
संवाद 24 श्रीहरिकोटा। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने शुक्रवार देर रात अंतरिक्ष के क्षेत्र में एक नया इतिहास रच दिया है। देश की स्वदेशी नेविगेशन प्रणाली ‘नाविक’ (NavIC) को आत्मनिर्भर और अत्यधिक सटीक बनाने के उद्देश्य से अगली पीढ़ी के उपग्रह ‘एनवीएस-03’ (NVS-03) को सफलतापूर्वक भू-समकालिक स्थानांतरण कक्षा (GTO) में स्थापित कर दिया गया है। इस ऐतिहासिक प्रक्षेपण के साथ ही भारत ने विदेशी जीपीएस (GPS) पर निर्भरता खत्म करने की दिशा में एक बहुत बड़ा और निर्णायक कदम उठा लिया है। आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र के दूसरे लॉन्च पैड से शुक्रवार रात 11 बजकर 51 मिनट पर 50 मीटर ऊंचे जीएसएलवी-एफ18 (GSLV-F18) रॉकेट ने गर्जना के साथ अंतरिक्ष की ओर उड़ान भरी। तीन चरणीय इस रॉकेट ने करीब 2,232 किलोग्राम वजनी एनवीएस-03 उपग्रह को सटीक तरीके से उसकी निर्धारित कक्षा में पहुंचा दिया। इसरो वैज्ञानिकों के अथक परिश्रम से मिली इस कामयाबी के बाद मिशन कंट्रोल रूम तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा।
स्मार्टफोन से लेकर सेना तक: आम नागरिकों के हाथों में होगा स्वदेशी नेविगेशन
अब तक भारत का नाविक सिस्टम मुख्य रूप से सामरिक, सैन्य और विशिष्ट तकनीकी आवश्यकताओं के लिए अधिक पहचाना जाता था। लेकिन एनवीएस-03 की लॉन्चिंग ने इस दायरे को पूरी तरह बदल दिया है। इस उपग्रह की सबसे बड़ी विशेषता इसमें जोड़ा गया नया L1 सिग्नल बैंड है। वर्तमान में दुनिया भर के अधिकांश स्मार्टफोन, स्मार्टवॉच और आधुनिक वियरेबल गैजेट्स L1 फ्रीक्वेंसी पर काम करते हैं। अब तक नाविक मुख्य रूप से L5 और S बैंड पर संचालित हो रहा था। L1 सिग्नल के जुड़ने से अब आम लोग भी अपने मोबाइल फोन पर गूगल मैप्स की तरह बिना किसी रुकावट के सीधे भारतीय नेविगेशन प्रणाली का उपयोग कर सकेंगे। सड़क परिवहन, आपदा प्रबंधन, समुद्री नौवहन और विमानन सेवाओं के लिए यह तकनीक अत्यंत उपयोगी साबित होगी।
भारत में बनी स्वदेशी एटॉमिक क्लॉक का कमाल
एनवीएस-03 उपग्रह की सबसे क्रांतिकारी खासियत इसका दिल कही जाने वाली ‘स्वदेशी रुबिडियम एटॉमिक क्लॉक’ (परमाणु घड़ी) है। इसे इसरो के अंतरिक्ष अनुप्रयोग केंद्र (SAC) द्वारा देश में ही विकसित किया गया है। नेविगेशन उपग्रहों के संचालन में समय की नैनो-सेकंड तक की शुद्धता अनिवार्य होती है, क्योंकि उपग्रहों से प्राप्त सिग्नल के समय के अंतर के आधार पर ही किसी स्थान की सटीक स्थिति का पता लगाया जाता है। पहले इन घड़ियों के लिए विदेशी तकनीक पर निर्भर रहना पड़ता था, लेकिन इस स्वदेशी घड़ी के सफल समावेश ने भारत को उपग्रह निर्माण के मामले में पूर्ण संप्रभुता और तकनीकी स्वावलंबन प्रदान किया है।
सीमाओं से 1500 किमी दूर तक अचूक नजर
नाविक प्रणाली को इस तरह से तैयार किया गया है कि यह पूरे भारतीय भूभाग को कवर करने के साथ-साथ देश की अंतरराष्ट्रीय सीमाओं से लगभग 1,500 किलोमीटर बाहर तक सटीक लोकेशन, नेविगेशन और टाइमिंग (PNT) सेवाएं प्रदान करता है। यह रणनीतिक दृष्टि से भारतीय सशस्त्र बलों के लिए वरदान साबित होगा। युद्ध या भू-राजनीतिक तनाव के दौरान विदेशी ताकतें अक्सर जीपीएस सिग्नल को बाधित या ब्लॉक कर देती हैं। अब नाविक के और अधिक सुदृढ़ होने से भारत की सामरिक स्वायत्तता को नई मजबूती मिलेगी और देश को अपने ऑपरेशन, मिसाइल टारगेटिंग और निगरानी के लिए किसी अन्य देश के सिग्नल पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा।
‘नॉटी ब्वॉय’ से ‘स्मार्ट ब्वॉय’ तक का सफर
यह जीएसएलवी (GSLV) रॉकेट की 20वीं ऐतिहासिक उड़ान थी। शुरुआती वर्षों में अपने क्रायोजेनिक तीसरे चरण की तकनीकी जटिलताओं के कारण कई चुनौतियों का सामना करने वाले इस रॉकेट को कभी ‘नॉटी ब्वॉय’ कहा जाता था। हालांकि, भारतीय वैज्ञानिकों ने लगातार परीक्षण, तकनीकी सुधार और अनुभव के बल पर इसे बेहद भरोसेमंद बनाया है। इसरो ने जनवरी 2025 में एनवीएस-02 मिशन के दौरान कनेक्टर की समस्या से मिले अनुभवों को ध्यान में रखते हुए एनवीएस-03 के प्रणोदन सिस्टम में विशेष इंजीनियरिंग सुधार किए, जिसके चलते यह प्रक्षेपण सौ प्रतिशत सटीक रहा। भारत का यह कदम अंतरिक्ष विज्ञान के इतिहास में केवल एक उपग्रह की कक्षा स्थापना भर नहीं है, बल्कि यह आत्मनिर्भर भारत के विजन का वह जीवंत प्रमाण है जो यह बताता है कि आने वाले समय में दुनिया भारत की तकनीक से अपनी राह तय करेगी।






