थाप जैसे-जैसे तेज होती है, कलाकारों के करतब भी अधिक रोमांचक हो जाते हैं। वे लाठियों को हवा में घुमाते हैं, एक-दूसरे की लाठियों से टकराते हैं और तेजी से पीछे हटकर बचाव करते हैं।
इसमें कई बार कलाकार ऊंची छलांग लगाते हैं और शरीर को लचीले ढंग से मोड़कर कठिन करतब दिखाते हैं। कुछ प्रस्तुतियों में समूह के कलाकार एक साथ तालमेल बनाकर लाठी संचालन करते हैं। इससे नृत्य का दृश्य और भी आकर्षक हो जाता है।
दिवारी नृत्य में वेशभूषा केवल सजावट का हिस्सा नहीं है। यह स्थानीय संस्कृति, सामुदायिक पहचान और पारंपरिक जीवनशैली को भी दर्शाती है। अलग-अलग गांवों में पहनावे और प्रस्तुति के तरीकों में थोड़ा अंतर देखने को मिल सकता है।
क्यों कहा जाता है इसे युद्धकला से जुड़ा लोकनृत्य?
दिवारी नृत्य को बुंदेलखंड की शौर्य परंपरा का प्रतीक माना जाता है। इसकी सबसे बड़ी वजह है इसमें लाठी का इस्तेमाल। लाठी भारतीय ग्रामीण जीवन में लंबे समय से आत्मरक्षा और सुरक्षा का पारंपरिक साधन रही है। पुराने समय में ग्रामीण क्षेत्रों में शारीरिक प्रशिक्षण और लाठी चलाने की कला का विशेष महत्व था।
दिवारी नृत्य में कलाकार लाठी से प्रहार करने के साथ-साथ उससे बचाव करने की तकनीक भी प्रदर्शित करते हैं। एक कलाकार सामने से लाठी चलाता है तो दूसरा अपनी फुर्ती और कौशल से उसका सामना करता है। दोनों के बीच यह गतिविधि किसी वास्तविक लड़ाई की तरह दिखाई देती है, लेकिन इसका उद्देश्य एक-दूसरे को नुकसान पहुंचाना नहीं, बल्कि नियंत्रित तरीके से कला का प्रदर्शन करना होता है।
इस नृत्य में हाथों और पैरों के बीच बेहतरीन तालमेल की जरूरत होती है। कलाकारों को अपनी दूरी, गति और सामने वाले की गतिविधियों का लगातार ध्यान रखना पड़ता है। यही कारण है कि इसे केवल नृत्य नहीं, बल्कि शारीरिक कौशल और पारंपरिक लाठी प्रशिक्षण का प्रदर्शन भी माना जाता है।
हालांकि दिवारी नृत्य को आधुनिक अर्थों में किसी मानकीकृत युद्धकला का विकल्प नहीं कहा जा सकता। यह एक लोकप्रदर्शन कला है, जिसमें युद्धकौशल से मिलती-जुलती गतिविधियां सांस्कृतिक और मनोरंजक स्वरूप में प्रस्तुत की जाती हैं।
दिवारी नृत्य में संगीत और लोकगीतों की क्या है भूमिका?
किसी भी लोकनृत्य की आत्मा उसका संगीत होता है। दिवारी नृत्य में भी ढोलक, नगाड़े और पारंपरिक वाद्ययंत्रों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। इनकी आवाज कलाकारों को लय प्रदान करती है और दर्शकों में उत्साह पैदा करती है।
इस नृत्य से जुड़े लोकगीतों को कई स्थानों पर दिवारी गीत कहा जाता है। इन गीतों में धार्मिक आस्था, भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं, वीरता, सामाजिक जीवन और उत्सव की भावनाएं देखने को मिलती हैं। गीतों की प्रस्तुति के बाद नर्तक अपनी कला का प्रदर्शन करते हैं। इसी कारण इस नृत्य का नाम दिवारी पड़ने की मान्यता भी प्रचलित है।
बुंदेली लोकगीतों की भाषा में क्षेत्रीय बोलियों की मिठास और ग्रामीण जीवन की सहजता दिखाई देती है। इन गीतों में स्थानीय संस्कृति, रिश्तों और सामाजिक अनुभवों का वर्णन मिलता है। मौखिक परंपरा के माध्यम से एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंचने वाले ये गीत लोकइतिहास के महत्वपूर्ण वाहक हैं।
ढोलक की थाप पर घुंघरुओं की झंकार और लाठियों की टकराहट जब एक साथ सुनाई देती है, तब दिवारी नृत्य का वास्तविक उत्साह सामने आता है। संगीत और शारीरिक गतिविधियों का यह मेल इसे अन्य सामान्य लोकनृत्यों से अलग पहचान देता है।
मौनिया परंपरा और दिवारी नृत्य का क्या है संबंध?
बुंदेलखंड के कुछ इलाकों में दीपावली के बाद मौनिया बनने की परंपरा भी देखने को मिलती है। यह परंपरा दिवारी नृत्य से सांस्कृतिक और धार्मिक रूप से जुड़ी हुई है, हालांकि दोनों को हर जगह एक ही परंपरा नहीं माना जाता।
मौनिया बनने वाले लोग विशेष धार्मिक नियमों का पालन करते हैं। कुछ गांवों में वे मौन धारण करके भगवान श्रीकृष्ण के प्रति अपनी आस्था व्यक्त करते हैं। पारंपरिक वेशभूषा धारण करने के बाद वे देवस्थानों पर पूजा-अर्चना करते हैं और फिर गांवों की परिक्रमा के लिए निकलते हैं।
मध्य प्रदेश के सागर जिले के कुछ क्षेत्रों में मौनिया परंपरा के अंतर्गत गांवों की सामूहिक परिक्रमा का भी उल्लेख मिलता है। कुछ स्थानों पर बारह गांवों की परिक्रमा करने की मान्यता प्रचलित है। इस दौरान धार्मिक अनुष्ठान और लोकनृत्य दोनों देखने को मिलते हैं।
मौनिया और दिवारी की परंपराएं यह दिखाती हैं कि बुंदेलखंड में दीपावली केवल एक धार्मिक त्योहार नहीं, बल्कि सामाजिक सहभागिता और सामुदायिक उत्सव का अवसर भी है। अलग-अलग गांवों में इनके नियम और स्वरूप स्थानीय मान्यताओं के अनुसार बदल सकते हैं।
दिवारी नृत्य और कृषि संस्कृति का गहरा संबंध
बुंदेलखंड का ग्रामीण जीवन खेती और पशुपालन से गहराई से जुड़ा रहा है। यहां के लोकगीतों, त्योहारों और नृत्य परंपराओं में कृषि संस्कृति की स्पष्ट झलक मिलती है। दिवारी नृत्य को भी केवल धार्मिक या वीरता से जुड़ी कला के रूप में देखना पर्याप्त नहीं होगा।
कुछ क्षेत्रों में इस नृत्य को फसल कटाई के बाद आभार व्यक्त करने और सामूहिक प्रसन्नता प्रकट करने की परंपरा से भी जोड़ा जाता है। किसानों के लिए फसल का सुरक्षित घर पहुंचना खुशियों का अवसर होता है। ऐसे में त्योहार, संगीत और सामूहिक नृत्य ग्रामीण समाज के उत्साह को अभिव्यक्त करने का माध्यम बनते हैं।
भगवान श्रीकृष्ण का जीवन भी पशुपालन और ग्रामीण परिवेश से जुड़ा हुआ है। गोवर्धन पूजा के माध्यम से प्रकृति, पशुधन और कृषि के महत्व को स्वीकार किया जाता है। दिवारी नृत्य में कृष्ण से जुड़ी लोकमान्यताओं और ग्रामीण जीवन के तत्वों का मेल इसी सांस्कृतिक संबंध को मजबूत करता है।
बुंदेलखंड की पहचान बन चुका है दिवारी नृत्य
बुंदेलखंड अपनी ऐतिहासिक धरोहर, वीरगाथाओं, लोकगीतों, हस्तशिल्प और पारंपरिक कलाओं के लिए जाना जाता है। दिवारी नृत्य इस सांस्कृतिक विविधता का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। यह क्षेत्र की सामूहिक स्मृति और लोकजीवन को मंच पर जीवंत करता है।
समय के साथ इस लोककला को क्षेत्रीय सीमाओं से बाहर भी पहचान मिली है। बांदा के कलाकारों ने राष्ट्रीय स्तर के आयोजनों में दिवारी नृत्य प्रस्तुत किया है। वर्ष 2005 में गणतंत्र दिवस की परेड में बांदा के कलाकारों द्वारा इस कला का प्रदर्शन किए जाने का उल्लेख मिलता है। इस तरह की प्रस्तुतियों ने बुंदेलखंड की पारंपरिक कला को व्यापक दर्शकों तक पहुंचाने में मदद की।
वर्ष 2020 में बांदा के बड़ोखर खुर्द में आयोजित एक कार्यक्रम का आभासी प्रसारण विदेशों में भी देखा गया था। अमेरिका, कनाडा और यूरोप के कई देशों में बैठे लोगों तक बुंदेलखंड की इस लोककला की प्रस्तुति पहुंची। इससे यह स्पष्ट हुआ कि स्थानीय परंपराओं को आधुनिक संचार माध्यमों के जरिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी प्रस्तुत किया जा सकता है।
आज सांस्कृतिक पर्यटन के बढ़ते महत्व के बीच दिवारी नृत्य बुंदेलखंड की विशिष्ट पहचान बन सकता है। यदि इसे स्थानीय मेलों, पर्यटन आयोजनों और सांस्कृतिक उत्सवों से जोड़ा जाए तो कलाकारों को रोजगार और सम्मान दोनों मिल सकते हैं।
आधुनिक दौर में किन चुनौतियों से जूझ रही है यह लोककला?
समय के साथ जीवनशैली में तेजी से बदलाव आया है। गांवों में पारंपरिक आयोजनों का स्वरूप बदल रहा है और नई पीढ़ी का रुझान आधुनिक मनोरंजन के साधनों की ओर बढ़ रहा है। इसका असर दिवारी नृत्य जैसी लोककलाओं पर भी दिखाई देता है।
इस कला को सीखने के लिए लंबे समय तक अभ्यास करना पड़ता है। लाठी संचालन, शरीर का संतुलन, समूह के साथ तालमेल और संगीत की समझ विकसित करने में मेहनत लगती है। लेकिन कलाकारों को नियमित प्रशिक्षण, आर्थिक सहायता और प्रदर्शन के पर्याप्त अवसर नहीं मिलते। ऐसे में कई प्रतिभाशाली युवा इस परंपरा से दूर हो सकते हैं।
कुछ स्थानों पर स्थानीय प्रशिक्षक बच्चों और युवाओं को दिवारी नृत्य सिखाने का प्रयास कर रहे हैं। बांदा के बड़ोखर खुर्द में कलाकारों द्वारा नियमित अभ्यास और प्रशिक्षण की पहल का उल्लेख मिलता रहा है। इस तरह के प्रयास इस लोककला को जीवित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
दिवारी नृत्य के संरक्षण के लिए केवल त्योहार के समय आयोजन करना पर्याप्त नहीं होगा। इसके लिए गांवों में प्रशिक्षण केंद्र, कलाकारों को आर्थिक सहयोग, विद्यालयों में लोककला से संबंधित कार्यक्रम और सांस्कृतिक संस्थाओं की भागीदारी आवश्यक है।
नई पीढ़ी को विरासत से जोड़ना क्यों जरूरी?
लोककलाएं किसी भी समाज की सांस्कृतिक पहचान होती हैं। इनके माध्यम से आने वाली पीढ़ियां अपने पूर्वजों की जीवनशैली, मान्यताओं और सामाजिक मूल्यों को समझती हैं। दिवारी नृत्य भी ऐसी ही विरासत है, जिसे केवल मनोरंजन के साधन के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
इस कला को सुरक्षित रखने के लिए सबसे पहले स्थानीय कलाकारों को प्रोत्साहित करना होगा। गांवों में बच्चों और युवाओं के लिए नियमित प्रशिक्षण की व्यवस्था की जा सकती है। विद्यालयों और महाविद्यालयों में सांस्कृतिक कार्यक्रमों के दौरान दिवारी नृत्य की प्रस्तुतियां आयोजित की जानी चाहिए। इससे नई पीढ़ी को अपनी क्षेत्रीय संस्कृति के बारे में जानने और उसे अपनाने का अवसर मिलेगा।
इसके अलावा, पर्यटन विभाग और सांस्कृतिक संस्थाएं दीपावली के अवसर पर विशेष दिवारी महोत्सव आयोजित कर सकती हैं। ऐसे आयोजनों में स्थानीय कलाकारों को उचित पारिश्रमिक और सम्मान मिलना चाहिए। डिजिटल माध्यमों पर इस नृत्य के इतिहास, प्रशिक्षण और प्रस्तुतियों का दस्तावेजीकरण भी जरूरी है, ताकि आने वाले समय में इसकी पारंपरिक शैली सुरक्षित रह सके।
दिवारी नृत्य केवल नृत्य नहीं, बुंदेलखंड की जीवंत विरासत
बुंदेलखंड का दिवारी नृत्य भारतीय लोकसंस्कृति की उस समृद्ध परंपरा का उदाहरण है, जिसमें धर्म, इतिहास, संगीत, शारीरिक कौशल और सामुदायिक जीवन एक साथ दिखाई देते हैं। भगवान श्रीकृष्ण और गोवर्धन पर्वत से जुड़ी लोकमान्यता इसे धार्मिक महत्व प्रदान करती है, वहीं लाठी संचालन और साहसिक करतब इसे विशेष पहचान देते हैं।
दीपावली के अवसर पर जब गांवों में ढोल-नगाड़े बजते हैं, कलाकार पारंपरिक वेशभूषा में सजते हैं और लाठियों की टकराहट के बीच नृत्य शुरू होता है, तब बुंदेलखंड की सदियों पुरानी सांस्कृतिक चेतना जीवंत हो उठती है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि इस अनूठी कला को केवल त्योहारों तक सीमित न रखा जाए। इसे राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सांस्कृतिक मंचों पर अधिक अवसर दिए जाएं। क्योंकि दिवारी नृत्य केवल बुंदेलखंड की पहचान नहीं, बल्कि भारत की विविधतापूर्ण लोकपरंपराओं का भी अनमोल हिस्सा है। इसकी हर थाप, हर कदम और लाठी की हर चटकार में एक ऐसे समाज की कहानी छिपी है, जिसने अपनी संस्कृति और परंपराओं को पीढ़ी दर पीढ़ी जीवित रखा है।






