लाल सागर में बारूदी हलचल: यमन के भूमिगत बंकरों से मिसाइलों का नया खतरा

संवाद 24 नई दिल्ली। मध्य पूर्व में सुलग रहा तनाव अब एक नए और बेहद संवेदनशील मोड़ पर पहुंच चुका है। यमन में सक्रिय विद्रोही संगठन हूती द्वारा अपनी मिसाइल निर्माण क्षमता को अचानक कई गुना बढ़ा लेने की खबरों ने वैश्विक सुरक्षा तंत्र में हलचल मचा दी है। सामरिक हलकों और खुफिया एजेंसियों से छनकर आ रही जानकारियों के मुताबिक, हूती विद्रोही अब केवल बाहर से आने वाली तैयार मिसाइलों पर आश्रित नहीं हैं, बल्कि वे अपने स्थानीय ठिकानों पर ही लंबी दूरी और सटीक मारक क्षमता वाली मिसाइलों की असेंबलिंग कर रहे हैं। इन रिपोर्ट्स में यह गंभीर दावा भी किया गया है कि इस घातक मिसाइल नेटवर्क को खड़ा करने में चीन से आ रही उन्नत तकनीक और दोहरे उपयोग वाले उपकरण (ड्यूल-यूज पार्ट्स) परोक्ष भूमिका निभा रहे हैं।

आयात से घरेलू असेंबलिंग तक का सफर
अब तक के सुरक्षा आकलन बताते थे कि हूती लड़ाकों को मिसाइलें और घातक ड्रोन मुख्य रूप से ईरान की मदद से तस्करी के जरिए मिलते रहे हैं। हालांकि, लाल सागर और बाब अल-मंदेब जलमार्ग पर अंतरराष्ट्रीय नौसेना की सख्त गश्त और घेराबंदी के बाद विद्रोहियों ने अपनी रणनीति बदल ली है।
पूरी मिसाइलें आयात करने के बजाय अब उन्नत जीपीएस नेविगेशन चिप्स, जाइरोस्कोप, रॉकेट प्रोपल्शन सामग्री और मिसाइल गाइडेंस सिस्टम के छोटे-छोटे पुर्जे अलग-अलग रास्तों से यमन पहुंचाए जा रहे हैं। यमन के दुर्गम पहाड़ी इलाकों और मजबूत बंकरों में इन कलपुर्जों की मदद से मिसाइलें तैयार की जा रही हैं, जिससे विदेशी नाकेबंदी का असर इन पर काफी हद तक कम हो गया है।

दोहरे उपयोग वाले कलपुर्जों की भूमिका
विदेशी रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार, यमन में तैयार हो रही मिसाइलों में जिन सटीक इलेक्ट्रॉनिक कंपोनेंट्स का इस्तेमाल हो रहा है, उनमें से कई खेप चीनी कंपनियों और तीसरे पक्ष के व्यापारिक नेटवर्क के जरिए पहुंची हैं। अंतरराष्ट्रीय नियमों के तहत ‘ड्यूल-यूज’ यानी ऐसे उपकरण जो नागरिक और सैन्य दोनों कार्यों में काम आते हैं, उन्हें सामान्य व्यापार की आड़ में आसानी से डायवर्ट कर दिया जाता है। हालांकि बीजिंग किसी भी तरह की सीधी सैन्य सहायता देने से हमेशा इनकार करता रहा है, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि इन उन्नत इलेक्ट्रॉनिक पुर्जों के बिना हूती मिसाइलों की मारक क्षमता और सटीक निशानेबाजी इस स्तर तक नहीं पहुंच सकती थी।

इजरायल और सऊदी अरब के सामने नई चुनौतियां
यमन की जमीन पर मिसाइलों के इस अनियंत्रित उत्पादन ने क्षेत्र के दो प्रमुख देशों की सुरक्षा चिंताओं को गहरा कर दिया है:
इजरायल की सुरक्षा पर दबाव: लाल सागर के रास्ते इजरायल के दक्षिणी बंदरगाहों और रणनीतिक ठिकानों पर लगातार ड्रोन और मिसाइल हमले किए जा रहे हैं। यदि इन मिसाइलों की मारक दूरी और स्टीयरिंग क्षमता बढ़ती है, तो इजरायल के आधुनिक एयर डिफेंस सिस्टम (एरो और आयरन डोम) पर दबाव बहुत अधिक बढ़ जाएगा।
सऊदी अरब के ऊर्जा संयंत्र: सऊदी अरब पहले भी अपने तेल शोधन संयंत्रों और हवाई अड्डों पर हूती हमलों का शिकार हो चुका है। हालांकि हाल के दिनों में रियाद ने कूटनीतिक रास्ते चुने हैं, लेकिन पड़ोस में बढ़ते मिसाइल जखीरे से उसकी रिफाइनरियों और बुनियादी ढांचे के लिए खतरा लगातार बना हुआ है।
समुद्री जहाजरानी संकट: लाल सागर से गुजरने वाले अंतरराष्ट्रीय मालवाहक जहाजों पर हमले जारी रहने से पहले ही वैश्विक लॉजिस्टिक्स लागत बढ़ चुकी है। मिसाइलों की नई खेप इस समुद्री मार्ग को दुनिया के लिए और अधिक असुरक्षित बना सकती है।

वैश्विक समीकरण और कूटनीतिक उलझनें
यदि यमन के मिसाइल कारखानों में चीनी तकनीक और पुर्जों के इस्तेमाल के तथ्य पुख्ता होते हैं, तो यह वैश्विक मंच पर चीन की मध्यस्थता की छवि को नुकसान पहुंचा सकता है। एक तरफ जहां बीजिंग मध्य पूर्व में शांतिदूत बनने की कोशिश कर रहा है, वहीं दूसरी तरफ उसके कलपुर्जों का विद्रोहियों के हाथ लगना अमेरिका और पश्चिमी देशों के साथ तनाव को और भड़का सकता है। सैन्य विश्लेषकों का मानना है कि यदि यमन में तेजी से फैल रहे इस मिसाइल नेटवर्क की सप्लाई चेन को समय रहते ध्वस्त नहीं किया गया, तो आने वाले दिनों में यह संकट केवल एक क्षेत्रीय टकराव नहीं रहेगा, बल्कि यह पूरी दुनिया के आर्थिक और ऊर्जा सुरक्षा ढांचे को भारी नुकसान पहुंचा सकता है।

Madhvi Singh
Madhvi Singh

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