
संवाद 24 डेस्क। राजस्थान का बाड़मेर इलाका अपनी तपती गर्मी, दूर तक फैले रेगिस्तान और कठिन भौगोलिक परिस्थितियों के लिए जाना जाता है। लेकिन इसी रेगिस्तानी धरती के नीचे भारत की ऊर्जा सुरक्षा से जुड़ा एक ऐसा खजाना मौजूद है, जिसने पिछले दो दशकों में देश के घरेलू कच्चे तेल उत्पादन की तस्वीर बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। अब इसी क्षेत्र में वेदांता ऑयल एंड गैस ने तेल उत्पादन को बनाए रखने और मौजूदा भंडार से अधिक तेल निकालने के लिए लगभग दो हजार करोड़ रुपये के नए निवेश की योजना बनाई है। कंपनी वित्त वर्ष 2026-27 में राजस्थान के उत्तरी हिस्से में लगभग 20 करोड़ डॉलर यानी करीब दो हजार करोड़ रुपये निवेश करने की योजना पर काम कर रही है। इस निवेश का प्रमुख केंद्र मंगला, भाग्यम और ऐश्वर्या तेल क्षेत्र होंगे। कंपनी का उद्देश्य केवल नए कुएं खोदना नहीं, बल्कि पहले से उत्पादन कर रहे और प्राकृतिक रूप से घटते उत्पादन वाले तेल भंडारों में आधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल करके अधिकतम संभव तेल निकालना है। यह खबर इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि मंगला, भाग्यम और ऐश्वर्या को राजस्थान के सबसे महत्वपूर्ण तेल क्षेत्रों में गिना जाता है। इन तीनों क्षेत्रों को सामूहिक रूप से ‘एमबीए’ क्षेत्र कहा जाता है और कंपनी के अनुसार इनमें लगभग 570 मिलियन बैरल तेल समकक्ष संसाधन की संभावनाएं हैं। ऐसे समय में जब भारत अपनी कच्चे तेल की आयात निर्भरता कम करने के लिए घरेलू उत्पादन बढ़ाने की कोशिश कर रहा है, राजस्थान के पुराने तेल क्षेत्रों से उत्पादन बढ़ाने की यह रणनीति ऊर्जा क्षेत्र के लिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
मंगला से शुरू हुई थी राजस्थान की तेल कहानी
राजस्थान में बड़े पैमाने पर तेल मिलने की कहानी वर्ष 2004 में मंगला क्षेत्र की खोज के साथ एक नए दौर में पहुंची। बाड़मेर जिले के राजस्थान ब्लॉक में मंगला की खोज उस समय देश की सबसे बड़ी तटवर्ती तेल खोजों में से एक मानी गई थी। खोज के करीब पांच वर्ष बाद वर्ष 2009 में यहां से व्यावसायिक स्तर पर तेल उत्पादन शुरू हुआ। इसके बाद भाग्यम और ऐश्वर्या जैसे क्षेत्रों की खोज ने राजस्थान को भारत के महत्वपूर्ण तेल उत्पादक क्षेत्रों में स्थापित करने में मदद की। राजस्थान ब्लॉक लगभग 3,111 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला है। यहां मंगला, भाग्यम और ऐश्वर्या के अलावा सरस्वती और रागेश्वरी जैसे अन्य महत्वपूर्ण क्षेत्र भी हैं। कंपनी के अनुसार राजस्थान ब्लॉक से अब तक बड़ी मात्रा में तेल का उत्पादन हो चुका है और यहां अभी भी आगे विकास की संभावनाएं मौजूद हैं। मंगला की सबसे बड़ी विशेषताओं में से एक यह रही है कि यहां तेल निकालने के पारंपरिक तरीकों के साथ-साथ तेल की अतिरिक्त रिकवरी के लिए उन्नत तकनीकों को बड़े पैमाने पर अपनाया गया। इससे यह क्षेत्र केवल भारत के लिए ही नहीं, बल्कि तेल क्षेत्र में आधुनिक उत्पादन तकनीकों के इस्तेमाल का एक महत्वपूर्ण उदाहरण बन गया है।
अब पुराने कुओं से ज्यादा तेल निकालने पर जोर
तेल क्षेत्र में किसी कुएं से शुरुआत में निकलने वाला तेल समय के साथ कम होने लगता है। इसका कारण यह है कि भूमिगत भंडार में दबाव घटता जाता है और आसानी से निकलने वाला तेल धीरे-धीरे कम हो जाता है। ऐसी स्थिति में किसी क्षेत्र को बंद करने के बजाय कंपनियां ऐसी तकनीकों का इस्तेमाल करती हैं, जिनसे भूमिगत चट्टानों में मौजूद अतिरिक्त तेल को सतह तक लाया जा सके। वेदांता की वर्तमान योजना इसी दिशा में है। कंपनी के अनुसार मंगला क्षेत्र में लक्षित कुआं सुधार, पुराने कुओं में आवश्यक हस्तक्षेप, नए रास्ते से कुएं तक पहुंच बनाने और भूमिगत भंडार की बेहतर निगरानी जैसी तकनीकों के माध्यम से तेल की रिकवरी बढ़ाने पर ध्यान दिया जाएगा। कंपनी ने मंगला में तेल की अंतिम रिकवरी को लगभग 30 प्रतिशत से बढ़ाकर 60 प्रतिशत तक ले जाने का लक्ष्य भी बताया है। इसका अर्थ यह नहीं है कि जमीन के नीचे मौजूद कुल तेल का 60 प्रतिशत तुरंत निकाला जाएगा। तेल उद्योग में ‘रिकवरी दर’ का अर्थ उस तेल की मात्रा से है जिसे उपलब्ध तकनीक और आर्थिक परिस्थितियों में भूमिगत भंडार से निकाला जा सकता है। इसलिए किसी क्षेत्र में रिकवरी दर बढ़ना इस बात का संकेत होता है कि पहले से मौजूद संसाधन का अधिक प्रभावी उपयोग किया जा रहा है।
क्या है बहु-चरणीय रासायनिक तकनीक, जिस पर टिकी है बड़ी उम्मीद?
वेदांता राजस्थान में तेल की अतिरिक्त रिकवरी के लिए बहु-चरणीय रासायनिक मिश्रण आधारित तकनीक का इस्तेमाल कर रही है, जिसे तेल उद्योग में एएसपी यानी क्षारीय-पृष्ठसक्रियक-पॉलिमर तकनीक कहा जाता है। इसका उद्देश्य भूमिगत चट्टानों में फंसे तेल को अधिक प्रभावी तरीके से कुओं की तरफ धकेलना है। इस तकनीक में पानी के साथ विशेष रासायनिक पदार्थों का इस्तेमाल किया जाता है। पॉलिमर पानी की प्रवाह क्षमता और तेल को विस्थापित करने की क्षमता को बेहतर बनाता है, जबकि क्षारीय और पृष्ठसक्रियक पदार्थ तेल तथा चट्टान के बीच के व्यवहार को बदलने में मदद कर सकते हैं। सरल शब्दों में कहा जाए तो जहां सामान्य पानी के दबाव से कुछ तेल चट्टानों के भीतर फंसा रह जाता है, वहां विशेष रासायनिक मिश्रण उसे उत्पादन कुएं की दिशा में आगे बढ़ाने में मदद कर सकता है।
वेदांता के अनुसार मंगला में बहुलक आधारित तेल रिकवरी की पूरी क्षेत्रीय परियोजना वर्ष 2015 में शुरू हुई थी। इसके बाद इसी तरह की तकनीक भाग्यम और ऐश्वर्या क्षेत्रों तक भी विस्तारित की गई। कंपनी का कहना है कि बहुलक आधारित प्रक्रिया से इन क्षेत्रों में तेल उत्पादन बढ़ाने और पानी की मात्रा कम करने में मदद मिली है।
मंगला के बाद भाग्यम और ऐश्वर्या पर भी बड़ा दांव
मंगला की सफलता ने राजस्थान ब्लॉक के दूसरे क्षेत्रों में भी उन्नत तेल रिकवरी तकनीकों के इस्तेमाल का रास्ता खोला। भाग्यम और ऐश्वर्या में भी बहुलक आधारित तकनीक का बड़े स्तर पर इस्तेमाल किया गया है।
कंपनी के तकनीकी दस्तावेजों के अनुसार भाग्यम में क्षेत्रीय स्तर पर बहुलक इंजेक्शन का विस्तार वर्ष 2020 के आसपास शुरू हुआ था। इसके लिए नए कुओं की खुदाई, कुछ पुराने उत्पादन कुओं को इंजेक्शन कुओं में बदलना और सतह पर आवश्यक ढांचा तैयार करना जैसे काम किए गए। कंपनी के अनुसार बहुलक इंजेक्शन के बाद भाग्यम में उत्पादन में शुरुआती सुधार देखा गया था। ऐश्वर्या क्षेत्र में भी बहुलक आधारित तेल रिकवरी को चरणबद्ध तरीके से आगे बढ़ाया गया। यहां पहले सीमित स्तर पर परीक्षण किया गया और इसके बाद तकनीक का विस्तार किया गया। कंपनी ने ऐश्वर्या क्षेत्र में ऊपरी फतेहगढ़ और निचली फतेहगढ़ परतों में अतिरिक्त उत्पादन की संभावनाओं की पहचान की है। वित्त वर्ष 2024-25 के अंत तक कंपनी ने ऐश्वर्या की ऊपरी फतेहगढ़ परियोजना में बड़ी संख्या में कुओं को उत्पादन से जोड़ने की जानकारी दी थी। इससे साफ है कि दो हजार करोड़ रुपये का मौजूदा निवेश किसी एक कुएं या एक परियोजना तक सीमित नहीं है। यह एक व्यापक उत्पादन-सुधार कार्यक्रम का हिस्सा है, जिसमें मौजूदा क्षेत्रों की उत्पादकता बढ़ाने, अतिरिक्त कुएं विकसित करने और भूमिगत संसाधनों की बेहतर पहचान करने पर जोर है।
प्राकृतिक गिरावट बनी सबसे बड़ी चुनौती
राजस्थान के तेल क्षेत्रों की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि ये अब नए-नए खोजे गए क्षेत्र नहीं हैं। मंगला से व्यावसायिक उत्पादन शुरू हुए करीब 17 वर्ष हो चुके हैं। किसी भी परिपक्व तेल क्षेत्र में समय के साथ उत्पादन में प्राकृतिक गिरावट आती है। यही वजह है कि कंपनियों के सामने दो रास्ते होते हैं—या तो उत्पादन में गिरावट को स्वीकार किया जाए या नई तकनीक और अतिरिक्त निवेश के जरिए क्षेत्र की उत्पादकता को बनाए रखने की कोशिश की जाए।
वेदांता ने दूसरे रास्ते को चुना है। कंपनी के वित्तीय और परिचालन आंकड़ों के अनुसार वित्त वर्ष 2024-25 में राजस्थान ब्लॉक का औसत सकल संचालित उत्पादन 84,276 बैरल तेल समकक्ष प्रतिदिन रहा, जो पिछले वर्ष की तुलना में 21 प्रतिशत कम था। कंपनी ने इस गिरावट के प्रमुख कारणों में प्राकृतिक भंडार गिरावट को बताया था। हालांकि नए कुओं और कुओं में हस्तक्षेप जैसी गतिविधियों से इस गिरावट के प्रभाव को कुछ हद तक कम किया गया।
यही पृष्ठभूमि वर्तमान दो हजार करोड़ रुपये के निवेश को समझने के लिए सबसे महत्वपूर्ण है। यह केवल उत्पादन बढ़ाने की कोशिश नहीं है, बल्कि प्राकृतिक गिरावट की गति को रोकने और पुराने तेल क्षेत्रों के जीवनकाल को आगे बढ़ाने की रणनीति भी है।
‘कुएं से तेल’ निकालने की तस्वीर अब पहले जैसी नहीं
आम तौर पर तेल के कुएं की तस्वीर सामने आते ही जमीन से ऊपर निकला पाइप और उससे निकलता कच्चा तेल दिखाई देता है। लेकिन आधुनिक तेल उत्पादन इससे कहीं अधिक जटिल प्रक्रिया बन चुका है। किसी तेल क्षेत्र की वास्तविक क्षमता का पता लगाने के लिए जमीन के नीचे मौजूद चट्टानों, दबाव, तेल की गुणवत्ता, पानी की मात्रा और तरल पदार्थों के प्रवाह का लगातार अध्ययन करना पड़ता है। वेदांता ने राजस्थान में भूमिगत भंडार की बेहतर जानकारी हासिल करने के लिए उन्नत आंकड़ा विश्लेषण, वास्तविक समय उत्पादन अनुकूलन और आधुनिक भूमिगत मॉडलिंग जैसी तकनीकों के इस्तेमाल पर भी जोर दिया है। फरवरी 2026 में एसएंडपी ग्लोबल को कंपनी ने बताया था कि राजस्थान में मंगला, भाग्यम और ऐश्वर्या में उन्नत तेल रिकवरी तकनीकों का विस्तार किया जा रहा है।
इसका मतलब है कि आने वाले वर्षों में तेल उत्पादन केवल अधिक कुएं खोदने पर निर्भर नहीं रहेगा। पुराने कुओं से कितना तेल निकाला जा सकता है, किस कुएं में कितना दबाव है और किस हिस्से में पानी या रासायनिक मिश्रण भेजने से बेहतर परिणाम मिल सकते हैं—इन सभी सवालों का जवाब तकनीक और आंकड़ों के आधार पर तलाशा जाएगा।
राजस्थान के लिए भी बड़ा आर्थिक महत्व
राजस्थान में तेल और प्राकृतिक गैस की गतिविधियां केवल ऊर्जा उत्पादन तक सीमित नहीं हैं। इनका सीधा प्रभाव राज्य के राजस्व, रोजगार, परिवहन, निर्माण और स्थानीय कारोबार पर पड़ता है। राजस्थान सरकार की आर्थिक समीक्षा के अनुसार दिसंबर 2024 तक बाड़मेर-सांचोर बेसिन से तेल और प्राकृतिक गैस का उत्पादन जारी था। इसी अवधि तक बाड़मेर-सांचोर बेसिन से संबंधित गतिविधियों से राज्य को पेट्रोलियम क्षेत्र के माध्यम से उल्लेखनीय राजस्व प्राप्त हुआ था। तेल उत्पादन बढ़ने का अर्थ रॉयल्टी और अन्य राजस्व मदों में संभावित वृद्धि भी हो सकता है। साथ ही कुओं की खुदाई, रखरखाव, परिवहन, उपकरण, इंजीनियरिंग और अन्य सेवाओं के लिए स्थानीय स्तर पर आर्थिक गतिविधियां बढ़ती हैं। हालांकि इसका दूसरा पहलू भी है। रेगिस्तानी और संवेदनशील पारिस्थितिकी वाले क्षेत्रों में औद्योगिक गतिविधियों के विस्तार के साथ पर्यावरणीय प्रबंधन भी उतना ही महत्वपूर्ण हो जाता है। पानी के उपयोग, भूमि प्रबंधन, उत्पादन के दौरान निकलने वाले पदार्थों के निपटान और स्थानीय समुदायों की जरूरतों का संतुलन बनाए रखना किसी भी बड़े तेल कार्यक्रम की दीर्घकालिक सफलता के लिए आवश्यक है।
भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है राजस्थान का तेल?
भारत दुनिया के बड़े तेल उपभोक्ता देशों में शामिल है और घरेलू कच्चे तेल उत्पादन में लंबे समय से गिरावट की चुनौती बनी हुई है। ऊर्जा क्षेत्र की सरकारी रिपोर्ट के अनुसार वित्त वर्ष 2024-25 में भारत का घरेलू कच्चा तेल और संघनित तरल पदार्थों का उत्पादन लगभग 28.7 मिलियन टन रहा, जबकि वित्त वर्ष 2014-15 में यह लगभग 37 मिलियन टन था। रिपोर्ट में पुराने और सीमांत क्षेत्रों में प्राकृतिक गिरावट को घरेलू उत्पादन घटने के कारणों में शामिल किया गया है।
ऐसे में पुराने तेल क्षेत्रों से अतिरिक्त उत्पादन निकालना महत्वपूर्ण हो जाता है। हर बार नई बड़ी तेल खोज होना संभव नहीं है। इसलिए जिन क्षेत्रों में पहले से तेल का उत्पादन हो रहा है, वहां उपलब्ध संसाधन का अधिकतम उपयोग करना घरेलू उत्पादन बढ़ाने की एक व्यावहारिक रणनीति हो सकती है।
राजस्थान के मंगला, भाग्यम और ऐश्वर्या क्षेत्र इसी रणनीति का उदाहरण हैं। यहां नई खोज की बजाय मौजूदा संसाधन की रिकवरी बढ़ाने पर जोर है।
570 मिलियन बैरल तेल समकक्ष की संभावना का क्या मतलब?
मंगला, भाग्यम और ऐश्वर्या क्षेत्रों के लिए कंपनी ने लगभग 570 मिलियन बैरल तेल समकक्ष संसाधन की संभावित मात्रा बताई है। लेकिन संसाधन और उत्पादन में अंतर समझना जरूरी है। किसी क्षेत्र में अनुमानित संसाधन होना और उस पूरे संसाधन को आर्थिक रूप से निकाल पाना एक ही बात नहीं है। भूमिगत संसाधन का कितना हिस्सा वास्तव में निकाला जा सकता है, यह चट्टानों की संरचना, तेल के गुण, दबाव, तकनीक, लागत और बाजार परिस्थितियों सहित कई कारकों पर निर्भर करता है। इसलिए 570 मिलियन बैरल तेल समकक्ष को तत्काल उपलब्ध होने वाले उत्पादन के रूप में देखना सही नहीं होगा। यही कारण है कि कंपनी संसाधन को भंडार में बदलने और रिकवरी दर बढ़ाने पर भी जोर दे रही है। इसके लिए बेहतर भूमिगत अध्ययन, कुओं का विकास और उत्पादन तकनीकों का विस्तार आवश्यक होगा।
तंग चट्टानों में फंसे तेल पर भी नजर
राजस्थान की कहानी केवल पारंपरिक तेल भंडार तक सीमित नहीं है। कंपनी राजस्थान ब्लॉक में ऐसी चट्टानों में मौजूद तेल की संभावनाओं पर भी काम कर रही है, जहां तेल को निकालना अपेक्षाकृत कठिन होता है। इसे ‘टाइट ऑयल’ कहा जाता है। कंपनी ने राजस्थान परिसंपत्ति में लगभग 100 से 200 मिलियन बैरल तेल समकक्ष की तंग तेल क्षमता का अनुमान बताया है। इसके अलावा संसाधन को भंडार में बदलने के कार्यक्रमों के जरिए आने वाले वर्षों में 200 से 300 मिलियन बैरल तेल समकक्ष अतिरिक्त संभावनाएं सामने आने की बात कही गई है।
यह क्षेत्र भविष्य में राजस्थान के तेल उत्पादन की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण हो सकता है। लेकिन तंग तेल के उत्पादन में तकनीकी कठिनाइयां और लागत सामान्य तेल क्षेत्रों की तुलना में अलग हो सकती हैं। इसलिए इन संभावनाओं का वास्तविक उत्पादन में बदलना तकनीकी सफलता और आर्थिक व्यवहार्यता दोनों पर निर्भर करेगा।
कंपनी की बड़ी रणनीति का एक हिस्सा है राजस्थान
राजस्थान में दो हजार करोड़ रुपये का निवेश वेदांता की व्यापक तेल और गैस रणनीति का एक हिस्सा है। कंपनी पहले ही विभिन्न तेल और गैस परिसंपत्तियों में बड़े निवेश की योजना बता चुकी है। फरवरी 2026 में कंपनी ने राजस्थान में उन्नत तेल रिकवरी के साथ-साथ देश के पूर्वी और पश्चिमी तट पर समुद्री अन्वेषण बढ़ाने की रणनीति भी साझा की थी।
वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही में राजस्थान ब्लॉक कंपनी की प्रमुख उत्पादन परिसंपत्ति बना रहा। कंपनी के अनुसार अप्रैल-जून 2026 तिमाही में राजस्थान ब्लॉक का औसत सकल संचालित उत्पादन 63.1 हजार बैरल तेल समकक्ष प्रतिदिन रहा। इससे संकेत मिलता है कि राजस्थान अभी भी कंपनी के उत्पादन पोर्टफोलियो में केंद्रीय भूमिका निभा रहा है।
आगे क्या बदलेगा?
आने वाले समय में बाड़मेर के तेल क्षेत्रों में सबसे बड़ा बदलाव यह हो सकता है कि उत्पादन बढ़ाने की कोशिश पुराने और नए दोनों तरीकों के मेल से की जाए। एक तरफ नए कुओं और अतिरिक्त कुओं का विकास होगा, दूसरी तरफ पुराने कुओं में सुधार और भूमिगत दबाव तथा प्रवाह को नियंत्रित करने वाली तकनीकों का उपयोग बढ़ेगा।
मंगला में बहुलक और क्षारीय-पृष्ठसक्रियक-पॉलिमर आधारित तकनीक का विस्तार, भाग्यम और ऐश्वर्या में अतिरिक्त उत्पादन की संभावनाओं का विकास तथा तंग तेल क्षेत्रों में नए कुओं की गतिविधियां इस पूरी रणनीति के अलग-अलग हिस्से हैं। कंपनी ने मंगला में कुओं के सुधार, भूमिगत मार्ग में बदलाव और कुओं में विशेष हस्तक्षेप के जरिए रिकवरी बढ़ाने का लक्ष्य रखा है। यदि ये तकनीकी प्रयास अपेक्षित परिणाम देते हैं, तो इससे परिपक्व तेल क्षेत्रों की उत्पादन अवधि को आगे बढ़ाने में मदद मिल सकती है।
रेगिस्तान में तेल की दूसरी पारी
बाड़मेर की कहानी केवल वर्ष 2004 में हुई मंगला की खोज तक सीमित नहीं है। अब इस कहानी का दूसरा चरण शुरू हो रहा है, जिसमें जमीन के नीचे मौजूद तेल का अधिक से अधिक हिस्सा आधुनिक तकनीक की मदद से निकालने की कोशिश की जाएगी। वेदांता का करीब दो हजार करोड़ रुपये का निवेश इसी सोच का हिस्सा है। मंगला, भाग्यम और ऐश्वर्या जैसे परिपक्व क्षेत्रों में उत्पादन में प्राकृतिक गिरावट के बावजूद नई तकनीक, अतिरिक्त कुओं, बहुलक आधारित तेल रिकवरी, क्षारीय-पृष्ठसक्रियक-पॉलिमर प्रक्रिया और भूमिगत भंडार के बेहतर अध्ययन के जरिए उत्पादन को बनाए रखने की कोशिश की जाएगी। भारत के लिए इसका महत्व इसलिए बढ़ जाता है क्योंकि घरेलू कच्चे तेल उत्पादन में लंबे समय से गिरावट देखी गई है और देश की ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात से पूरा होता है। ऐसे में देश के भीतर मौजूद पुराने तेल क्षेत्रों से अतिरिक्त उत्पादन निकालना आयात निर्भरता को कम करने की व्यापक रणनीति का एक हिस्सा बन सकता है।
लेकिन इस पूरी योजना की वास्तविक सफलता केवल निवेश की राशि से तय नहीं होगी। असली कसौटी यह होगी कि दो हजार करोड़ रुपये के निवेश से उत्पादन में कितनी वृद्धि होती है, प्राकृतिक गिरावट को कितनी हद तक रोका जा सकता है और भूमिगत संसाधनों को कितने प्रभावी ढंग से वास्तविक उत्पादन में बदला जा सकता है।
रेगिस्तान की तपती रेत के नीचे छिपे ‘काले सोने’ की यह दूसरी पारी इसलिए दिलचस्प है क्योंकि यहां लक्ष्य कोई नई खोज का दावा करना नहीं, बल्कि पहले से खोजे जा चुके संसाधन की छिपी हुई क्षमता को तकनीक के सहारे सामने लाना है। मंगला, भाग्यम और ऐश्वर्या आने वाले वर्षों में यह तय करने वाले प्रमुख क्षेत्र हो सकते हैं कि भारत पुराने तेल भंडारों से आधुनिक तकनीक की मदद से कितना अतिरिक्त उत्पादन हासिल कर सकता है।






