
संवाद 24 नई दिल्ली। देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था की रीढ़ कहे जाने वाले भारतीय निर्वाचन आयोग (ECI) के भीतर अचानक उठा संवैधानिक बवंडर अब पूरी तरह राजनीतिक और कानूनी मोर्चे पर तब्दील हो चुका है। मुख्य निर्वाचन आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार और अन्य दो चुनाव आयुक्तों – सुखबीर सिंह संधू एवं विवेक जोशी – के बीच आंतरिक मतभेदों और वोटर लिस्ट के ‘स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन’ (SIR) को लेकर खड़े हुए विवाद ने पूरे देश का ध्यान खींचा है। 10 महीनों के भीतर 14 बार दर्ज कराई गई आधिकारिक आपत्तियों और सुप्रीम कोर्ट तक पहुंची नियुक्ति प्रक्रिया की बहस ने आयोग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। 10 प्रमुख सवालों और जवाबों (FAQs) के जरिए समझिए इस पूरे घमासान की असल वजह क्या है:
सवाल 1: अचानक मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार और चुनाव आयोग विवादों में क्यों घिर गए?
जवाब: एक प्रमुख मीडिया इन्वेस्टिगेटिव रिपोर्ट में खुलासा हुआ कि निर्वाचन आयोग के भीतर नीतिगत फैसलों और मतदाता सूची के पुनरीक्षण (SIR) से जुड़े कई अहम मामलों में दोनों चुनाव आयुक्तों – सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी – ने पिछले 10 महीनों में कम से कम 14 बार आधिकारिक रूप से अपनी असहमति और लिखित आपत्तियां दर्ज कराई थीं। आरोप है कि कई संवेदनशील निर्णय पूरी सहमति के बिना या प्रक्रियागत ऐतराजों के बावजूद आगे बढ़ाए गए।
सवाल 2: ‘स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन’ (SIR) क्या है और इस पर क्या सवाल उठ रहे हैं?
जवाब: एसआईआर चुनाव आयोग द्वारा मतदाता सूचियों के व्यापक शुद्धिकरण (Cleanup) की एक गहन प्रक्रिया है, जिसकी शुरुआत जून 2025 में बिहार से हुई थी। विवाद का कारण यह है कि 30 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में इस प्रक्रिया के दौरान प्रारूप मतदाता सूची से करोड़ों नाम बाहर कर दिए गए। विपक्षी दलों और नागरिक अधिकार संगठनों का आरोप है कि इतने बड़े पैमाने पर नामों को हटाना बिना पारदर्शी प्रक्रिया के किया गया, जिससे लाखों वास्तविक मतदाताओं के मताधिकार पर संकट मंडराने लगा।
सवाल 3: दोनों चुनाव आयुक्तों ने किन प्रमुख बिंदुओं पर लिखित आपत्तियां दर्ज कराईं?
जवाब: रिपोर्ट के अनुसार, आयुक्त संधू और जोशी ने नए मतदाताओं के पंजीकरण, नामों को काटने व दोबारा जोड़ने के मापदंडों, डेटाबेस के अत्यधिक केंद्रीकरण और सॉफ्टवेयर में किए गए एकतरफा बदलावों पर गंभीर चिंताएं जताई थीं। विशेष रूप से फॉर्म-6 में नए आवेदकों से उनके माता-पिता या दादा-दादी के पुराने एसआईआर रिकॉर्ड में नाम होने संबंधी नया कॉलम जोड़ने पर कड़ी आपत्ति थी, जिसे प्रक्रिया के विरुद्ध बताया गया था।
सवाल 4: क्या आयोग के भीतर डेटा और आईटी सिस्टम को लेकर भी खींचतान थी?
जवाब: जी हां। रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि चुनाव आयुक्तों ने मतदाता डेटाबेस और आईटी ढांचे के केंद्रीकरण को लेकर आपत्ति जताई थी। उनका मानना था कि आईटी निगरानी की जो त्रि-स्तरीय व्यवस्था थी, उसमें बदलाव करने से पारदर्शिता और आंतरिक निगरानी तंत्र कमजोर हो सकता है। इस संबंध में कैबिनेट सचिवालय तक पत्राचार होने की बातें भी सामने आई हैं।
सवाल 5: इन सभी आरोपों और मतभेदों पर चुनाव आयोग का क्या पक्ष है?
जवाब: निर्वाचन आयोग ने आधिकारिक स्पष्टीकरण देते हुए कहा है कि आयोग के भीतर विचार-विमर्श और स्वस्थ चर्चा एक स्वाभाविक लोकतांत्रिक प्रक्रिया है। आयोग के अनुसार, एसआईआर और वोटर लिस्ट सुधार से जुड़े सभी अंतिम फैसले संवैधानिक नियमों और सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुरूप पूर्ण सर्वसम्मति (Unanimous Consensus) और तीनों आयुक्तों की सहमति से ही लागू किए गए हैं। आंतरिक टिप्पणियां केवल मंथन का हिस्सा थीं, न कि अंतिम मतभेद।
सवाल 6: कानून क्या कहता है – क्या CEC अकेले कोई फैसला ले सकते हैं?
जवाब: वर्ष 2023 में पारित ‘मुख्य चुनाव आयुक्त एवं अन्य चुनाव आयुक्त अधिनियम’ की धारा 18 के अनुसार, आयोग का सारा कामकाज यथासंभव सर्वसम्मति से निपटाया जाना चाहिए। यदि आयुक्तों के बीच किसी मुद्दे पर राय अलग होती है, तो निर्णय बहुमत (2-1) के आधार पर लिया जाता है। यानी मुख्य चुनाव आयुक्त अकेले अन्य दो आयुक्तों की अनदेखी करके कोई फैसला कानूनी तौर पर थोप नहीं सकते।
सवाल 7: विपक्षी दल इस पूरे मामले पर क्या आरोप लगा रहे हैं?
जवाब: कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, शिवसेना (यूबीटी) समेत ‘इंडिया’ गठबंधन के तमाम दलों ने इसे लोकतंत्र और चुनावी शुचिता पर बड़ा आघात बताया है। विपक्ष का आरोप है कि मतदाता सूची से नाम हटाने की कवायद राजनीतिक रूप से एकतरफा लाभ पहुंचाने के मकसद से की गई। कई नेताओं ने मुख्य चुनाव आयुक्त से तत्काल इस्तीफे की मांग की है, जबकि कुछ दलों ने संसद में महाभियोग प्रस्ताव लाने और सड़कों पर देशव्यापी आंदोलन छेड़ने की चेतावनी दी है।
सवाल 8: सुप्रीम कोर्ट में यह मामला कैसे उलझा हुआ है?
जवाब: यह विवाद उस समय और गरमा गया जब चुनाव आयुक्तों के चयन और नियुक्ति से संबंधित 2023 के कानून (जिसमें सीजेआई को चयन समिति से बाहर किया गया था) की वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट की दो जजों की पीठ में मतभेद सामने आया। इस कानूनी गतिरोध के बाद मामले को भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) के पास 5 जजों की बड़ी संविधान पीठ गठित करने के लिए संदर्भित कर दिया गया है।
सवाल 9: नागरिक संगठनों और सामाजिक संगठनों का इस पर क्या रुख है?
जवाब: विभिन्न राजनीतिक व सामाजिक संगठनों ने चुनाव आयोग के दफ्तर और जंतर-मंतर पर प्रदर्शन की चेतावनी दी है। उनका तर्क है कि लोकतांत्रिक ढांचे में यह तय करना जनता का अधिकार है कि सरकार कौन चुनेगा, न कि आयोग की मनमानी प्रक्रिया यह तय करे कि कौन मतदान करने का पात्र रहेगा और कौन नहीं। 48 घंटे के अल्टीमेटम के साथ मतदाता सूची के आंकड़ों को सार्वजनिक करने की मांग की जा रही है।
सवाल 10: इस पूरे विवाद का भारतीय लोकतांत्रिक प्रक्रिया और आगामी चुनावों पर क्या असर होगा?
जवाब: चुनाव आयोग की साख हमेशा से निष्पक्षता और तटस्थता की कसौटी पर टिकी रही है। आंतरिक कार्यप्रणाली पर उठते सवाल और शीर्ष अदालत में नियुक्ति प्रक्रिया की समीक्षा से आयोग की विश्वसनीयता को लेकर सार्वजनिक बहस छिड़ गई है। भविष्य में चुनावी प्रक्रिया को पारदर्शी बनाए रखने के लिए यह आवश्यक होगा कि डेटा सुरक्षा, मतदाता पुनरीक्षण और प्रशासनिक निर्णयों में पूर्ण जवाबदेही सुनिश्चित की जाए।






