
संवाद 24 नई दिल्ली। दुनिया भर में कम बजट और किफायती अंतरिक्ष अभियानों के लिए अपनी अलग पहचान बनाने वाले भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) की लॉन्च लागत को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक नया विवाद खड़ा हो गया है। कैम्ब्रिज और ट्यूरिन यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं द्वारा किए गए एक अध्ययन में दावा किया गया है कि भारत का प्रति किलोग्राम स्पेस लॉन्च खर्च दुनिया के प्रमुख अंतरिक्ष देशों में सबसे अधिक है। हालांकि, भारतीय अंतरिक्ष विशेषज्ञों और इसरो प्रबंधन ने इस रिपोर्ट में इस्तेमाल की गई पद्धति और आंकड़ों को भ्रामक बताते हुए इसे सिरे से खारिज कर दिया है।
क्या कहता है विदेशी रिसर्च पेपर?
जर्नल इकोनॉमिक्स लेटर्स (Economics Letters) में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार:
1- भारत की लागत: अध्ययन के मुताबिक लो-अर्थ ऑर्बिट (LEO) में एक किलोग्राम पेलोड भेजने के लिए भारत का खर्च लगभग 13,302 डॉलर (करीब 12.7 लाख रुपये) आंका गया है।
2- अन्य देशों से तुलना: इस स्टडी में अमेरिकी अंतरिक्ष कार्यक्रमों की लागत को सबसे कम $3,225 प्रति किग्रा बताया गया है। वहीं, जापान ($5,287), चीन ($5,809), रूस ($6,682) और यूरोपियन यूनियन ($9,897) की लागत भी भारत से कम दिखाई गई है।
3- वैश्विक औसत: रिपोर्ट के अनुसार वैश्विक स्तर पर प्रति किलोग्राम लॉन्च का औसत $3,868 बैठता है।
शोधकर्ताओं का तर्क है कि भारत आमतौर पर छोटे और मध्यम वर्ग के रॉकेट्स का अधिक इस्तेमाल करता है, जिससे उसकी फिक्स्ड लॉन्च लागत सीमित पेलोड पर बंट जाती है और प्रति किलोग्राम दर कागजों पर अधिक दिखाई देती है।
भारत ने क्यों नकारा यह दावा?
भारतीय अंतरिक्ष क्षेत्र के विशेषज्ञों और अधिकारियों ने इस विश्लेषण को पूरी तरह एकतरफा करार दिया है। विशेषज्ञों का कहना है कि:
1- मिशन लागत बनाम पेलोड गणित: भारत के चंद्रयान-3 और मंगलयान जैसे ऐतिहासिक मिशन पश्चिमी देशों की तुलना में एक-तिहाई से भी कम बजट में पूरे हुए हैं।
2- तुलना का गलत पैमाना: रिसर्च में अमेरिका के विशालकाय और बार-बार इस्तेमाल होने वाले (Reusable) भारी रॉकेट्स (जैसे स्पेसएक्स का फॉल्कन-9/स्टारशिप) के सैद्धांतिक आंकड़ों की तुलना भारत के वास्तविक और अलग श्रेणी के सैटेलाइट लॉन्च वाहनों से कर दी गई है।
3- कमर्शियल ऑफर और रियल कॉस्ट में फर्क: रिपोर्ट में इसरो की वाणिज्यिक शाखा ‘न्यूस्पेस इंडिया लिमिटेड’ (NSIL) की कीमतों और लॉन्च की वास्तविक परिचालन लागत के बीच स्पष्ट अंतर नहीं किया गया है।
आत्मनिर्भरता और प्राइवेट स्पेस सेक्टर पर फोकस
भारत इस समय अपने भारी रॉकेट LVM3 और अगली पीढ़ी के लॉन्च व्हीकल्स (NGLV) के विकास पर तेजी से काम कर रहा है। इसके साथ ही ‘इन-स्पेस’ (IN-SPACe) के जरिए घरेलू निजी स्पेस स्टार्टअप्स को लगातार बढ़ावा दिया जा रहा है ताकि देश में लॉन्चिंग की फ्रीक्वेंसी बढ़ाई जा सके और लागत को और अधिक प्रतिस्पर्धी बनाया जा सके। भारतीय अधिकारियों का रुख साफ है कि विदेशी रिसर्च की यह गणना इसरो की वैश्विक साख और जमीनी हकीकत से मेल नहीं खाती।






