
संवाद 24 नई दिल्ली। वैश्विक राजनीति और ऊर्जा कूटनीति के पटल पर एक बड़ा भूचाल आ गया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने रूस और ईरान के खिलाफ बेहद कड़े प्रतिबंधों वाले एक नए ऐतिहासिक विधेयक पर हस्ताक्षर कर दिए हैं। ‘लिंडसे ओ. ग्राहम सैंक्शनिंग रशिया एंड ईरान एक्ट’ नाम का यह कानून न केवल रूस की अर्थव्यवस्था पर चोट करने के उद्देश्य से तैयार किया गया है, बल्कि यह उन सभी देशों के लिए भी खतरे की घंटी बन गया है जो रूस से रियायती दरों पर कच्चा तेल और प्राकृतिक गैस खरीद रहे हैं। इस कानून के अस्तित्व में आते ही अमेरिकी राष्ट्रपति को अधिकार मिल गया है कि वे रूसी ऊर्जा के प्रमुख आयातक देशों पर 100 प्रतिशत तक का भारी-भरकम व्यापारिक टैरिफ थोप सकें। इस प्रावधान की सीधी जद में भारत और चीन जैसे बड़े देश आ रहे हैं, जिससे अंतरराष्ट्रीय बाजारों में बेचैनी बढ़ गई है।
मॉस्को की ऊर्जा कमाई को रोकने का अमेरिकी दांव
अमेरिकी प्रशासन का मानना है कि रूस अपने ऊर्जा निर्यात के जरिए भारी राजस्व जुटा रहा है और उसी धन से युद्ध मशीन को संचालित कर रहा है। नए कानून के तहत रूस के बैंकिंग नेटवर्क, ऊर्जा कंपनियों, रक्षा आपूर्ति तंत्र और प्रतिबंधों से बचने वाले हर रास्ते पर सख्त शिकंजा कसने का प्रावधान है। व्हाइट हाउस का स्पष्ट संदेश है कि अब रूस के साथ प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से बड़ा ऊर्जा व्यापार करने वाले सहयोगियों को भी भारी आर्थिक कीमत चुकानी पड़ सकती है। अमेरिकी प्रतिनिधि सभा में इस बिल को 262 के मुकाबले 159 मतों से पारित किया गया था, जिसमें दोनों प्रमुख दलों के बीच लंबी बहस चली।
अमेरिकी संसद में सियासी घमासान
इस विधेयक को मंजूरी दिलाने के दौरान अमेरिकी संसद के निचले सदन में तीखा राजनीतिक टकराव देखने को मिला। रिपब्लिकन पार्टी ने जहां इस विधेयक को राष्ट्रीय सुरक्षा और कड़े फैसलों के तहत पेश किया, वहीं डेमोक्रेटिक सांसदों के बीच इसे लेकर साफ मतभेद उभरे। डेमोक्रेट्स यूक्रेन को सैन्य व कूटनीतिक सहयोग दिए जाने के तो पक्षधर हैं, लेकिन उनका एक बड़ा धड़ा राष्ट्रपति को एकतरफा तौर पर 100 प्रतिशत टैरिफ लगाने के असीमित अधिकार देने पर संशय जता रहा था। आलोचकों का तर्क था कि ऐसे कदम से वैश्विक व्यापार संतुलन बिगड़ सकता है और मित्र देशों के साथ अमेरिका के कूटनीतिक संबंध भी पटरी से उतर सकते हैं।
जेलेंस्की ने जताया आभार, वैश्विक प्रतिक्रियाएं तेज
यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की ने अमेरिकी संसद और राष्ट्रपति ट्रंप के इस कड़े कदम का स्वागत किया है। उन्होंने कहा कि आक्रमणकारी ताकतों के वित्तीय स्रोतों पर चोट पहुंचाना शांति की दिशा में एक जरूरी कदम है। वहीं दूसरी ओर, चीन ने इस कानून का पुरजोर विरोध करते हुए इसे अमेरिका की आर्थिक दादागीरी करार दिया है और स्पष्ट किया है कि संप्रभु राष्ट्रों के बीच वैध व्यापार में किसी तीसरे पक्ष का हस्तक्षेप अस्वीकार्य है।
भारत का रुख: ऊर्जा सुरक्षा और राष्ट्रीय हित सर्वोपरि
भारत के लिए यह फैसला कूटनीतिक और आर्थिक दोनों स्तरों पर एक नाजुक चुनौती पेश करता है। यूक्रेन संघर्ष शुरू होने के बाद से भारत ने घरेलू बाजार में ईंधन की कीमतों को नियंत्रित रखने और अपनी ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए रूस से रियायती कच्चा तेल आयात किया है। अमेरिकी फैसले की आहट के बीच भारतीय विदेश मंत्रालय और नीति निर्धारकों ने साफ किया है कि देश अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए विविध स्रोतों पर निर्भर रहेगा और अपने आर्थिक तथा रणनीतिक हितों की रक्षा के लिए सभी आवश्यक कदम उठाएगा। भारत यह पहले भी स्पष्ट कर चुका है कि उसका फैसला पूरी तरह से अपने 140 करोड़ नागरिकों की ऊर्जा सुरक्षा को ध्यान में रखकर लिया जाता है, न कि किसी भू-राजनीतिक दबाव में।
आगे की राह: क्या भारत पर सचमुच लगेगा टैरिफ?
विशेषज्ञों के अनुसार, कानून बन जाने का मतलब यह कतई नहीं है कि अमेरिका तुरंत प्रभाव से भारत पर 100 फीसदी शुल्क लागू कर देगा। यह प्रावधान ट्रंप प्रशासन के हाथ में एक ऐसा कूटनीतिक हथियार देता है, जिसका उपयोग वह व्यापारिक वार्ताओं और कूटनीतिक दबाव बनाने के लिए कर सकता है। हालांकि, यदि आने वाले दिनों में अमेरिका ने रणनीतिक साझेदारी को दरकिनार करते हुए दंडात्मक कदम उठाए, तो इसका सीधा असर द्विपक्षीय व्यापार, निर्यात और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला पर पड़ना तय है। आने वाले हफ्ते इस बात का फैसला करेंगे कि नई दिल्ली और वाशिंगटन इस नई आर्थिक चुनौती से कूटनीति के जरिए कैसे निपटते हैं।






