
संवाद 24 डेस्क। शारदीय नवरात्रि का पर्व देवी दुर्गा के नौ स्वरूपों की उपासना का विशेष अवसर माना जाता है। नवरात्रि के चौथे दिन मां दुर्गा के चतुर्थ स्वरूप मां कूष्मांडा की पूजा-अर्चना की जाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मां कूष्मांडा को सृष्टि की रचनाकार और समस्त ब्रह्मांड में ऊर्जा तथा प्रकाश का संचार करने वाली आदिशक्ति के रूप में पूजा जाता है। मान्यता है कि जब चारों ओर अंधकार था और सृष्टि का अस्तित्व प्रकट नहीं हुआ था, तब देवी ने अपनी मंद मुस्कान से ब्रह्मांड की रचना की। इसी कारण उनका स्वरूप सृजन, ऊर्जा, आशा और सकारात्मकता का प्रतीक माना जाता है। वर्ष 2026 में शारदीय नवरात्रि का चौथा दिन 14 अक्टूबर, बुधवार को मनाया जा रहा है। इस अवसर पर श्रद्धालु मां कूष्मांडा की पूजा करके सुख-समृद्धि, उत्तम स्वास्थ्य, परिवार की खुशहाली और जीवन में उन्नति की कामना करते हैं। धार्मिक परंपराओं में देवी की आराधना को आत्मविश्वास, साहस और आध्यात्मिक शक्ति से भी जोड़ा जाता है।
मां कूष्मांडा कौन हैं और क्या है उनके नाम का अर्थ?
मां कूष्मांडा को नवदुर्गा के चौथे स्वरूप के रूप में जाना जाता है। धार्मिक मान्यताओं में उन्हें ब्रह्मांड की सृजनकर्ता शक्ति माना गया है। उनके नाम को लेकर प्रचलित व्याख्या के अनुसार, कूष्मांडा शब्द का संबंध ब्रह्मांड और सृष्टि की उत्पत्ति से जोड़ा जाता है। मान्यता है कि देवी की मुस्कान से ब्रह्मांड में प्रकाश उत्पन्न हुआ और सृष्टि के विकास का मार्ग प्रशस्त हुआ। मां कूष्मांडा का स्वरूप भक्तों को यह संदेश देता है कि अंधकार के बीच भी नई शुरुआत की संभावना बनी रहती है। जिस प्रकार प्रकाश अंधकार को दूर करता है, उसी प्रकार आस्था, विवेक और सकारात्मक सोच व्यक्ति को कठिन परिस्थितियों का सामना करने की शक्ति प्रदान कर सकते हैं। यही कारण है कि नवरात्रि के इस दिन देवी की पूजा को विशेष महत्व दिया जाता है।
अष्टभुजा स्वरूप में विराजती हैं मां कूष्मांडा
धार्मिक चित्रण में मां कूष्मांडा को अष्टभुजा देवी कहा जाता है, क्योंकि उनकी आठ भुजाएं हैं। उनके हाथों में कमंडल, धनुष, बाण, कमल, अमृत कलश, चक्र, गदा और जपमाला धारण किए हुए दिखाया जाता है। इन प्रतीकों को आध्यात्मिक शक्ति, साहस, ज्ञान, साधना और जीवन की रक्षा से जोड़कर देखा जाता है। देवी का वाहन सिंह माना जाता है, जो शक्ति, पराक्रम और निर्भयता का प्रतीक है। उनका तेज सूर्य के समान प्रकाशमान बताया गया है। कुछ धार्मिक मान्यताओं में उनका निवास सूर्य मंडल में माना जाता है। इस स्वरूप के माध्यम से देवी की उस ऊर्जा का स्मरण किया जाता है, जो समस्त जीव-जगत के जीवन और विकास के लिए आवश्यक है।
मां कूष्मांडा की पूजा विधि क्या है?
नवरात्रि के चौथे दिन मां कूष्मांडा की पूजा घर पर भी श्रद्धापूर्वक की जा सकती है। पूजा के लिए प्रातःकाल स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें। इसके बाद पूजा स्थल की सफाई करें और मां दुर्गा के कूष्मांडा स्वरूप की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें। पूजा आरंभ करने से पहले मन को शांत करके देवी का ध्यान करें। इसके बाद दीपक जलाएं और मां को जल, रोली, अक्षत, पुष्प तथा पुष्पमाला अर्पित करें। श्रद्धानुसार धूप दिखाएं और देवी के समक्ष फल, मिठाई अथवा घर में बनाया गया सात्विक प्रसाद रखें। पूजा के दौरान मां कूष्मांडा के मंत्र का जाप करें। इसके बाद देवी की आरती करें और परिवार की सुख-शांति, स्वास्थ्य तथा कल्याण के लिए प्रार्थना करें। पूजा में सबसे महत्वपूर्ण भाव श्रद्धा और भक्ति का माना जाता है। सभी सामग्री उपलब्ध न होने पर भी भक्त अपनी सामर्थ्य के अनुसार सरल विधि से पूजा कर सकते हैं। अलग-अलग क्षेत्रों और परिवारों में पूजा की परंपराओं में कुछ अंतर हो सकता है।
मां कूष्मांडा का मंत्र, जाप से जुड़ी मान्यता
नवरात्रि के चौथे दिन मां कूष्मांडा की उपासना के दौरान इस सरल मंत्र का जाप किया जा सकता है।
“मंत्र: ॐ देवी कूष्माण्डायै नमः।
इस मंत्र का अर्थ है कि मां कूष्मांडा को नमन है। भक्त अपनी श्रद्धा के अनुसार मंत्र का 11, 21 या 108 बार जाप कर सकते हैं। मंत्र जाप करते समय मन को शांत रखने और देवी के स्वरूप का ध्यान करने की परंपरा है।
मां कूष्मांडा के ध्यान और उपासना का उद्देश्य केवल धार्मिक अनुष्ठान करना ही नहीं, बल्कि अपने भीतर धैर्य, साहस और सकारात्मक विचारों को विकसित करना भी माना जाता है। मंत्र जाप की संख्या को लेकर अलग-अलग परंपराएं प्रचलित हैं, इसलिए श्रद्धालु अपनी सुविधा और पारिवारिक रीति के अनुसार इसका पालन कर सकते हैं।
मां कूष्मांडा की व्रत कथा क्या है?
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, सृष्टि की उत्पत्ति से पहले चारों ओर अंधकार व्याप्त था। उस समय न सूर्य था, न चंद्रमा और न ही जीवन के परिचित स्वरूप का अस्तित्व था। ऐसी मान्यता है कि आदिशक्ति ने अपनी मंद मुस्कान से ब्रह्मांड की रचना की। उनकी दिव्य ऊर्जा से सृष्टि में प्रकाश का संचार हुआ और जीवन के विकास की प्रक्रिया आरंभ हुई।
इसी सृजनकारी शक्ति के कारण देवी को मां कूष्मांडा के नाम से जाना जाता है। उन्हें आदिशक्ति का वह स्वरूप माना जाता है, जो अंधकार से प्रकाश, निराशा से आशा और निष्क्रियता से सृजन की ओर ले जाता है। यह कथा धार्मिक आस्था के साथ-साथ जीवन में सकारात्मकता और नई शुरुआत के महत्व को भी रेखांकित करती है।
नवरात्रि के चौथे दिन इस कथा का स्मरण करते हुए श्रद्धालु देवी से प्रार्थना करते हैं कि उनके जीवन से नकारात्मकता दूर हो और परिवार में सुख, शांति तथा समृद्धि बनी रहे। यह कथा विभिन्न धार्मिक परंपराओं में प्रचलित मान्यताओं पर आधारित है।
मां कूष्मांडा को कौन-सा भोग लगाना चाहिए?
मां कूष्मांडा की पूजा में भोग अर्पित करने की विशेष परंपरा है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, देवी को कुम्हड़ा यानी कद्दू अर्पित करना शुभ माना जाता है। इसके अतिरिक्त मालपुआ, केसरिया हलवा, पीले रंग की मिठाइयां, बताशे, फल और नारियल भी भोग के रूप में चढ़ाए जा सकते हैं। कुछ परंपराओं में दही और विभिन्न प्रकार के हलवे का प्रसाद अर्पित करने की मान्यता है। व्रत रखने वाले श्रद्धालु अपनी पारिवारिक परंपरा के अनुसार सिंघाड़े के आटे का हलवा अथवा अन्य व्रत के अनुकूल खाद्य पदार्थ तैयार कर सकते हैं। भोग बनाते समय स्वच्छता और सात्विकता का ध्यान रखना चाहिए। पूजा के बाद प्रसाद परिवार के सदस्यों और अन्य श्रद्धालुओं में बांटा जा सकता है। यह ध्यान रखना आवश्यक है कि देवी को अर्पित किए जाने वाले भोग की सामग्री अलग-अलग क्षेत्रों में प्रचलित परंपराओं के अनुसार बदल सकती है। इसलिए किसी एक खाद्य पदार्थ को अनिवार्य मानने के बजाय श्रद्धा और अपनी परंपरा के अनुसार भोग अर्पित करना उचित है।
मां कूष्मांडा की आरती और पूजा का आध्यात्मिक संदेश
पूजा के अंत में मां कूष्मांडा की आरती की जाती है। आरती के दौरान भक्त देवी के तेज, शक्ति और करुणा का स्मरण करते हैं। आरती के बाद हाथ जोड़कर परिवार की सुख-शांति, स्वास्थ्य और समृद्धि की प्रार्थना की जाती है। श्रद्धालु अपनी मान्यता के अनुसार नवदुर्गा के स्तुति पाठ, दुर्गा चालीसा अथवा अन्य प्रार्थनाओं का पाठ भी कर सकते हैं।
मां कूष्मांडा की उपासना का आध्यात्मिक संदेश सृजन और सकारात्मकता से जुड़ा है। उनकी कथा बताती है कि अंधकार के बाद प्रकाश और कठिन परिस्थितियों के बीच नई शुरुआत की संभावना बनी रहती है। जीवन में निराशा आने पर धैर्य बनाए रखना, अपने कर्तव्यों का पालन करना और आशावादी दृष्टिकोण अपनाना इस संदेश को व्यवहार में उतारने के तरीके हो सकते हैं।
नवरात्रि के चौथे दिन किन बातों का रखें ध्यान?
नवरात्रि में पूजा और व्रत के नियमों का पालन श्रद्धा तथा अपनी क्षमता के अनुसार करना चाहिए। पूजा स्थल को स्वच्छ रखें और अनुष्ठान के दौरान मन को शांत रखने का प्रयास करें। यदि व्रत रख रहे हैं, तो अपने स्वास्थ्य और पारिवारिक परंपरा के अनुकूल भोजन करें। निर्जल उपवास अथवा कठिन नियमों को सभी के लिए आवश्यक नहीं माना जाना चाहिए। पूजा के लिए महंगी सामग्री जुटाना जरूरी नहीं है। पुष्प, दीपक, जल और अपनी सामर्थ्य के अनुसार सात्विक भोग से भी पूजा की जा सकती है। धार्मिक अनुष्ठान का मूल भाव श्रद्धा, संयम, सेवा और सद्भावना है। शारदीय नवरात्रि के चौथे दिन मां कूष्मांडा की आराधना श्रद्धालुओं को सृजन, ऊर्जा और आशा का संदेश देती है। देवी के इस स्वरूप का स्मरण करते हुए भक्त अपने जीवन में सकारात्मकता, साहस और विवेक को अपनाने का संकल्प ले सकते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मां की कृपा से सुख-समृद्धि और कल्याण की प्राप्ति होती है। यही विश्वास नवरात्रि के इस पावन पर्व को भक्तों के लिए विशेष बनाता है।






