
संवाद 24 डेस्क। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी AI ने कंप्यूटिंग की दुनिया में ऐसी मांग पैदा कर दी है, जिसकी वजह से अब डेटा सेंटर के लिए जमीन, बिजली और पानी की उपलब्धता बड़ी चुनौती बनती जा रही है। इसी चुनौती ने तकनीकी कंपनियों को एक ऐसे विकल्प की ओर देखने के लिए प्रेरित किया है, जो कुछ साल पहले विज्ञान-कथा जैसा लगता था—अंतरिक्ष में डेटा सेंटर। एलन मस्क की SpaceX ने जहां लाखों उपग्रहों के जरिए ऑर्बिटल डेटा सेंटर का बड़ा विजन सामने रखा है, वहीं Google ने Project Suncatcher के जरिए इस विचार का वास्तविक तकनीकी परीक्षण शुरू कर दिया है। Google के मुताबिक उसका पहला प्रोटोटाइप मिशन सितंबर 2026 के अंत में तैयार है और अगला बड़ा परीक्षण 2027 में प्रस्तावित है।
आखिर पृथ्वी पर डेटा सेंटर लगाना इतना मुश्किल क्यों हो रहा है?
AI मॉडल को प्रशिक्षित करने और उन्हें चलाने के लिए अत्यधिक कंप्यूटिंग शक्ति की जरूरत होती है। इसके लिए बड़ी संख्या में GPU या AI एक्सेलेरेटर चिप्स लगाए जाते हैं, जिन्हें लगातार बिजली और प्रभावी कूलिंग चाहिए। पारंपरिक डेटा सेंटरों में सर्वर चलाने के साथ-साथ उन्हें ठंडा रखने के लिए भी भारी ऊर्जा और कई स्थानों पर बड़ी मात्रा में पानी की आवश्यकता होती है।
यही कारण है कि AI के विस्तार के साथ डेटा सेंटरों के लिए बिजली उपलब्ध कराना दुनिया की तकनीकी कंपनियों के सामने एक महत्वपूर्ण चुनौती बन गया है। अंतरिक्ष में डेटा सेंटर के समर्थकों का तर्क है कि वहां सौर ऊर्जा लगभग लगातार उपलब्ध हो सकती है और पृथ्वी की तरह जमीन, मौसम और पारंपरिक कूलिंग इंफ्रास्ट्रक्चर की सीमाएं नहीं होंगी। Google के शोध के अनुसार, सही कक्षा में सौर पैनल पृथ्वी की तुलना में कई गुना अधिक प्रभावी ढंग से सौर ऊर्जा प्राप्त कर सकते हैं।
मस्क का सपना कितना बड़ा है?
एलन मस्क की कंपनी SpaceX ने जनवरी 2026 में अमेरिकी फेडरल कम्युनिकेशंस कमीशन यानी FCC के सामने 10 लाख तक उपग्रहों वाले Orbital Data Center System के लिए आवेदन किया। FCC ने फरवरी 2026 में इस आवेदन को सार्वजनिक टिप्पणी के लिए स्वीकार किया। दस्तावेजों के अनुसार प्रस्तावित सिस्टम में उपग्रह लगभग 500 से 2,000 किलोमीटर की ऊंचाई वाली कक्षाओं में काम कर सकते हैं और उनके बीच हाई-बैंडविड्थ ऑप्टिकल इंटर-सैटेलाइट लिंक का इस्तेमाल प्रस्तावित है।
SpaceX ने अपने विजन को इससे भी बड़े ऊर्जा लक्ष्य से जोड़ा है। कंपनी का कहना है कि लगातार उपलब्ध सौर ऊर्जा का इस्तेमाल करके ऑर्बिटल डेटा सेंटर AI कंप्यूटिंग को बड़े पैमाने पर बढ़ाने में मदद कर सकते हैं। SpaceX ने इसे भविष्य में ऐसी सभ्यता की दिशा में कदम बताया है जो अपने तारे की ऊर्जा का बड़े पैमाने पर उपयोग कर सके। यह कंपनी का महत्वाकांक्षी दृष्टिकोण है, न कि वर्तमान में हासिल हो चुकी क्षमता।
Starlink के बाद अब ‘AI Satellite’ की तैयारी
SpaceX की योजना को समझने के लिए Starlink महत्वपूर्ण है। Starlink ने बड़े पैमाने पर उपग्रहों का निर्माण, प्रक्षेपण और कक्षा में संचालन करने का अनुभव SpaceX को दिया है। अब कंपनी इसी तरह के बड़े पैमाने के अंतरिक्ष इंफ्रास्ट्रक्चर को AI कंप्यूटिंग की दिशा में ले जाने की कोशिश कर रही है।
SpaceX ने अपनी वेबसाइट पर AI1 नाम के एक ऑर्बिटल AI सैटेलाइट का कॉन्सेप्ट भी पेश किया है। कंपनी के अनुसार इसमें स्थानीय स्तर पर AI कंप्यूटिंग की क्षमता होगी और हाई-बैंडविड्थ लेजर लिंक के जरिए डेटा या परिणामों को दूसरे उपग्रहों और पृथ्वी तक पहुंचाया जा सकेगा। SpaceX ने AI1 के लिए 250 किलोवाट तक पीक कंप्यूट क्षमता का दावा किया है।
कंपनी का दावा है कि अंतरिक्ष में सौर ऊर्जा और रेडिएटिव कूलिंग का इस्तेमाल करके कुछ ऐसी सीमाओं को कम किया जा सकता है, जिनका सामना पृथ्वी के डेटा सेंटर करते हैं। हालांकि इन दावों को बड़े पैमाने पर वास्तविक परिचालन में साबित किया जाना अभी बाकी है।
Google ने कैसे शुरू किया Project Suncatcher?
Google ने नवंबर 2025 में Project Suncatcher की घोषणा की थी। इसका उद्देश्य पृथ्वी की कक्षा में सौर ऊर्जा से चलने वाले उपग्रहों का ऐसा नेटवर्क विकसित करने की संभावना तलाशना है, जिनमें Google के Tensor Processing Units यानी TPUs लगे हों। ये TPUs Google के AI कंप्यूटिंग सिस्टम का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।
Google की शुरुआती अवधारणा में छोटे-छोटे उपग्रहों का नेटवर्क बनाने की बात है। इन उपग्रहों को हाई-स्पीड फ्री-स्पेस ऑप्टिकल लिंक के जरिए आपस में जोड़ा जा सकता है। इसका उद्देश्य यह देखना है कि क्या भविष्य में अनेक उपग्रह मिलकर अंतरिक्ष में एक तरह का वितरित AI कंप्यूटिंग क्लस्टर बना सकते हैं।
Google का पहला परीक्षण क्या साबित करेगा?
सितंबर 2026 में Google ने बताया कि Project Suncatcher का पहला परीक्षण कक्षा में जाने वाला है। इस शुरुआती मिशन का मुख्य उद्देश्य पूरा डेटा सेंटर चलाना नहीं, बल्कि यह पता लगाना है कि Google के TPU चिप्स अंतरिक्ष के वास्तविक वातावरण में कैसा प्रदर्शन करते हैं। इसके लिए Planet के साथ साझेदारी की गई है और मिशन SpaceX के Transporter-18 rideshare अभियान से जुड़ा है।
यहां एक महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि Google का यह पहला मिशन व्यावसायिक ऑर्बिटल डेटा सेंटर नहीं है। यह तकनीकी परीक्षण है। भविष्य के बड़े मिशन के लिए Google को यह समझना होगा कि चिप्स विकिरण, तापमान, कंपन और शून्य गुरुत्व वाले वातावरण जैसी परिस्थितियों में कैसे काम करते हैं।
अंतरिक्ष में सबसे बड़ी समस्या बिजली नहीं, गर्मी भी है
पहली नजर में ऐसा लगता है कि अंतरिक्ष में डेटा सेंटर लगाने का सबसे बड़ा फायदा मुफ्त सौर ऊर्जा है। लेकिन इसके साथ एक गंभीर इंजीनियरिंग चुनौती जुड़ी है—गर्मी को बाहर निकालना।
पृथ्वी पर डेटा सेंटर में पंखे, एयर-कंडीशनिंग, चिलर और दूसरे कूलिंग सिस्टम काम करते हैं। लेकिन अंतरिक्ष में हवा नहीं होती। इसलिए पारंपरिक तरीके से गर्मी को हटाना संभव नहीं है। Google के अनुसार उसके Project Suncatcher में हीट पाइप और रेडिएटर जैसी तकनीक के जरिए चिप्स से उत्पन्न गर्मी को अंतरिक्ष में विकिरित करने की कोशिश की जा रही है।
यही कारण है कि अंतरिक्ष में AI कंप्यूटिंग केवल उपग्रह में कुछ चिप्स लगाने जितना सरल काम नहीं है। बिजली पैदा करना, उसे चिप्स तक पहुंचाना और फिर उत्पन्न गर्मी को सुरक्षित रूप से बाहर निकालना—तीनों को एक साथ हल करना होगा।
विकिरण भी चिप्स के लिए बड़ी चुनौती
पृथ्वी का वातावरण और चुंबकीय क्षेत्र हमें अंतरिक्षीय विकिरण के बड़े हिस्से से बचाते हैं। कक्षा में मौजूद इलेक्ट्रॉनिक्स को कॉस्मिक किरणों और सौर विकिरण का सामना करना पड़ सकता है। इससे कंप्यूटिंग में त्रुटियां हो सकती हैं और इलेक्ट्रॉनिक घटकों को नुकसान पहुंच सकता है।
Google ने अपने TPUs को पृथ्वी पर विकिरण परीक्षणों से गुजारा है। कंपनी के अनुसार उसके Trillium TPUs ने ऐसे परीक्षणों में पांच वर्ष की अंतरिक्ष यात्रा के बराबर विकिरण खुराक से अधिक परिस्थितियों में काम किया। लेकिन Google खुद मानता है कि कुछ सवालों का उत्तर केवल वास्तविक अंतरिक्ष परीक्षण से ही मिल सकता है।
उपग्रहों को जोड़ना भी आसान नहीं
अगर भविष्य में सैकड़ों या हजारों AI उपग्रह एक साथ काम करेंगे, तो उनके बीच तेज और विश्वसनीय डेटा संचार आवश्यक होगा। Google इसके लिए लेजर आधारित इंटर-सैटेलाइट लिंक पर काम कर रहा है।
कंपनी के मुताबिक भविष्य के उपग्रहों में कई TPU चिप्स हो सकते हैं और वे समूहों में उड़ सकते हैं। उन्हें आपस में बेहद उच्च बैंडविड्थ वाले लेजर लिंक से जोड़ना होगा। Google ने 2027 के मिशन में दो उपग्रहों के बीच इस तकनीक के परीक्षण की योजना बताई है।
फिर अंतरिक्ष में डेटा सेंटर लगाने की जरूरत क्यों?
इस पूरी दौड़ के पीछे सबसे बड़ा कारण AI की तेजी से बढ़ती कंप्यूटिंग जरूरत है। पृथ्वी पर बड़े डेटा सेंटरों के लिए जमीन, बिजली ग्रिड, कूलिंग और निर्माण समय लगातार महत्वपूर्ण मुद्दे बन रहे हैं।
अंतरिक्ष में सौर ऊर्जा की उपलब्धता और बड़े भू-क्षेत्र की आवश्यकता न होने को इस अवधारणा के संभावित फायदे के रूप में देखा जा रहा है। Google के शोध में कहा गया है कि उपयुक्त कक्षा में सौर ऊर्जा उत्पादन पृथ्वी की तुलना में कई गुना अधिक प्रभावी हो सकता है।
लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि अंतरिक्ष अपने आप सस्ता विकल्प बन जाता है। उपग्रहों को बनाना, रॉकेट से कक्षा में पहुंचाना, उनकी मरम्मत या प्रतिस्थापन करना और अंतरिक्ष मलबे से बचाना बेहद महंगा और जटिल काम है।
क्या यह सपना जल्द हकीकत बन जाएगा?
अभी इसका निश्चित उत्तर देना जल्दबाजी होगी। SpaceX की योजना बेहद बड़े पैमाने की है, जबकि Google अभी तकनीकी परीक्षणों के चरण में है। स्वतंत्र विश्लेषणों में भी लॉन्च लागत, बड़े पैमाने पर उपग्रह निर्माण, अंतरिक्ष मलबा, चिप कूलिंग और रखरखाव को बड़ी चुनौतियां माना गया है।
इसलिए फिलहाल इसे पृथ्वी के डेटा सेंटरों का तत्काल विकल्प कहना सही नहीं होगा। यह एक लंबी अवधि की तकनीकी दिशा है, जिसमें कंपनियां यह जांच रही हैं कि AI कंप्यूटिंग की अगली पीढ़ी के लिए अंतरिक्ष उपयोगी साबित हो सकता है या नहीं।
मस्क का सपना, Google की प्रयोगशाला और AI का अगला मोर्चा
अंतरिक्ष में डेटा सेंटर की दौड़ को समझने पर साफ होता है कि यह केवल दो कंपनियों की प्रतिस्पर्धा नहीं है। इसके पीछे AI के लिए लगातार बढ़ती कंप्यूटिंग क्षमता की जरूरत है।
मस्क की SpaceX ने 10 लाख तक उपग्रहों वाले ऑर्बिटल डेटा सेंटर सिस्टम का प्रस्ताव रखकर इस विचार को अभूतपूर्व पैमाने पर पहुंचा दिया है। दूसरी ओर Google Project Suncatcher के जरिए छोटे और नियंत्रित प्रयोगों से शुरुआत कर रहा है। Google का लक्ष्य यह साबित करना है कि उसके AI चिप्स अंतरिक्ष में काम कर सकते हैं और भविष्य में अनेक उपग्रहों को एक साथ जोड़कर बड़े पैमाने पर कंप्यूटिंग संभव हो सकती है।
इसलिए फिलहाल तस्वीर यह है कि मस्क ने अंतरिक्ष में विशाल AI इंफ्रास्ट्रक्चर का सपना और योजना सामने रखी है, जबकि Google ने उस दिशा में वास्तविक हार्डवेयर परीक्षण शुरू कर दिया है। आगे की दौड़ इस बात पर निर्भर करेगी कि कौन बिजली, कूलिंग, विकिरण, संचार, लॉन्च लागत और अंतरिक्ष सुरक्षा जैसी कठिन समस्याओं को व्यावहारिक और आर्थिक तरीके से हल कर पाता है।
अगर यह तकनीक सफल होती है तो आने वाले वर्षों में ‘डेटा सेंटर कहां बनाया जाए?’ का जवाब केवल किसी शहर, रेगिस्तान या समुद्र के किनारे मौजूद जमीन तक सीमित नहीं रहेगा। संभव है कि AI की अगली बड़ी कंप्यूटिंग रेस की निगाहें पृथ्वी से ऊपर, कक्षा में मौजूद उन उपग्रहों पर हों, जिन्हें आज हम केवल अंतरिक्ष यान समझते हैं।






