
संवाद 24 डेस्क। घर हमारे जीवन का केवल भौतिक ठिकाना नहीं, बल्कि वह स्थान है जहाँ दिनचर्या, आराम, पारिवारिक संवाद और मानसिक शांति एक साथ आकार लेते हैं। इसी कारण भारतीय परंपरा में वास्तुशास्त्र को भवन की दिशा, स्थान-विन्यास और उपयोग से जोड़कर देखा गया है। हालांकि आधुनिक घरों—विशेषकर फ्लैट, अपार्टमेंट और पहले से बने मकानों—में वास्तु के हर नियम के अनुसार बदलाव करना संभव नहीं होता। अच्छी बात यह है कि वास्तु परंपरा में कई ऐसे उपाय भी बताए जाते हैं जिनमें दीवारें तोड़ने, कमरे बदलने या बड़े निर्माण की आवश्यकता नहीं होती। हाल के कई वास्तु-मार्गदर्शकों में भी प्राथमिकता फर्नीचर की स्थिति, प्रकाश, वेंटिलेशन, सफाई, रंग और स्थान-व्यवस्था जैसे गैर-संरचनात्मक बदलावों को देने की बात कही गई है। (Dr Jain’s Vastu)
यहाँ एक जरूरी तथ्यात्मक अंतर समझना भी आवश्यक है। वास्तुशास्त्र एक पारंपरिक भारतीय स्थापत्य-विचार प्रणाली है; इसके आध्यात्मिक या “ऊर्जा” संबंधी दावों को आधुनिक विज्ञान ने इस रूप में प्रमाणित नहीं किया है कि किसी विशेष वस्तु को किसी दिशा में रखने से धन, स्वास्थ्य या भाग्य निश्चित रूप से बदल जाता है। दूसरी ओर, वास्तु में प्रकाश, हवा, खुलापन, सफाई और सुव्यवस्थित स्थान जैसे कुछ सिद्धांत आधुनिक वास्तुकला और आरामदायक आवास की अवधारणाओं से मेल खाते हैं। प्राकृतिक रोशनी और वेंटिलेशन का महत्व भवन-विज्ञान में भी अच्छी तरह स्थापित है। (Studio Matrx) इसलिए बिना तोड़-फोड़ वाले वास्तु उपायों को अपनाते समय परंपरा और व्यावहारिकता—दोनों को साथ रखना सबसे संतुलित दृष्टिकोण है।
पहला उपाय: दोष खोजने से पहले घर को समझिए
वास्तु सुधार की शुरुआत किसी वस्तु की खरीदारी से नहीं, बल्कि घर के निरीक्षण से होनी चाहिए। सबसे पहले यह देखना उपयोगी है कि घर का मुख्य प्रवेश कहाँ है, उत्तर दिशा कौन-सी है, कमरे किस दिशा में हैं, प्राकृतिक रोशनी कितनी आती है और हवा का आवागमन कैसा है। दिशाओं का अनुमान लगाने के बजाय विश्वसनीय कंपास से उत्तर निर्धारित करना बेहतर है, क्योंकि गलत दिशा-निर्धारण के आधार पर किया गया पूरा वास्तु विश्लेषण गलत हो सकता है। आधुनिक वास्तु मार्गदर्शक भी दिशा तय करने से पहले सही ओरिएंटेशन की पुष्टि करने पर जोर देते हैं। (Vastu Essentials)
इसके बाद घर को एक साथ बदलने की कोशिश न करें। प्रवेशद्वार, बैठक, रसोई, शयनकक्ष, पूजा-स्थान, बाथरूम और घर के मध्य भाग को क्रम से देखें। कौन-सा स्थान हमेशा अव्यवस्थित रहता है, कहाँ रोशनी कम है, कहाँ हवा नहीं आती और कहाँ अनावश्यक सामान जमा है—ये प्रश्न अक्सर ऐसे सुधारों की ओर ले जाते हैं जिनका लाभ वास्तु की मान्यता से अलग भी सीधे घर के आराम में दिखाई देता है।
क्या अव्यवस्था सबसे बड़ा ‘दोष’ बन सकती है?
बिना खर्च के किए जा सकने वाले उपायों में सबसे पहला है—अनावश्यक सामान हटाना। प्रवेशद्वार, गलियारों, खिड़कियों, घर के मध्य भाग और उत्तर-पूर्व क्षेत्र में सामान का अनावश्यक जमाव कम करना पारंपरिक वास्तु में विशेष रूप से उपयोगी माना जाता है। आधुनिक व्यावहारिक दृष्टिकोण से भी साफ और व्यवस्थित घर में चलना-फिरना, सफाई करना और दैनिक काम करना आसान होता है। कई समकालीन वास्तु स्रोत भी सुधार की शुरुआत सफाई और decluttering से करने की सलाह देते हैं। (Vastu Essentials)
पुराने अखबार, टूटे उपकरण, बेकार डिब्बे, खराब सजावटी वस्तुएँ और लंबे समय से उपयोग में न आने वाली चीजें धीरे-धीरे घर की उपयोगी जगह घेर लेती हैं। इसलिए “वास्तु सुधार” का पहला नियम यह बनाया जा सकता है कि घर में वही वस्तु रहे जिसकी वास्तविक उपयोगिता या भावनात्मक महत्ता हो। इसे किसी चमत्कारी ऊर्जा-उपचार की तरह नहीं, बल्कि बेहतर spatial organization के रूप में देखना अधिक तर्कसंगत है।
मुख्य द्वार: घर की पहली छाप को बनाइए सकारात्मक
वास्तु में मुख्य द्वार को अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है क्योंकि यह घर और बाहरी वातावरण के बीच प्रमुख संपर्क बिंदु है। यदि मुख्य द्वार के सामने या आसपास जूते, कूड़ादान, पुराने कार्टन, टूटे गमले या अनावश्यक सामान पड़ा हो तो उसे हटाना सरल लेकिन प्रभावी घरेलू सुधार है। हालिया वास्तु लेखों में भी साफ, रोशन और अवरोध-मुक्त प्रवेशद्वार को प्राथमिकता दी गई है। (The Times of India)
दरवाजे की कुंडी, हैंडल, घंटी और नामपट्टिका जैसी चीजों की स्थिति भी ठीक रखें। दरवाजा आसानी से खुलता-बंद होता हो और उसके सामने पर्याप्त जगह हो। यदि प्रवेशद्वार अंधेरा है तो सुरक्षित और पर्याप्त प्रकाश व्यवस्था की जा सकती है। यहाँ उद्देश्य किसी दिशा को “जादुई” रूप से बदलना नहीं, बल्कि प्रवेश को साफ, सुरक्षित, स्वागतयोग्य और उपयोगी बनाना होना चाहिए।
उत्तर-पूर्व क्षेत्र: हल्का, साफ और खुला रखने की परंपरा
वास्तु परंपरा में उत्तर-पूर्व अर्थात ईशान क्षेत्र को अपेक्षाकृत हल्का और स्वच्छ रखने की सलाह दी जाती है। यदि इस हिस्से में भारी अलमारियाँ, कबाड़ या अनावश्यक सामान रखा है तो संभव हो तो उसे व्यवस्थित कर दूसरे उपयुक्त स्थान पर रखा जा सकता है। बिना निर्माण के यह एक सरल सुधार है।
इस क्षेत्र में प्राकृतिक रोशनी आती हो तो खिड़की या पर्दों को इस तरह व्यवस्थित करें कि दिन के समय पर्याप्त प्रकाश अंदर आ सके। लेकिन प्रकाश के लिए सुरक्षा या गोपनीयता से समझौता न करें। यदि प्राकृतिक रोशनी कम है तो ऊर्जा-कुशल कृत्रिम प्रकाश का उपयोग किया जा सकता है। इस प्रकार पारंपरिक वास्तु-सुझाव को आधुनिक lighting design के साथ जोड़ा जा सकता है।
घर का मध्य भाग: जितना संभव हो उतना खुला और व्यवस्थित
वास्तुशास्त्र में घर के केंद्रीय हिस्से को विशेष महत्व दिया जाता है। आधुनिक घरों में यह स्थान अक्सर सोफा, मेज, स्टोरेज बॉक्स या अन्य वस्तुओं से भर जाता है। यदि संरचनात्मक बदलाव संभव नहीं है तो कम-से-कम बीच के रास्ते को अवरुद्ध न होने दें। फर्नीचर को दीवारों के समीप व्यवस्थित करके circulation space बढ़ाया जा सकता है।
यह उपाय इसलिए भी व्यावहारिक है क्योंकि घर का खुला circulation क्षेत्र दैनिक आवाजाही, सफाई और वेंटिलेशन को बेहतर बना सकता है। आधुनिक वास्तु साहित्य में भी खुले केंद्र और आसान circulation को उपयोगी माना गया है। (Vastu Essentials)
प्रकाश और हवा: वास्तु सुधार का सबसे व्यावहारिक पक्ष
किसी भी घर के लिए पर्याप्त रोशनी और वेंटिलेशन अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। दिन में संभव हो तो पर्दे हटाकर प्राकृतिक प्रकाश का उपयोग करें। खिड़कियों के सामने ऐसी बड़ी वस्तुएँ न रखें जो प्रकाश और हवा को अनावश्यक रूप से रोकें। जाम खिड़कियाँ साफ कराएँ और जहाँ सुरक्षित हो वहाँ cross-ventilation के लिए अलग-अलग दिशाओं की खिड़कियों का उपयोग करें।
वास्तु की कुछ पारंपरिक अवधारणाओं में उत्तर और पूर्व की ओर खुलापन तथा दक्षिण-पश्चिम की ओर अपेक्षाकृत भारी निर्माण जैसी बातें मिलती हैं। आधुनिक building science में भी orientation, daylight, solar heat gain और ventilation भवन के thermal comfort से जुड़े महत्वपूर्ण विषय हैं। (Studio Matrx) हालांकि हर भारतीय शहर का मौसम, धूप और हवा की दिशा समान नहीं होती, इसलिए स्थानीय जलवायु को किसी भी दिशा-आधारित नियम से ऊपर व्यावहारिक आधार माना जाना चाहिए।
रसोई में क्या बदला जा सकता है?
परंपरागत वास्तु में रसोई के लिए आग्नेय अर्थात दक्षिण-पूर्व दिशा को प्राथमिकता दी जाती है और खाना बनाते समय पूर्व की ओर मुख करने की सलाह कई वास्तु परंपराओं में मिलती है। लेकिन पहले से बनी रसोई को केवल दिशा बदलने के लिए तोड़ना हर परिवार के लिए न व्यावहारिक है, न आवश्यक।
यदि रसोई की संरचना नहीं बदली जा सकती तो चूल्हे और सिंक के बीच पर्याप्त कार्यक्षेत्र रखें, गैस और विद्युत उपकरणों की सुरक्षा सुनिश्चित करें तथा रसोई में ventilation बनाए रखें। धुआँ बाहर निकालने के लिए exhaust fan या chimney का उचित उपयोग करें। यहाँ वास्तु से पहले fire safety को प्राथमिकता मिलनी चाहिए। रंग या सजावट में बदलाव करना चाहें तो हल्के और साफ-सुथरे रंग उपयोग किए जा सकते हैं, लेकिन किसी एक रंग को स्वास्थ्य या समृद्धि का वैज्ञानिक समाधान मानना उचित नहीं होगा।
शयनकक्ष: दिशा से पहले नींद और आराम
वास्तु में मुख्य शयनकक्ष को अक्सर दक्षिण-पश्चिम क्षेत्र से जोड़ा जाता है तथा सोते समय सिर दक्षिण या पूर्व की ओर रखने की परंपरा है। यदि कमरे की संरचना पहले से तय है, तो बिना तोड़-फोड़ के सबसे आसान उपाय बिस्तर की स्थिति को उपलब्ध जगह के भीतर समायोजित करना हो सकता है।
बिस्तर के आसपास अनावश्यक सामान, बहुत तेज रोशनी और लगातार चलने वाले इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों का जमाव कम रखें। कमरे में पर्याप्त ventilation और आरामदायक तापमान बनाए रखें। किसी वास्तु नियम के कारण बिस्तर ऐसी जगह न रखें जहाँ उससे दरवाजा, खिड़की, विद्युत उपकरण या सुरक्षित आवाजाही प्रभावित हो। व्यावहारिक नींद-स्वास्थ्य हमेशा प्राथमिकता होनी चाहिए।
बीम या भारी छत के नीचे बिस्तर हो तो?
वास्तु में बिस्तर या बैठने की जगह के ऊपर दिखाई देने वाले beam को कई लोग दोष से जोड़ते हैं। यदि संरचना बदलना संभव नहीं है तो बिस्तर को सुरक्षित रूप से किसी अन्य उपलब्ध स्थान पर खिसकाना पहला विकल्प हो सकता है। यदि यह संभव न हो तो कमरे की सजावट को संतुलित करके दृश्य प्रभाव कम किया जा सकता है।
कुछ वास्तु स्रोत false ceiling या symbolic objects जैसे pyramids का सुझाव देते हैं। (JK Cement) लेकिन ऐसे उपायों के प्रभाव का वैज्ञानिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है। इसलिए इन्हें आवश्यक उपचार के बजाय वैकल्पिक सांस्कृतिक या सजावटी उपाय मानना अधिक उचित है। किसी भी सजावटी वस्तु को इस तरह न लगाएँ कि उसके गिरने का खतरा हो।
दर्पण: उपयोगी सजावट, लेकिन सोच-समझकर
दर्पण छोटे कमरे को दृश्य रूप से अधिक खुला और रोशन महसूस करा सकता है। वास्तु परंपरा में दर्पण के स्थान को दिशाओं से जोड़कर कई नियम बताए जाते हैं। हालांकि “दर्पण किसी दिशा की ऊर्जा को निश्चित रूप से बढ़ाता है” जैसी धारणाओं का वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है।
व्यावहारिक दृष्टि से दर्पण ऐसी जगह रखें जहाँ वह सुंदर दृश्य या प्रकाश को reflect करे और रास्ते में बाधा न बने। शयनकक्ष में यदि दर्पण से नींद के दौरान अचानक reflection दिखाई देता है और उससे असुविधा होती है, तो उसकी दिशा बदलना समझदारी है। दर्पण मजबूती से फिट होना चाहिए, खासकर बच्चों की पहुँच वाले स्थानों पर।
रंगों से वातावरण बदलें, भाग्य नहीं
रंग घर के वातावरण और व्यक्ति की अनुभूति को प्रभावित कर सकते हैं। वास्तु में अलग-अलग दिशाओं के लिए अलग रंगों की परंपराएँ मिलती हैं। बिना तोड़-फोड़ के रंग बदलना इसलिए लोकप्रिय उपाय है क्योंकि इसमें बड़े निर्माण की जरूरत नहीं पड़ती।
फिर भी किसी विशेष रंग को “धन आकर्षित करने” या “दोष समाप्त करने” वाला वैज्ञानिक उपाय मानना उचित नहीं है। रंग का चुनाव कमरे के आकार, प्राकृतिक प्रकाश, उपयोग और व्यक्तिगत पसंद के अनुसार करना बेहतर है। छोटे या कम रोशनी वाले कमरे में बहुत गहरे रंग के बजाय हल्के रंग कमरे को अधिक खुला महसूस करा सकते हैं।
पौधे: सजावट से आगे, लेकिन सही देखभाल जरूरी
हरे पौधे घर को प्राकृतिक और जीवंत वातावरण दे सकते हैं। वास्तु परंपरा में तुलसी, बाँस और अन्य पौधों को अलग-अलग संदर्भों में शुभ माना जाता है। हालांकि किसी पौधे को किसी दिशा में रखने से आर्थिक सफलता सुनिश्चित होती है—ऐसा वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है।
पौधे चुनते समय रोशनी, पानी, तापमान और उपलब्ध स्थान को ध्यान में रखें। सूखे या मृत पौधों को केवल वास्तु के नाम पर लंबे समय तक न रखें। विशेष रूप से ऐसे पौधे न चुनें जो घर के सदस्यों या पालतू पशुओं के लिए विषैले हो सकते हैं। पौधे सुंदर तभी हैं जब उनकी नियमित देखभाल संभव हो।
नमक, धातु और पिरामिड: परंपरा बनाम प्रमाण
समुद्री नमक, तांबा, पीतल, पिरामिड, शंख, यंत्र और अन्य वस्तुओं का उपयोग विभिन्न वास्तु परंपराओं में किया जाता है। कुछ आधुनिक वास्तु स्रोत इन्हें गैर-संरचनात्मक उपायों के रूप में सुझाते हैं। (Dr Jain’s Vastu)
लेकिन यहाँ तथ्य और विश्वास के बीच अंतर स्पष्ट रखना जरूरी है। इन वस्तुओं के “नकारात्मक ऊर्जा हटाने” या भाग्य बदलने संबंधी दावों के लिए मजबूत वैज्ञानिक प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं। इसलिए इन्हें अनिवार्य खर्च न बनाएं। यदि कोई वस्तु सांस्कृतिक या व्यक्तिगत आस्था के कारण रखी जाती है तो वह सुरक्षित, साफ और कम मात्रा में होनी चाहिए। नमक या पानी जैसी चीजों को नमी, फिसलन, बच्चों और पालतू जानवरों की सुरक्षा को ध्यान में रखकर ही रखें।
बाथरूम और टॉयलेट: दिशा बदलना संभव न हो तो क्या करें?
वास्तु में टॉयलेट की दिशा को लेकर कई पारंपरिक नियम हैं, जिनमें पश्चिम या उत्तर-पश्चिम को कुछ परंपराएँ उपयुक्त मानती हैं और उत्तर-पूर्व में टॉयलेट को दोष से जोड़ा जाता है। लेकिन पहले से बने घर में टॉयलेट की जगह बदलना अक्सर महंगा और तकनीकी रूप से जटिल होता है।
ऐसी स्थिति में सबसे महत्वपूर्ण उपाय हैं—अच्छी ventilation, पर्याप्त सफाई, पानी का रिसाव तुरंत ठीक करना, फर्श को सूखा रखना और खराब plumbing की मरम्मत करना। दरवाजा और ventilation opening ठीक से काम करें। यह उपाय किसी भी वास्तु-मान्यता से स्वतंत्र रूप से घर की स्वच्छता और उपयोगिता के लिए महत्वपूर्ण हैं।
सीढ़ियाँ, भारी फर्नीचर और स्टोरेज—व्यवस्था से करें सुधार
वास्तु में दक्षिण और पश्चिम क्षेत्रों को कई परंपराएँ अपेक्षाकृत भारी रखने की सलाह देती हैं। यदि घर की योजना में बदलाव संभव नहीं है तो भारी फर्नीचर को सुरक्षित रूप से ऐसे हिस्सों में व्यवस्थित किया जा सकता है जहाँ वह रास्ता, खिड़की या वेंटिलेशन बाधित न करे।
अलमारियाँ दीवार से सुरक्षित रूप से fix हों और सीढ़ियों के नीचे यदि storage है तो उसे व्यवस्थित रखें। ज्वलनशील वस्तुएँ, विद्युत तारों का अनावश्यक जाल या भारी सामान ऐसे स्थानों पर न रखें जहाँ दुर्घटना का खतरा हो। वास्तु-सुधार के नाम पर सुरक्षा नियमों की अनदेखी कभी उचित नहीं है।
घर में टूटे सामान को लेकर क्या करें?
वास्तु संबंधी लेखों में टूटे सामान, बंद घड़ियों, खराब उपकरणों और सूखे पौधों को घर से हटाने की सलाह अक्सर दी जाती है। (The Times of India) व्यावहारिक रूप से भी ऐसी वस्तुएँ उपयोगी स्थान घेरती हैं और घर को अव्यवस्थित बनाती हैं।
इसलिए खराब वस्तु उपयोगी है तो उसकी मरम्मत कराएँ और अनुपयोगी है तो जिम्मेदारी से recycle या dispose करें। यह किसी अदृश्य ऊर्जा को हटाने से ज्यादा महत्वपूर्ण इसलिए है क्योंकि इससे घर की वास्तविक कार्यक्षमता और व्यवस्था सुधरती है।
वास्तु उपायों की प्राथमिकता तय करना जरूरी है
हर समस्या के लिए अलग वस्तु खरीदना वास्तु सुधार का सही तरीका नहीं है। एक व्यावहारिक प्राथमिकता-क्रम बनाया जा सकता है—पहले सुरक्षा, फिर सफाई, उसके बाद रोशनी और ventilation, फिर furniture placement और अंत में सजावटी या पारंपरिक remedies। आधुनिक no-demolition वास्तु मार्गदर्शकों में भी placement, colour, elements और symbolic remedies को क्रमिक विकल्पों के रूप में प्रस्तुत किया गया है। (Vaastu Solutions)
इस दृष्टिकोण से किसी परिवार को अनावश्यक खर्च, बार-बार remodeling और भय-आधारित निर्णयों से बचाया जा सकता है। यदि किसी वास्तु विशेषज्ञ की सलाह ली जा रही हो तो उससे यह पूछना उपयोगी है कि कौन-सा उपाय पारंपरिक मान्यता पर आधारित है और कौन-सा व्यावहारिक वास्तु या interior-design सुधार है।
क्या हर वास्तु दोष ठीक किया जा सकता है?
इसका उत्तर सीधा “हाँ” नहीं है। कुछ संरचनात्मक परिस्थितियाँ—जैसे कमरे की स्थायी स्थिति, भवन की दिशा या plumbing layout—बिना निर्माण के बदली नहीं जा सकतीं। ऐसे मामलों में “दोष पूरी तरह समाप्त” होने का दावा करना अतिशयोक्ति होगा। अधिक उचित शब्द “परंपरागत दृष्टि से संतुलन का प्रयास” है।
यदि कोई वास्तु समस्या घर की सुरक्षा, संरचनात्मक मजबूती, बिजली, गैस, पानी या ventilation से जुड़ी है तो qualified architect, structural engineer, electrician या plumber की सलाह को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। वास्तु के नाम पर किसी जरूरी तकनीकी सुधार को टालना नुकसानदायक हो सकता है।
बिना तोड़-फोड़ के वास्तु सुधार का असली अर्थ
आखिरकार वास्तु सुधार को केवल दिशाओं और वस्तुओं की सूची के रूप में देखना इसकी उपयोगिता को सीमित कर देता है। एक घर में प्रवेशद्वार साफ हो, खिड़कियों से रोशनी और हवा आए, रसोई सुरक्षित हो, बाथरूम सूखा और स्वच्छ रहे, फर्नीचर आवाजाही में बाधा न बने, अनावश्यक सामान जमा न हो और प्रत्येक कमरे का उपयोग उसके उद्देश्य के अनुसार हो—तो घर की रहने की गुणवत्ता पहले ही काफी बेहतर हो जाती है।
वास्तु की पारंपरिक मान्यताओं में आस्था रखने वाला परिवार इन व्यावहारिक सुधारों के साथ रंग, पौधे, प्रतीकात्मक वस्तुएँ या अन्य गैर-संरचनात्मक उपाय भी अपना सकता है। लेकिन किसी उपाय को चमत्कारी समाधान मानने के बजाय उसे सांस्कृतिक विश्वास, सजावट और बेहतर spatial organization के संदर्भ में देखना अधिक संतुलित है।
हथौड़े से पहले व्यवस्था को मौका दीजिए
वास्तु दोष का नाम सुनते ही दीवार तोड़ने या पूरा कमरा बदलने की आवश्यकता नहीं है। मौजूदा घर में बहुत-से छोटे परिवर्तन—सफाई, अव्यवस्था हटाना, फर्नीचर की पुनर्स्थापना, पर्याप्त रोशनी, बेहतर ventilation, सुरक्षित प्रवेशद्वार, उपयुक्त रंग और पौधों की देखभाल—बिना किसी बड़े निर्माण के किए जा सकते हैं। कई वास्तु-आधारित स्रोत भी इन्हें no-demolition correction की पहली सीढ़ी मानते हैं। (Dr Jain’s Vastu)
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि वास्तु को भय पैदा करने वाली व्यवस्था न बनाया जाए। “यह दोष है, इसलिए तुरंत महंगा उपाय कराइए” जैसी सोच से सावधान रहना चाहिए। कोई भी परिवर्तन करने से पहले उसकी वास्तविक उपयोगिता, लागत, सुरक्षा और वैज्ञानिक आधार को समझना बेहतर है। घर का उद्देश्य अंततः उसमें रहने वाले लोगों को सुरक्षित, आरामदायक और सहज वातावरण देना है। इसलिए बिना तोड़-फोड़ का सबसे समझदार वास्तु-सिद्धांत शायद यही है—पहले घर को साफ, सुरक्षित, रोशन, हवादार और सुव्यवस्थित बनाइए; उसके बाद ही किसी अतिरिक्त वास्तु उपाय पर विचार कीजिए।






