
संवाद 24 नई दिल्ली। देश में रोजमर्रा की जिंदगी का अहम हिस्सा बन चुके यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (UPI) को लेकर एक बड़ा नीतिगत फैसला सामने आया है। नेशनल पेमेंट्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (NPCI) ने डिजिटल लेन-देन के लिए एक नया मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) फ्रेमवर्क जारी किया है। नए नियमों के अनुसार, ₹2,000 से अधिक राशि के व्यावसायिक लेन-देन पर 0.4 प्रतिशत तक का शुल्क निर्धारित किया गया है, जो 15 अक्टूबर 2026 से प्रभावी होने जा रहा है। हालांकि, बड़े लेन-देन के मामलों में अधिकतम शुल्क सीमा 300 रुपये प्रति ट्रांजैक्शन तय की गई है।
आम उपभोक्ता की जेब पर क्या असर होगा?
वित्त मंत्रालय और एनपीसीआई की ओर से जारी स्पष्टीकरण के मुताबिक, सामान्य उपयोगकर्ताओं के लिए यूपीआई सेवा पहले की तरह ही निशुल्क रहेगी। यह चार्ज सीधे तौर पर आम जनता पर नहीं लगाया गया है, बल्कि यह मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) है, जिसे व्यापारी या कारोबारी बैंक और पेमेंट सर्विस प्रोवाइडर को डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर के उपयोग के बदले चुकाते हैं। इसके साथ ही, व्यक्तिगत स्तर पर एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति (P2P लेन-देन) जैसे दोस्तों या परिजनों को पैसे ट्रांसफर करने पर कोई शुल्क लागू नहीं होगा। नियामक संस्थाओं ने बैंकों और पेमेंट एग्रीगेटर्स को सख्त निर्देश दिए हैं कि व्यापारी इस शुल्क का बोझ ग्राहकों पर न डालें और न ही कोई छिपा हुआ प्लेटफॉर्म शुल्क वसूला जाए।
95% लेन-देन पूरी तरह अप्रभावित
आंकड़ों पर गौर करें तो देश में व्यक्ति से व्यापारी (P2M) के कुल लेन-देन में ₹2,000 से कम के भुगतानों की हिस्सेदारी लगभग 95 प्रतिशत है। इसका सीधा मतलब यह है कि रोजमर्रा की छोटी खरीदारी – जैसे दूध, सब्जी, फल, दवा और चाय-नाश्ते के भुगतान – पर इस नए शुल्क ढांचे का रत्ती भर भी प्रभाव नहीं पड़ेगा।
इतना ही नहीं, महीने में एक लाख रुपये तक का डिजिटल भुगतान स्वीकार करने वाले छोटे दुकानदारों, फेरीवालों और खुदरा व्यापारियों को भी इस नए शुल्क से पूरी तरह राहत दी गई है। छोटे व्यापारिक केंद्रों में डिजिटल भुगतान को प्रोत्साहन देने के लिए एक विशेष फंड के गठन की भी योजना बनाई गई है।
पेट्रोल, ट्रेन टिकट और जरूरी सेवाओं के लिए खास रियायत
सार्वजनिक और अनिवार्य सेवाओं की संवेदनशीलता को ध्यान में रखते हुए सरकार ने उनके लिए एक विशेष स्लैब तय किया है। भारतीय रेलवे के टिकट, ईंधन (पेट्रोल-डीजल पंप), बिजली व उपयोगिता बिल, बीमा प्रीमियम, टेलीकॉम सेवाएं और कृषि से जुड़े लेन-देन पर प्रतिशत आधारित व्यवस्था लागू नहीं होगी। इन चुनिंदा श्रेणियों में ₹2,000 से अधिक का भुगतान करने पर केवल 5 रुपये का फ्लैट एमडीआर लागू किया जाएगा। इसका मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि आवश्यक नागरिक सेवाओं और कम मुनाफे वाले आवश्यक व्यवसायों पर लागत का दबाव न बढ़े।
पूंजी बाजार और निवेश पर नॉमिनल चार्ज
शेयर बाजार, म्यूचुअल फंड, सिक्योरिटीज और स्टॉक ब्रोकरों को किए जाने वाले बड़े यूपीआई लेन-देन के लिए शुल्क को बेहद न्यूनतम रखा गया है। इस श्रेणी के लिए एमडीआर दर महज 0.02 प्रतिशत तय की गई है, जिसमें अधिकतम शुल्क सीमा 300 रुपये रखी गई है।
वैश्विक मानकों पर अब भी सबसे सस्ता
डिजिटल भुगतान के वैश्विक परिदृश्य की तुलना करें तो भारत का यह मॉडल अभी भी काफी किफायती माना जा रहा है। उदाहरण के तौर पर, ब्राजील के प्रसिद्ध ‘पिक्स’ (PIX) नेटवर्क में व्यापारियों से औसतन 0.33 प्रतिशत और चीन के डिजिटल पेमेंट इकोसिस्टम में लगभग 0.40 प्रतिशत का शुल्क लिया जाता है। इसके अलावा, क्रेडिट और डेबिट कार्ड पर लगने वाले 1.5 से 2.5 प्रतिशत के एमडीआर की तुलना में यूपीआई का यह तंत्र आज भी काफी सस्ता और पारदर्शी है।
साल 2016 में अपनी शुरुआत के बाद से यूपीआई ने भारतीय अर्थव्यवस्था में क्रांतिकारी बदलाव किया है। वित्तीय वर्ष 2017 में जहां कुल यूपीआई लेन-देन 0.07 लाख करोड़ रुपये था, वहीं वित्त वर्ष 2026 में यह आंकड़ा 314 लाख करोड़ रुपये को पार कर चुका है। आज भारत का यह स्वदेशी पेमेंट सिस्टम नेपाल, भूटान, यूएई, सिंगापुर, फ्रांस, मॉरीशस, कतर, श्रीलंका, कंबोडिया, ग्रीस और हाल ही में उज्बेकिस्तान सहित कुल 11 देशों में अपनी सेवाएं दे रहा है। नया शुल्क ढांचा इसी विशाल और तेजी से बढ़ते डिजिटल नेटवर्क की सुरक्षा, तकनीकी स्थिरता और सर्वर क्षमता को लंबे समय तक बनाए रखने के उद्देश्य से तैयार किया गया है।






