
संवाद 24 नई दिल्ली। अमेरिकी संसद के निचले सदन, हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स ने रूस पर नए और व्यापक प्रतिबंध लगाने वाले एक विधायी प्रस्ताव को अपनी मंजूरी दे दी है। इस विधेयक का नाम ‘लिंडसे ओ ग्राहम सैंक्शनिंग रशिया एंड ईरान एक्ट’ है। इस विधेयक के मुख्य प्रावधानों में अमेरिकी राष्ट्रपति को यह कानूनी अधिकार देना शामिल है कि वे रूस से तेल और प्राकृतिक गैस खरीदने वाले शीर्ष आयातक देशों पर 100 प्रतिशत तक आयात शुल्क (टैरिफ) लगा सकें। भारत और चीन वर्तमान समय में रूस से कच्चे तेल के प्रमुख आयातक हैं, इसलिए इस विधेयक के कानूनी और व्यापारिक प्रभाव सीधे तौर पर इन देशों से जुड़े हैं।
संसदीय प्रक्रिया और मतदान का ब्योरा
प्रतिनिधि सभा में बुधवार को हुए मतदान के दौरान इस विधेयक को 262-159 के मत अनुपात से पारित किया गया। इसके पक्ष में 262 और विरोध में 159 सांसदों ने मतदान किया। इससे पहले अमेरिकी संसद के उच्च सदन (सीनेट) में यह विधेयक पहले ही पेश और स्वीकृत किया जा चुका था। सीनेट ने 7 अगस्त को 86-11 के भारी अंतर से इसे अपनी मंजूरी दी थी। दोनों सदनों से पारित होने के बाद अब यह विधेयक अंतिम हस्ताक्षर के लिए अमेरिकी राष्ट्रपति के पास भेजा गया है। राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के साथ ही यह विधायी मसौदा औपचारिक रूप से कानून का रूप ले लेगा।
विधेयक के प्रमुख बिंदु और लक्षित क्षेत्र
कानून के मसौदे में रूस के विभिन्न आर्थिक और प्रशासनिक क्षेत्रों को लक्षित करने के लिए विशिष्ट दिशा-निर्देश तय किए गए हैं:
ऊर्जा आयातक देशों पर टैरिफ: विधेयक के तहत अमेरिकी राष्ट्रपति को निर्देश दिया गया है कि वे रूसी कच्चे तेल या प्राकृतिक गैस का आयात करने वाले पांच सबसे बड़े आयातक देशों की पहचान करें। उन देशों से अमेरिका आने वाले सामानों पर 100 प्रतिशत तक का शुल्क अधिरोपित किया जा सकता है।
वित्तीय और प्रशासनिक प्रतिबंध: इस कानून के दायरे में रूसी प्रशासनिक अधिकारियों, सरकारी एवं निजी वाणिज्यिक बैंकों और ऊर्जा व्यापार से जुड़ी कंपनियों पर लक्षित प्रतिबंध लगाना शामिल है।
’शैडो फ्लीट’ पर पाबंदी: समुद्र के रास्ते तेल परिवहन में इस्तेमाल होने वाले उन जहाजों (जिन्हें शैडो फ्लीट कहा जाता है) पर प्रत्यक्ष प्रतिबंध लगाने का प्रावधान किया गया है, जिनका उपयोग अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों से बचकर तेल निर्यात के लिए किया जाता है।
छूट और शर्तों से संबंधित तकनीकी प्रावधान
विधेयक में सभी आयातक देशों पर एकतरफा शुल्क लगाने के बजाय कुछ स्पष्ट शर्तें और छूट के प्रावधान भी जोड़े गए हैं:
यदि कोई देश रूस के कुल प्राकृतिक गैस निर्यात के 15 प्रतिशत से कम हिस्से का आयात करता है, तो उसे कुछ शर्तों के अधीन छूट दी जा सकती है। इसके साथ ही संबंधित देश को यह प्रदर्शित करना होगा कि उसने रूसी ऊर्जा की अपनी खरीद को घटाने के लिए प्रत्यक्ष और ठोस कदम उठाए हैं। यह प्रावधान विशेष रूप से उन देशों के लिए रखा गया है जो वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों पर स्थानांतरित हो रहे हैं और अपनी निर्भरता में चरणबद्ध कटौती दर्ज करा रहे हैं।
भारत के संदर्भ में कानूनी स्थिति
रूस-यूक्रेन संघर्ष शुरू होने के बाद से भारत ने अपनी घरेलू ऊर्जा जरूरतों और कीमतों को नियंत्रित रखने के उद्देश्य से रूस से कच्चे तेल का आयात बढ़ाया है। आंकड़ों के अनुसार, भारत और चीन रूस से हाइड्रोकार्बन आयात करने वाले शीर्ष देशों में शामिल हैं। अमेरिकी संसद द्वारा पारित इस नए कानून से वाशिंगटन प्रशासन को कानूनी आधार मिल जाता है कि वह नई दिल्ली द्वारा रूसी ऊर्जा की खरीद जारी रखने की स्थिति में भारतीय आयातों पर टैरिफ लागू करने का निर्णय ले सके। हालांकि, विधेयक राष्ट्रपति को यह अधिकार प्रदान करता है, लेकिन इसे लागू करना या छूट के नियमों का उपयोग करना पूरी तरह से अमेरिकी कार्यपालिका के विवेक और द्विपक्षीय वार्ताओं पर निर्भर करेगा।
यूक्रेन का पक्ष और पृष्ठभूमि
विधेयक को पारित कराने के पीछे यूक्रेन युद्ध से जुड़ी पृष्ठभूमि भी शामिल रही है। यूक्रेनी राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की ने अमेरिकी कांग्रेस से इस प्रतिबंध पैकेज को पारित करने का औपचारिक आग्रह किया था। जेलेंस्की का तर्क था कि मॉस्को की अर्थव्यवस्था और राजस्व स्रोतों पर कड़े प्रतिबंध लगाने से ही रूस को कूटनीतिक बातचीत के लिए तैयार किया जा सकता है। व्हाइट हाउस द्वारा हस्ताक्षर किए जाने के बाद यह तय होगा कि अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि और वित्त विभाग इन प्रावधानों को किन देशों पर और किस समय-सीमा के भीतर लागू करते हैं।






