स्वर्ण लंका से द्वारका तक, किस शिल्पी ने रचीं ये भव्य नगरी? जानिए भगवान विश्वकर्मा की रोचक कहानी

संवाद 24 डेस्क। भारतीय पौराणिक परंपरा में कुछ नाम ऐसे हैं जिनकी पहचान किसी एक कथा या एक देवता के साथ नहीं, बल्कि पूरे सृजन-विचार के साथ जुड़ी हुई है। भगवान विश्वकर्मा ऐसा ही एक नाम हैं। उन्हें देवताओं का शिल्पी, वास्तुकार और निर्माण-कला का अधिष्ठाता माना जाता है। पौराणिक कथाओं में उनके नाम के साथ स्वर्ण लंका, द्वारका, इंद्रपुरी और अन्य दिव्य निर्माणों का उल्लेख मिलता है। लेकिन इन कथाओं को ध्यान से पढ़ें तो सवाल सिर्फ यह नहीं रह जाता कि विश्वकर्मा ने क्या बनाया, बल्कि यह भी सामने आता है कि भारतीय परंपरा ने निर्माण, वास्तुकला, तकनीकी कौशल और श्रम को किस तरह देखा।
ऋग्वेद के 10वें मंडल के 81वें और 82वें सूक्त में ‘विश्वकर्मा’ का उल्लेख सृष्टि और उसके निर्माण से जुड़े व्यापक दार्शनिक संदर्भ में मिलता है। भारत सरकार के Vedic Heritage Portal पर उपलब्ध ऋग्वेद के पाठ में विश्वकर्मा को धाता-विधाता तथा समस्त भुवनों को जानने वाली सत्ता के रूप में संबोधित किया गया है। बाद की पौराणिक परंपराओं में यही अवधारणा अधिक विशिष्ट होकर देवशिल्पी विश्वकर्मा के रूप में सामने आती है।
इसलिए भगवान विश्वकर्मा की कहानी को केवल पौराणिक नगरों के निर्माण की कहानी मानना अधूरा होगा। यह कहानी भारतीय कल्पना में उस आदर्श शिल्पी की भी है, जो विचार को आकार देता है, निर्माण को विज्ञान और कौशल से जोड़ता है तथा साधनों को उपयोगी रूप प्रदान करता है।

कौन हैं भगवान विश्वकर्मा और कहां से शुरू होती है उनकी कथा?
‘विश्वकर्मा’ नाम का सबसे प्राचीन महत्वपूर्ण संदर्भ ऋग्वेद में मिलता है। ऋग्वेद 10.81 में विश्वकर्मा से पूछा जाता है कि वह कौन-सा आधार था, जहां से पृथ्वी और आकाश की स्थापना हुई। सूक्त में उन्हें चारों ओर देखने वाली, व्यापक शक्ति के रूप में संबोधित किया गया है।
ऋग्वेद 10.82 में भी विश्वकर्मा से जुड़े प्रश्न सृष्टि की उत्पत्ति और उसके आधार पर केंद्रित हैं। वहां उन्हें पिता, जनिता और विधाता जैसे संबोधनों से जोड़ा गया है।
यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है। वैदिक विश्वकर्मा और आज लोकप्रिय रूप से पूजे जाने वाले देवशिल्पी विश्वकर्मा की अवधारणाओं में निरंतरता जरूर दिखाई देती है, लेकिन दोनों के संदर्भ समान नहीं हैं। वैदिक सूक्त मुख्य रूप से सृष्टि और ब्रह्मांडीय व्यवस्था पर दार्शनिक प्रश्न उठाते हैं, जबकि बाद के महाकाव्य और पुराण विश्वकर्मा को देवताओं के वास्तुकार और शिल्पी के रूप में अधिक स्पष्ट रूप से प्रस्तुत करते हैं।
यही विकास भगवान विश्वकर्मा की कथा को भारतीय धार्मिक परंपरा की एक दिलचस्प यात्रा बनाता है।

वह कौन-सा निर्माण था जिसने विश्वकर्मा को ‘देवशिल्पी’ बना दिया?
भगवान विश्वकर्मा की लोकप्रिय पहचान उनके दिव्य निर्माणों से बनी। पौराणिक कथाओं में उन्हें ऐसे शिल्पी के रूप में प्रस्तुत किया गया है, जिनके पास केवल भवन बनाने का ज्ञान नहीं था, बल्कि नगर नियोजन, स्थापत्य, धातु-कला और दिव्य उपकरणों के निर्माण की भी अद्भुत क्षमता थी।
इन कथाओं में सबसे अधिक चर्चा स्वर्ण लंका और द्वारका की होती है। हालांकि अलग-अलग ग्रंथों और परंपराओं में इनके निर्माण का विवरण अलग-अलग मिलता है, लेकिन दोनों नगरों के संदर्भ में विश्वकर्मा की शिल्प-कुशलता का उल्लेख विशेष रूप से महत्वपूर्ण है।
और यहीं से कहानी और रोचक हो जाती है—क्योंकि रामायण में लंका के निर्माण का संबंध सीधे विश्वकर्मा से मिलता है, जबकि श्रीमद्भागवत में द्वारका के निर्माण में भी विश्वकर्मा की वास्तु-कला का स्पष्ट उल्लेख आता है।

स्वर्ण लंका की कहानी में विश्वकर्मा की क्या भूमिका थी?
रामायण के किष्किंधा और युद्धकांड के प्रसंगों में लंका को विश्वकर्मा द्वारा निर्मित बताया गया है। वाल्मीकि रामायण के किष्किंधा कांड 4.58.20 में लंका नगरी को विश्वकर्मा द्वारा निर्मित बताया गया है। युद्धकांड के एक अन्य श्लोक में राम द्वारा त्रिकूट पर्वत पर स्थित लंका को विश्वकर्मा की निर्मित नगरी के रूप में देखने का वर्णन मिलता है।
वाल्मीकि रामायण के सुंदरकांड में भी लंका की भव्यता और उसकी वास्तुकला का वर्णन मिलता है। वहां लंका के प्राकार, परकोटे, खाइयों, ऊंचे भवनों और अट्टालिकाओं का उल्लेख करते हुए उसे विश्वकर्मा द्वारा निर्मित बताया गया है।
इससे स्पष्ट होता है कि ‘विश्वकर्मा द्वारा लंका का निर्माण’ केवल आधुनिक लोककथा नहीं है, बल्कि वाल्मीकि रामायण के पाठ में भी इसका आधार मिलता है।
हालांकि ‘सोने की लंका’ के निर्माण और उसके स्वामित्व को लेकर लोकप्रिय कथाओं में अतिरिक्त विवरण मिलते हैं। इसलिए लंका के हर लोकप्रिय विवरण को वाल्मीकि रामायण का प्रत्यक्ष कथन मानना उचित नहीं होगा।

लंका आखिर रावण के पास कैसे पहुंची?
लोकप्रिय पौराणिक परंपरा में लंका को कुबेर से जोड़ा जाता है और बाद में रावण के अधिकार में आने की कथा कही जाती है। रावण और कुबेर दोनों के बीच संबंध रामायण की कथा का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।
यहां भी अलग-अलग ग्रंथों में कथा के विवरणों में अंतर मिलता है। लेकिन इतना स्पष्ट है कि रामायण में लंका रावण की राजधानी के रूप में सामने आती है और उसे अत्यंत सुदृढ़, समृद्ध तथा भव्य नगर के रूप में चित्रित किया गया है।
विश्वकर्मा से जुड़ी यह कथा इस बात का प्रतीक बनती है कि पौराणिक कल्पना में एक आदर्श नगर केवल महलों का समूह नहीं था। उसमें मजबूत परकोटे, प्रवेश द्वार, सड़कें, जल-संरचना और सुरक्षा व्यवस्था जैसे तत्व भी शामिल थे।
यानी विश्वकर्मा की छवि केवल ‘कारीगर’ की नहीं, बल्कि नगर-नियोजक और वास्तु विशेषज्ञ की भी थी।

फिर द्वारका की कहानी में विश्वकर्मा कैसे आए?
अब कथा त्रेता से द्वापर की ओर बढ़ती है। श्रीकृष्ण की द्वारका नगरी भारतीय पौराणिक साहित्य की सबसे प्रसिद्ध नगर-कथाओं में से एक है।
श्रीमद्भागवत के दशम स्कंध में जरासंध के लगातार आक्रमणों की पृष्ठभूमि में कृष्ण द्वारा एक सुरक्षित नगरी स्थापित किए जाने का प्रसंग आता है। भागवत के 10.50.49 में समुद्र के भीतर एक दुर्ग और उसके अंदर अद्भुत नगरी के निर्माण का वर्णन है। अगले श्लोकों में उसी नगरी की वास्तुकला और विश्वकर्मा के शिल्प कौशल का उल्लेख मिलता है।
यह विवरण विशेष रूप से दिलचस्प है। इसमें चौड़ी सड़कें, बाजार, चौराहे, उद्यान, ऊंचे द्वार, स्वर्ण-शिखर, क्रिस्टल से बने ऊपरी भाग, स्वर्णमंडित भवन और विभिन्न प्रकार की संरचनाओं का वर्णन मिलता है।
अर्थात पौराणिक वर्णन में द्वारका केवल सुंदर नगर नहीं थी; उसे एक सुव्यवस्थित और योजनाबद्ध नगरी के रूप में भी प्रस्तुत किया गया है।

क्या विश्वकर्मा ने एक रात में द्वारका बना दी थी?
यह दावा आज की लोकप्रिय कहानियों में अक्सर सुनने को मिलता है कि विश्वकर्मा ने एक ही रात में द्वारका का निर्माण कर दिया। लेकिन शास्त्रीय स्रोतों को पढ़ते समय इस तरह के लोकप्रिय विवरणों और मूल ग्रंथ के वर्णन में अंतर करना आवश्यक है।
श्रीमद्भागवत में द्वारका के निर्माण का उल्लेख है और उसके स्थापत्य में विश्वकर्मा की वैज्ञानिक जानकारी तथा शिल्प-कौशल दिखाई देने की बात कही गई है। लेकिन ‘एक ही रात में पूरी नगरी का निर्माण’ जैसा विस्तृत दावा आधुनिक लोकप्रिय कथाओं में अधिक जोर से मिलता है।
इसलिए तथ्यात्मक लेखन में यह कहना अधिक उचित होगा कि पौराणिक मान्यता में द्वारका के निर्माण में विश्वकर्मा की महत्वपूर्ण भूमिका मानी जाती है, जबकि निर्माण की अवधि से जुड़े अलग-अलग लोकप्रचलित विवरणों को ग्रंथ-सम्मत तथ्य के रूप में नहीं प्रस्तुत किया जाना चाहिए।

द्वारका की वास्तुकला में क्या खास था?
श्रीमद्भागवत में द्वारका की संरचना का वर्णन किसी सामान्य गांव या नगर की तरह नहीं किया गया है। वहां सड़कें, बाजार, चौराहे, आवासीय क्षेत्र, उद्यान और सुरक्षा व्यवस्था का उल्लेख मिलता है। भवनों को सोने, चांदी, रत्नों और अन्य दिव्य सामग्री से अलंकृत बताया गया है।
इन विवरणों का धार्मिक और काव्यात्मक संदर्भ है। इन्हें आधुनिक इंजीनियरिंग के प्रत्यक्ष प्रमाण के रूप में पढ़ना इतिहास की दृष्टि से उचित नहीं होगा। लेकिन इससे यह जरूर समझ में आता है कि प्राचीन भारतीय कल्पना में आदर्श नगर की संरचना कैसी मानी जाती थी—व्यवस्थित सड़कें, सार्वजनिक स्थल, बाजार, आवासीय क्षेत्र, सुरक्षा और हरियाली।
यही वह बिंदु है जहां विश्वकर्मा की कथा केवल धार्मिक कथा नहीं रह जाती और प्राचीन भारतीय स्थापत्य-कल्पना को समझने का एक माध्यम बन जाती है।

इंद्रपुरी और अमरावती के शिल्पी भी विश्वकर्मा?
भगवान विश्वकर्मा से जुड़ी कथाओं में इंद्र की नगरी अमरावती और देवताओं के दिव्य भवनों का भी उल्लेख मिलता है। लोकप्रिय परंपरा में उन्हें स्वर्गलोक की वास्तु व्यवस्था से जोड़ा जाता है।
इन कथाओं में महल, सभागृह, उद्यान, रत्नजड़ित भवन और दिव्य संरचनाओं का वर्णन मिलता है। इनका उद्देश्य विश्वकर्मा को देवताओं के सर्वोच्च शिल्पी के रूप में स्थापित करना है।
यहां भी सावधानी जरूरी है। अलग-अलग पुराणों और लोकपरंपराओं में विश्वकर्मा से जुड़े निर्माणों की सूची एक जैसी नहीं है। इसलिए हर भवन को एक ही ग्रंथ का सर्वसम्मत विवरण बताने के बजाय इसे पौराणिक परंपरा में प्रचलित मान्यता के रूप में प्रस्तुत करना अधिक तथ्यात्मक तरीका है।

क्या विश्वकर्मा ने इंद्र का वज्र भी बनाया था?
विश्वकर्मा की कथा केवल नगरों तक सीमित नहीं है। महाभारत में विश्वकर्मा को ब्रह्मांड के वास्तुकार और दिव्य शिल्प से जुड़े देवता के रूप में संबोधित किया गया है।
लोकप्रिय पौराणिक परंपरा में इंद्र के वज्र और अन्य दिव्य अस्त्रों के निर्माण से भी विश्वकर्मा का नाम जोड़ा जाता है। विशेष रूप से दधीचि ऋषि की अस्थियों से वज्र निर्माण की कथा व्यापक रूप से प्रसिद्ध है।
इस कथा का केंद्रीय भाव यह है कि किसी साधारण पदार्थ को भी विशेष ज्ञान और शिल्प के माध्यम से शक्तिशाली उपकरण में बदला जा सकता है। यही विचार विश्वकर्मा की पूरी अवधारणा के साथ मेल खाता है—साधन को उद्देश्यपूर्ण और प्रभावशाली बनाना।

क्या विश्वकर्मा ने पांडवों के लिए भी नगर बनाया था?
विश्वकर्मा की कथा का एक और महत्वपूर्ण प्रसंग पांडवों के नगर से जुड़ा है। श्रीमद्भागवत 10.58.24 में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि भगवान कृष्ण के अनुरोध पर विश्वकर्मा ने पांडवों के लिए एक अद्भुत और विविधतापूर्ण नगर का निर्माण किया।
लोकप्रिय परंपरा में इसे इंद्रप्रस्थ से जोड़ा जाता है। महाभारत में इंद्रप्रस्थ पांडवों की राजधानी के रूप में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
हालांकि यहां भी ‘मयसभा’ और विश्वकर्मा के निर्माण को एक ही मान लेना ठीक नहीं होगा। महाभारत की कथा में मय दानव का भी महत्वपूर्ण स्थान है और मयसभा के निर्माण का संबंध मय से जोड़ा जाता है। इसलिए पांडवों की नगरी और मयसभा के संदर्भ को अलग-अलग रखना अधिक शास्त्रीय रूप से सावधान तरीका है।

विश्वकर्मा की कथा में ‘शिल्प’ का इतना महत्व क्यों है?
यह प्रश्न इस पूरी कहानी का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है।
भारतीय परंपरा में ज्ञान केवल पुस्तकीय ज्ञान नहीं माना गया। किसी वस्तु को बनाना, धातु को आकार देना, लकड़ी पर काम करना, भवन की रचना करना, औजार तैयार करना और तकनीक को व्यवहार में लाना भी ज्ञान की एक विशिष्ट श्रेणी रहा है।
विश्वकर्मा इसी व्यावहारिक ज्ञान और निर्माण-कौशल के प्रतीक बनते हैं।
आज जिस काम को हम इंजीनियरिंग, डिजाइन, वास्तुकला, मशीनरी और तकनीकी कौशल जैसे अलग-अलग क्षेत्रों में बांटते हैं, पौराणिक कल्पना में इन सबको एक ही दिव्य शिल्पी के भीतर समाहित कर दिया गया।
इसीलिए विश्वकर्मा को ‘देवशिल्पी’ कहना केवल धार्मिक उपाधि नहीं, बल्कि उस सांस्कृतिक विचार की अभिव्यक्ति भी है जिसमें निर्माण करने की क्षमता स्वयं सम्मान के योग्य मानी गई।

विश्वकर्मा और सूर्यदेव की कथा में छिपा एक अलग पहलू
विश्वकर्मा से जुड़ी एक प्रसिद्ध पौराणिक कथा उनकी पुत्री संज्ञा और सूर्यदेव से संबंधित है। कथा के अनुसार सूर्य के अत्यधिक तेज के कारण संज्ञा को कठिनाई होती थी। इसके बाद विश्वकर्मा सूर्य के तेज को कम करते हैं और उससे निकले अंश से विभिन्न दिव्य अस्त्रों के निर्माण की कथा मिलती है।
यह कथा भी प्रतीकात्मक स्तर पर रोचक है। यहां अत्यधिक ऊर्जा को नियंत्रित करके उसे उपयोगी रूप में बदलने की कल्पना सामने आती है।
आधुनिक विज्ञान की भाषा में इसे वास्तविक प्रक्रिया नहीं कहा जा सकता, लेकिन पौराणिक कथा के स्तर पर यह विश्वकर्मा के चरित्र को एक ऐसे शिल्पी के रूप में प्रस्तुत करती है जो शक्ति को नियंत्रित करके उपयोगी साधन तैयार करता है।

विश्वकर्मा की कथाओं में बार-बार क्यों लौटता है ‘सुरक्षा’ का विचार?
लंका हो या द्वारका—दोनों कथाओं में नगर की मजबूती और सुरक्षा महत्वपूर्ण दिखाई देती है। लंका के संदर्भ में रामायण में परकोटे, खाइयों, ऊंची अट्टालिकाओं और सुदृढ़ संरचनाओं का वर्णन मिलता है।
द्वारका के संदर्भ में समुद्र के भीतर दुर्ग और उसके भीतर योजनाबद्ध नगरी का वर्णन मिलता है।
इससे एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक संकेत मिलता है। आदर्श नगर केवल सुंदर नहीं होना चाहिए; उसे सुरक्षित और व्यवस्थित भी होना चाहिए।
आज की आधुनिक शहरी योजना में भी सुरक्षा, सड़क व्यवस्था, जल निकासी, सार्वजनिक क्षेत्र और आवासीय योजना जैसे मुद्दे महत्वपूर्ण हैं। इसलिए पौराणिक कथाओं में वर्णित नगरों को आधुनिक शहरों का तकनीकी मॉडल मानना भले उचित न हो, लेकिन उनमें मौजूद नगर-व्यवस्था की कल्पना का अध्ययन निश्चित रूप से रोचक है।

विश्वकर्मा पूजा में मशीन और औजार क्यों पूजे जाते हैं?
आज विश्वकर्मा पूजा के दिन कारखानों, वर्कशॉप, निर्माण स्थलों और तकनीकी संस्थानों में मशीनों और औजारों की पूजा की जाती है। इसके पीछे मूल विचार विश्वकर्मा को शिल्प और निर्माण के अधिष्ठाता के रूप में मानने से जुड़ा है।
मशीन स्वयं अंतिम लक्ष्य नहीं है। वह निर्माण का साधन है। जिस व्यक्ति की आजीविका किसी मशीन, औजार या तकनीकी कौशल पर निर्भर है, उसके लिए यह उपकरण रोजमर्रा के जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
इस अर्थ में मशीन पूजा को श्रम और कौशल के सम्मान के रूप में भी देखा जा सकता है।
यह परंपरा आज और अधिक अर्थपूर्ण हो जाती है, क्योंकि आधुनिक भारत की अर्थव्यवस्था में मशीनरी, इंजीनियरिंग, विनिर्माण, ऑटोमोबाइल, निर्माण और तकनीक की भूमिका लगातार बढ़ी है।

क्या भगवान विश्वकर्मा आधुनिक इंजीनियर के प्रतीक हैं?
धार्मिक दृष्टि से विश्वकर्मा को देवशिल्पी कहना परंपरा का हिस्सा है। आधुनिक अर्थ में उन्हें ‘इंजीनियर’ कहना एक व्याख्यात्मक तुलना है, शाब्दिक ऐतिहासिक तथ्य नहीं।
फिर भी दोनों के बीच एक दिलचस्प समानता जरूर है। इंजीनियर किसी समस्या का समाधान डिजाइन, गणना, तकनीक और संसाधनों के माध्यम से करता है। विश्वकर्मा की पौराणिक छवि भी निर्माण, योजना, कौशल और साधनों के उपयोग से जुड़ी है।
इसलिए आधुनिक संदर्भ में विश्वकर्मा को तकनीकी कौशल और रचनात्मक निर्माण के प्रतीक के रूप में देखा जा सकता है।

पौराणिक कथा और इतिहास में फर्क समझना क्यों जरूरी है?
भगवान विश्वकर्मा से जुड़ी कथाएं भारतीय धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। लेकिन जब इन कथाओं को आधुनिक पाठकों के सामने रखा जाए तो आस्था और इतिहास के बीच अंतर स्पष्ट करना जरूरी है।
उदाहरण के लिए रामायण के पाठ में लंका के विश्वकर्मा द्वारा निर्मित होने का उल्लेख मिलता है। इसी तरह श्रीमद्भागवत में द्वारका की वास्तुकला में विश्वकर्मा की शिल्प-कुशलता का वर्णन मिलता है।
लेकिन इन कथाओं को आधुनिक पुरातात्विक प्रमाण मानना अलग दावा होगा, जिसके लिए अलग प्रकार के साक्ष्य चाहिए।
तथ्यात्मक पत्रकारिता का काम यही है कि वह धार्मिक कथा का सम्मान करते हुए उसके स्रोत और स्वरूप को स्पष्ट रखे।

विश्वकर्मा की कहानी का आज के समाज के लिए क्या संदेश है?
विश्वकर्मा की कथा का सबसे आधुनिक संदेश शायद यही है कि निर्माण करने वाला व्यक्ति समाज के केंद्र में होना चाहिए।
आज हम किसी बड़ी इमारत को देखते हैं तो अक्सर उसका डिजाइन या अंतिम रूप दिखाई देता है। लेकिन उसके पीछे इंजीनियर, आर्किटेक्ट, तकनीशियन, कारीगर, मजदूर, मशीन ऑपरेटर और अनेक विशेषज्ञों का योगदान होता है।
विश्वकर्मा की परंपरा इसी ‘निर्माणकर्ता’ को सांस्कृतिक सम्मान देती है।
उनकी कथा यह भी बताती है कि तकनीक केवल मशीन का नाम नहीं है। तकनीक के पीछे ज्ञान, अनुभव, कौशल, अनुशासन और रचनात्मकता होती है।

स्वर्ण लंका से द्वारका तक आखिर एक ही संदेश क्यों दिखाई देता है?
स्वर्ण लंका की भव्यता हो या द्वारका की योजनाबद्ध संरचना—दोनों कथाओं में विश्वकर्मा की छवि एक ऐसे दिव्य शिल्पी की है जो कल्पना को वास्तविक संरचना में बदलता है।
ऋग्वेद में विश्वकर्मा से जुड़े प्रश्न ब्रह्मांडीय निर्माण तक पहुंचते हैं। रामायण में वही नाम लंका के वास्तुकार के रूप में सामने आता है। भागवत में द्वारका की वास्तुकला के संदर्भ में उनकी शिल्प-कुशलता का वर्णन मिलता है।
यानी कथा का विस्तार सृष्टि से नगर तक और नगर से औजार तक दिखाई देता है।
यही कारण है कि विश्वकर्मा भारतीय परंपरा में केवल किसी एक निर्माण के देवता नहीं रह जाते। वे सृजन की उस पूरी प्रक्रिया के प्रतीक बन जाते हैं जिसमें विचार, कौशल, साधन और श्रम मिलकर किसी नई चीज को जन्म देते हैं।

विश्वकर्मा की असली पहचान सिर्फ महल बनाने वाले देवता की नहीं
भगवान विश्वकर्मा की कथा जितनी पुरानी है, उतनी ही व्यापक भी। ऋग्वेद में उनका संदर्भ सृष्टि और ब्रह्मांडीय व्यवस्था के प्रश्नों से जुड़ता है। रामायण में लंका के निर्माण के साथ उनका नाम आता है। श्रीमद्भागवत में द्वारका और पांडवों के लिए निर्मित अद्भुत नगरी के संदर्भ में उनकी वास्तु-कला का वर्णन मिलता है।
पौराणिक कथाओं में उनकी बनाई नगरियां स्वर्ण, रत्नों और दिव्य वैभव से भरी हुई दिखाई देती हैं। लेकिन इन कथाओं का सबसे स्थायी संदेश केवल वैभव नहीं है। वह है कौशल का सम्मान।
आज जब मशीनें, रोबोट, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और अत्याधुनिक तकनीक निर्माण की दुनिया को बदल रहे हैं, तब विश्वकर्मा की कथा का अर्थ नए तरीके से समझा जा सकता है। तकनीक बदल सकती है, औजार बदल सकते हैं और निर्माण के तरीके बदल सकते हैं, लेकिन किसी चीज को बेहतर रूप देने के लिए ज्ञान और कौशल की जरूरत हमेशा रहेगी।
इसीलिए स्वर्ण लंका से द्वारका तक की यह कहानी केवल दो पौराणिक नगरों की कहानी नहीं है। यह उस भारतीय सांस्कृतिक दृष्टि की कहानी है जिसमें जो बनाता है, जो गढ़ता है और जो अपनी कला से किसी विचार को आकार देता है—उसके श्रम को सम्मान दिया जाता है।

Geeta Singh
Geeta Singh

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