
संवाद 24 नई दिल्ली। भारत की अध्यक्षता में आयोजित 18वें ब्रिक्स (BRICS) शिखर सम्मेलन के पहले दिन सभी 11 सदस्य देशों ने सर्वसम्मति से ‘नई दिल्ली घोषणापत्र’ (New Delhi Declaration) को स्वीकार कर लिया है। वैश्विक अर्थव्यवस्था में लगभग 40 प्रतिशत की हिस्सेदारी और दुनिया की करीब आधी आबादी का प्रतिनिधित्व करने वाले इस समूह की बैठक ऐसे समय में हुई, जब पश्चिम एशिया में तनाव, यूक्रेन विवाद और अंतरराष्ट्रीय व्यापार में टैरिफ को लेकर मतभेद बने हुए हैं। इन संवेदनशील परिस्थितियों के बावजूद सदस्य देशों ने कूटनीतिक संतुलन बनाए रखते हुए एक साझा घोषणापत्र पर सहमति दर्ज की।
पश्चिम एशिया संकट पर संतुलित दृष्टिकोण
नई दिल्ली घोषणापत्र में मध्य पूर्व (पश्चिम एशिया) के हालात पर गंभीर चिंता व्यक्त की गई है और सभी संबंधित पक्षों से अत्यधिक संयम बरतने का आह्वान किया गया है। दस्तावेज़ में किसी भी देश का सीधा नाम लिए बिना क्षेत्रीय तनाव को बढ़ाने वाली गतिविधियों से बचने की बात कही गई है।
विश्लेषकों के अनुसार, ब्रिक्स के भीतर इस मुद्दे पर आम सहमति बनाना एक कूटनीतिक चुनौती थी, क्योंकि ईरान और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) दोनों ही अब इस समूह के पूर्णकालिक सदस्य हैं। घोषणापत्र में असैन्य बुनियादी ढांचों और अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) के सुरक्षा मानकों के तहत आने वाले शांतिपूर्ण परमाणु ठिकानों पर हमलों को लेकर भी चिंता जताई गई है, जिसे अंतरराष्ट्रीय कानूनों के पालन से जोड़कर देखा जा रहा है।
‘ग्लोबल साउथ’ और अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में सुधार की मांग
सम्मेलन को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि ब्रिक्स अब अपने परिपक्व चरण में पहुंच चुका है। उन्होंने जोर देकर कहा कि ‘ग्लोबल साउथ’ (विकासशील देशों) को केवल पूर्व-निर्धारित व्यवस्थाओं का पालन करने वाला नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय नियमों के निर्धारण में सक्रिय भूमिका निभाने वाला बनना होगा।
पीएम मोदी ने भारत का रुख स्पष्ट करते हुए कहा कि ब्रिक्स किसी भी देश या समूह के विरोध में काम करने वाला संगठन नहीं है, बल्कि यह बहुध्रुवीय वैश्विक व्यवस्था और समावेशी साझेदारी को बढ़ावा देने का मंच है। उन्होंने विशेषाधिकार आधारित व्यवस्था को वास्तविक वैश्विक साझेदारी में बदलने का सुझाव दिया।
एकतरफा टैरिफ और आर्थिक पाबंदियों पर रुख
घोषणापत्र में बिना संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) की मंजूरी के लगाए जाने वाले एकतरफा आर्थिक प्रतिबंधों और व्यापार को प्रभावित करने वाले मनमाने टैरिफ पर आधिकारिक आपत्ति दर्ज की गई है। दस्तावेज़ में स्पष्ट किया गया कि इस प्रकार के कदम अंतरराष्ट्रीय व्यापार नियमों और संयुक्त राष्ट्र चार्टर के सिद्धांतों के विपरीत हैं।
रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने अपने संबोधन में कहा कि उभरते बाजारों के विकास को रोकने के लिए व्यापारिक प्रतिबंधों और टैरिफ का इस्तेमाल अनुचित है। उन्होंने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में एशिया, अफ्रीका और लातिन अमेरिका के देशों को अधिक प्रतिनिधित्व दिए जाने की वकालत की। चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने भी अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में निष्पक्षता और न्यायसंगत सुधारों पर बल दिया।
यूक्रेन विवाद पर शांति और कूटनीति पर बल
रूस-यूक्रेन विवाद के संदर्भ में संयुक्त घोषणापत्र ने दोहराया कि सभी अंतरराष्ट्रीय विवादों और मतभेदों का समाधान कूटनीति, संवाद और आपसी परामर्श के जरिए ही निकाला जाना चाहिए। बैठक के दौरान यह भी सामने आया कि भारत और चीन ने शांति वार्ताओं को आगे बढ़ाने के लिए अपनी भूमिका निभाने की तत्परता दोहराई है, जिसका सदस्य देशों द्वारा स्वागत किया गया।
फिलिस्तीन मुद्दे पर स्पष्ट प्रस्ताव
अन्य मुद्दों की तुलना में फिलिस्तीन के मसले पर घोषणापत्र का रुख काफी स्पष्ट रहा। ब्रिक्स देशों ने:
1- गाज़ा में मानवीय संकट को समाप्त करने और तत्काल व निर्बाध मानवीय सहायता उपलब्ध कराने की मांग की।
2- फिलिस्तीनी नागरिकों के जबरन विस्थापन और भू-भाग में किसी भी प्रकार के जनसांख्यिकीय बदलाव का कड़ा विरोध किया।
3- संयुक्त राष्ट्र में फिलिस्तीन को पूर्ण सदस्यता देने का समर्थन किया।
4- 1967 की सीमाओं के आधार पर द्वि-राष्ट्र समाधान (Two-State Solution) और पूर्वी यरुशलम को राजधानी मानते हुए एक संप्रभु फिलिस्तीनी राष्ट्र की स्थापना की प्रतिबद्धता दोहराई।
नई दिल्ली में संपन्न हुआ यह पहला चरण दर्शाता है कि सदस्य देशों के आपसी रणनीतिक मतभेदों के बावजूद समूह ने साझा आर्थिक हितों, बहुध्रुवीयता और वैश्विक संस्थागत सुधारों के एजेंडे को प्राथमिकता दी है।






