
संवाद 24 डेस्क। घर की योजना बनाते समय हम आमतौर पर बैठक, रसोई, शयनकक्ष और पूजा-कक्ष की दिशा पर खूब चर्चा करते हैं, लेकिन शौचालय और बाथरूम को अक्सर केवल सुविधा और प्लंबिंग की जरूरत के रूप में देखा जाता है। जबकि वास्तुशास्त्र में यह घर का एक महत्वपूर्ण और संवेदनशील हिस्सा माना गया है। प्रचलित वास्तु मान्यताओं के अनुसार शौचालय के लिए पश्चिम या उत्तर-पश्चिम यानी वायव्य दिशा को उपयुक्त माना जाता है, जबकि उत्तर-पूर्व यानी ईशान दिशा में शौचालय बनाने से बचने की सलाह दी जाती है। आधुनिक वास्तु संबंधी कई स्रोत भी पश्चिम और वायव्य को प्राथमिक विकल्प बताते हैं तथा ईशान को सामान्यतः निषिद्ध मानते हैं। (Homeli)
लेकिन यहां एक जरूरी अंतर समझना होगा। पश्चिम या वायव्य में शौचालय रखने की सलाह वास्तुशास्त्र की परंपरागत मान्यता है; इसे आधुनिक विज्ञान द्वारा इस अर्थ में प्रमाणित नियम नहीं माना जा सकता कि किसी विशेष दिशा में बना शौचालय अपने-आप स्वास्थ्य, धन या पारिवारिक जीवन को प्रभावित करेगा। दूसरी ओर, अच्छी रोशनी, पर्याप्त वेंटिलेशन, सही जल-निकासी, स्वच्छता, नमी नियंत्रण और सुरक्षित प्लंबिंग जैसे सिद्धांत वास्तविक भवन-स्वास्थ्य से सीधे जुड़े हैं। भारत का National Building Code भी भवनों में प्लंबिंग, ड्रेनेज, सैनिटेशन, प्रकाश और वेंटिलेशन जैसे पहलुओं को महत्वपूर्ण मानता है। (BIS)
पश्चिम और वायव्य को लेकर क्या कहता है वास्तु?
वास्तु की लोकप्रिय व्याख्याओं में उत्तर-पश्चिम अर्थात वायव्य क्षेत्र को शौचालय के लिए सबसे अधिक सुझाए जाने वाले स्थानों में रखा जाता है और पश्चिम को भी स्वीकार्य विकल्प माना जाता है। इसके पीछे वास्तु की दिशा, पंचतत्व और स्थान के उपयोग से जुड़ी पारंपरिक व्याख्याएं दी जाती हैं। कुछ आधुनिक वास्तु स्रोत वायव्य दिशा को ‘वायु’ से जोड़ते हुए यह तर्क देते हैं कि शौचालय जैसे स्थान में हवा का प्रवाह और अपशिष्ट का निष्कासन महत्वपूर्ण है। (Homeli)
हालांकि विभिन्न वास्तु विशेषज्ञों के बीच भी शौचालय की बिल्कुल ‘एकमात्र सही’ दिशा को लेकर पूर्ण समानता नहीं है। कुछ स्रोत पश्चिम और वायव्य को प्राथमिकता देते हैं, जबकि अन्य दक्षिण-पश्चिम के उप-क्षेत्रों या दक्षिण-पूर्व के कुछ हिस्सों को भी परिस्थितियों के अनुसार स्वीकार करते हैं। इससे स्पष्ट होता है कि वास्तु परंपरा के भीतर भी अलग-अलग मत और व्याख्याएं मौजूद हैं। (Architectural Digest)
इसलिए किसी घर के लिए दिशा तय करते समय केवल एक इंटरनेट चार्ट देखकर अंतिम निर्णय लेना उचित नहीं है। भूखंड का आकार, घर का नक्शा, मौजूदा सीवर लाइन, पानी की निकासी, प्राकृतिक हवा, खिड़कियों की स्थिति और स्थानीय भवन नियम भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं।
ईशान कोण से क्यों बचने की सलाह दी जाती है?
वास्तुशास्त्र में उत्तर-पूर्व दिशा को ईशान कोण कहा जाता है और इसे परंपरागत रूप से अत्यंत शुभ, खुला और स्वच्छ क्षेत्र माना गया है। पुराने भारतीय भवन-नियोजन में इस हिस्से को प्रकाश, खुले स्थान और जल-स्रोतों से जोड़ने की परंपरा का उल्लेख मिलता है। इसी सांस्कृतिक और वास्तु दृष्टिकोण के कारण ईशान कोण में शौचालय बनाने से बचने की सलाह दी जाती रही है। (Architectural Digest)
आधुनिक वास्तु लेखों में इसके साथ यह तर्क भी जोड़ा जाता है कि पुराने समय में घरों के उत्तर-पूर्व हिस्से में कुएं या अन्य जल-स्रोत होने की संभावना रहती थी, इसलिए अपशिष्ट क्षेत्र को उनसे दूर रखना व्यावहारिक हो सकता था। कुछ वास्तु व्याख्याओं में पश्चिम या वायव्य क्षेत्र को शौचालय के लिए इसलिए बेहतर बताया गया है कि पश्चिमी धूप और हवा कमरे को अपेक्षाकृत जल्दी सुखाने में मदद कर सकती थी। हालांकि ऐसे तर्कों को ऐतिहासिक या डिजाइन-आधारित व्याख्या के रूप में देखना चाहिए, न कि आधुनिक वैज्ञानिक प्रमाण के रूप में। (Architecture Ideas)
यही वह बिंदु है जहां परंपरा और आधुनिक वास्तुकला एक-दूसरे से संवाद करती दिखाई देती हैं। आज घरों में पीने का पानी पाइपलाइन से आता है, सीवेज व्यवस्थित पाइपों से निकलता है और आधुनिक इमारतों में वेंटिलेशन के लिए खिड़कियों तथा एग्जॉस्ट सिस्टम का उपयोग होता है। इसलिए किसी दिशा को लेकर पारंपरिक मान्यता का सम्मान करते हुए भी वास्तविक स्वच्छता और इंजीनियरिंग आवश्यकताओं को प्राथमिकता देना जरूरी है।
क्या दिशा से ज्यादा महत्वपूर्ण है हवा?
व्यावहारिक दृष्टि से देखें तो शौचालय के लिए सबसे बड़ी चुनौती दिशा नहीं, बल्कि नमी और हवा का प्रबंधन है। बंद और नम बाथरूम में दुर्गंध, फफूंद और सतहों पर लगातार नमी जैसी समस्याएं पैदा हो सकती हैं। इसलिए बाथरूम की योजना में प्राकृतिक वेंटिलेशन संभव हो तो खिड़की और आवश्यकता के अनुसार यांत्रिक वेंटिलेशन यानी एग्जॉस्ट की व्यवस्था महत्वपूर्ण होती है।
भारत के National Building Code में भी भवन सेवाओं के अंतर्गत प्रकाश और प्राकृतिक वेंटिलेशन तथा प्लंबिंग सेवाओं के अंतर्गत जलापूर्ति, ड्रेनेज और सैनिटेशन को अलग-अलग महत्वपूर्ण विषयों के रूप में शामिल किया गया है। BIS के प्लंबिंग संबंधी मसौदा प्रावधानों में भी जल-शौचालय वाले कक्ष को उचित प्रकाश और वेंटिलेशन देने तथा प्लंबिंग प्रणाली को सुरक्षित और सेवा योग्य बनाए रखने पर जोर दिया गया है। (BIS)
इसका सीधा अर्थ है कि यदि पश्चिम दिशा में बना बाथरूम पूरी तरह बंद, अंधेरा और बिना हवा के है, तो केवल उसका वास्तु-अनुकूल स्थान उसे अच्छा बाथरूम नहीं बना देता। इसके विपरीत, किसी दूसरी दिशा में बना बाथरूम यदि स्थानीय नियमों के अनुरूप, अच्छी तरह हवादार, सूखा, साफ और तकनीकी रूप से सुरक्षित है, तो उसके वास्तविक उपयोग की गुणवत्ता अधिक महत्वपूर्ण हो सकती है।
बाथरूम और टॉयलेट एक ही चीज नहीं हैं
‘बाथरूम’ और ‘टॉयलेट’ शब्द अक्सर एक-दूसरे के स्थान पर इस्तेमाल होते हैं, लेकिन वास्तु और वास्तुकला दोनों के संदर्भ में इनके उपयोग अलग हो सकते हैं। बाथरूम मुख्यतः स्नान, हाथ-मुंह धोने और व्यक्तिगत स्वच्छता से जुड़ा स्थान है, जबकि टॉयलेट का मुख्य कार्य शौच और अपशिष्ट निष्कासन है। कई आधुनिक घरों में दोनों सुविधाएं एक ही कमरे में होती हैं, जबकि कुछ बड़े घरों में इन्हें अलग रखा जाता है।
इसी वजह से विभिन्न वास्तु स्रोतों में भी कभी ‘बाथरूम’ के लिए पूर्व या उत्तर की ओर और ‘टॉयलेट’ के लिए पश्चिम या वायव्य की ओर प्राथमिकता बताई जाती है। एक वास्तु स्रोत बाथरूम के लिए पूर्व और टॉयलेट के लिए वायव्य-पश्चिम के विकल्पों में अंतर करता है। (Homeli)
इस अंतर को समझना उपयोगी है, क्योंकि केवल कमरे का नाम देखकर दिशा निर्धारित करना पर्याप्त नहीं है। कमरे में शॉवर, वॉशबेसिन, WC, गीजर, खिड़की, एग्जॉस्ट और ड्रेनेज पाइप कहां होंगे—इन सभी को एक साथ देखकर योजना बनानी चाहिए।
सिर्फ दिशा नहीं, ड्रेनेज भी है निर्णायक
शौचालय की सफलता का सबसे व्यावहारिक आधार उसका ड्रेनेज सिस्टम है। पानी का निकास सही ढंग से न हो तो फर्श पर पानी जमा हो सकता है, सीलन बढ़ सकती है और समय के साथ बदबू या संरचनात्मक क्षति जैसी समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं। इसलिए बाथरूम के फर्श की ढलान, फ्लोर ट्रैप, पाइप का व्यास, सीवर कनेक्शन और पाइपों की उचित ढलान का डिजाइन किसी भी दिशा संबंधी विचार से कम महत्वपूर्ण नहीं है।
वास्तु साहित्य में जल-निकासी की दिशा को लेकर अलग-अलग सुझाव मिलते हैं, लेकिन आधुनिक भवन-निर्माण में वास्तविक पाइपलाइन नेटवर्क, साइट की ऊंचाई, नगरपालिका सीवर व्यवस्था और इंजीनियरिंग डिजाइन को प्राथमिकता देनी पड़ती है। BIS के प्लंबिंग प्रावधान भी ड्रेनेज सिस्टम की सुरक्षा, उचित रखरखाव और अपशिष्ट को सुरक्षित तरीके से निपटाने की आवश्यकता पर बल देते हैं। (Bureau of Indian Standards)
ईशान में बना टॉयलेट: डर नहीं, समझदारी जरूरी
यदि किसी पुराने घर या फ्लैट में पहले से उत्तर-पूर्व दिशा में टॉयलेट बना हुआ है, तो केवल वास्तु के डर से तुरंत तोड़फोड़ कर देना व्यावहारिक समाधान नहीं है। अपार्टमेंट में तो स्थान बदलना अक्सर संभव ही नहीं होता, क्योंकि पाइपलाइन और सीवर नेटवर्क सामूहिक संरचना से जुड़े होते हैं।
ऐसी स्थिति में पहला कदम होना चाहिए—कमरे की वास्तविक स्थिति का निरीक्षण। क्या वहां पर्याप्त वेंटिलेशन है? क्या नमी जमा होती है? क्या सीवर की दुर्गंध आती है? क्या पानी ठीक से निकलता है? क्या दीवारों में सीलन है? क्या फर्श सुरक्षित है? क्या बिजली के उपकरण सुरक्षित तरीके से लगाए गए हैं? इन प्रश्नों के उत्तर किसी भी तथाकथित ‘वास्तु दोष’ से अधिक व्यावहारिक महत्व रखते हैं।
वास्तु मान्यता का पालन करना परिवार की व्यक्तिगत पसंद हो सकती है, लेकिन उसे भय पैदा करने वाले दावों से नहीं जोड़ा जाना चाहिए। उदाहरण के लिए, यह कहना कि ईशान में शौचालय होने से निश्चित रूप से बीमारी, आर्थिक नुकसान या पारिवारिक संकट होगा—ऐसे दावों के लिए विश्वसनीय वैज्ञानिक प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं। यही कारण है कि वास्तु संबंधी सलाह को सांस्कृतिक और पारंपरिक मार्गदर्शन के रूप में समझना अधिक संतुलित दृष्टिकोण है।
दरवाजा, खिड़की और एग्जॉस्ट—छोटी चीजें, बड़ा असर
एक अच्छी तरह डिजाइन किए गए बाथरूम में हवा के आवागमन के लिए रास्ता होना चाहिए। खिड़की उपलब्ध हो तो उसे इस प्रकार रखना उपयोगी होता है कि कमरे में प्राकृतिक हवा और रोशनी आ सके। जहां प्राकृतिक वेंटिलेशन पर्याप्त न हो, वहां उचित क्षमता वाला एग्जॉस्ट सिस्टम मददगार हो सकता है।
वास्तु स्रोतों में भी बाथरूम में वेंटिलेशन और एग्जॉस्ट की आवश्यकता पर जोर मिलता है, हालांकि खिड़की या एग्जॉस्ट की बिल्कुल कौन-सी दिशा होनी चाहिए, इस पर अलग-अलग मत पाए जाते हैं। (GuruVastu)
दरवाजे की स्थिति भी उपयोगिता से जुड़ी है। उसे इस तरह रखना चाहिए कि कमरे का उपयोग आरामदायक हो, पर्याप्त गोपनीयता बनी रहे और दरवाजा WC या अन्य उपकरणों से टकराए नहीं। आधुनिक डिजाइन में accessibility यानी अलग-अलग आयु और क्षमता वाले लोगों के लिए सुविधाजनक उपयोग को भी महत्व दिया जाता है। BIS के प्रावधानों में भी शौचालय के दरवाजों और उपकरणों की उचित पहुंच तथा दिव्यांग व्यक्तियों के लिए आवश्यक स्थान पर विशेष ध्यान दिया गया है। (Bureau of Indian Standards)
क्या टॉयलेट सीट की दिशा भी उतनी ही महत्वपूर्ण है?
वास्तु संबंधी लोकप्रिय सलाह में अक्सर कहा जाता है कि WC इस प्रकार रखा जाए कि उसका उपयोग करते समय व्यक्ति का मुख उत्तर या दक्षिण की ओर हो। कई वास्तु स्रोत इस व्यवस्था को प्राथमिकता देते हैं। (VedicBirth)
हालांकि इसे भी वास्तु परंपरा की सलाह के रूप में ही समझना चाहिए। आधुनिक भवन-विज्ञान में WC की दिशा को स्वास्थ्य या आर्थिक परिणामों का निर्धारक मानने का कोई स्थापित वैज्ञानिक आधार नहीं है। व्यावहारिक रूप से अधिक महत्वपूर्ण है कि WC सुरक्षित दूरी पर हो, सफाई में आसानी हो, पानी का रिसाव न हो और पूरा सैनिटरी सिस्टम सही तरीके से जुड़ा हो।
यानी यदि वास्तु और इंजीनियरिंग दोनों को साथ लेकर चलना हो, तो WC की दिशा को जहां संभव हो वहां परंपरा के अनुरूप रखा जा सकता है, लेकिन इसके लिए पाइपलाइन की सुरक्षा या कमरे की उपयोगिता से समझौता नहीं किया जाना चाहिए।
रंग, सजावट और ‘उपाय’ के नाम पर क्या करें?
वास्तु से जुड़े इंटरनेट स्रोतों में हल्के रंग, नमक के कटोरे, पौधों या विभिन्न प्रतीकों जैसे कई उपाय बताए जाते हैं। लेकिन इन उपायों को वैज्ञानिक रूप से सिद्ध उपचार समझना उचित नहीं है। (Valid Vastu वास्तु शास्त्र)
बाथरूम के लिए रंग चुनते समय हल्के और साफ-सुथरे रंग कमरे को अधिक खुला और रोशन दिखा सकते हैं—यह डिजाइन का व्यावहारिक लाभ है। इसी तरह पौधे तभी रखने चाहिए जब वहां पर्याप्त रोशनी और उपयुक्त परिस्थितियां हों; केवल वास्तु के नाम पर ऐसा पौधा रखना उचित नहीं जो नम और कम रोशनी वाले कमरे में टिक ही न सके।
सबसे उपयोगी ‘उपाय’ अक्सर बेहद साधारण होते हैं—नियमित सफाई, सूखा फर्श, अच्छी हवा, सही ड्रेनेज, रिसाव की समय पर मरम्मत और पर्याप्त प्रकाश।
नई इमारत बनाते समय किस क्रम में सोचें?
नया घर बनाते समय सबसे संतुलित तरीका यह है कि पहले भूखंड और स्थानीय भवन नियमों के अनुसार पूरा प्लान तैयार किया जाए। इसके बाद प्लंबिंग और सीवर नेटवर्क की व्यवहारिक स्थिति देखी जाए। फिर प्राकृतिक रोशनी और हवा की संभावनाओं का अध्ययन किया जाए। इन सभी आवश्यकताओं के बाद, यदि परिवार वास्तु को महत्व देता है, तो पश्चिम या वायव्य दिशा में शौचालय रखने की पारंपरिक प्राथमिकता को योजना में शामिल किया जा सकता है।
इस तरह वास्तु और आधुनिक वास्तुकला एक-दूसरे के विरोधी नहीं रहते। एक ओर परिवार की सांस्कृतिक मान्यताओं का सम्मान होता है, दूसरी ओर भवन की वास्तविक तकनीकी आवश्यकताएं भी पूरी होती हैं।
अपार्टमेंट में वास्तु का सवाल थोड़ा अलग है
बहुमंजिला अपार्टमेंट में किसी कमरे की दिशा बदलना स्वतंत्र मकान की तुलना में कहीं अधिक जटिल होता है। शौचालय की जगह केवल दीवार हटाकर नहीं बदली जा सकती, क्योंकि नीचे-ऊपर की मंजिलों की पाइपलाइन, वेंट पाइप, सीवर लाइन और संरचनात्मक व्यवस्था उससे जुड़ी होती है।
इसलिए तैयार फ्लैट खरीदते या किराये पर लेते समय यदि टॉयलेट उत्तर-पूर्व में है, तो केवल दिशा देखकर फैसला करने के बजाय पूरी स्थिति का मूल्यांकन करना बेहतर है। पानी का दबाव, सीवर कनेक्शन, वेंटिलेशन, रिसाव, नमी, प्रकाश, सफाई और भवन की रखरखाव व्यवस्था को भी जांचना चाहिए।
वास्तु मान्यता महत्वपूर्ण हो सकती है, लेकिन घर की वास्तविक गुणवत्ता उन चीजों से बनती है जिनका सामना परिवार रोज करता है।
दिशा का सम्मान, लेकिन विज्ञान से समझौता नही
शौचालय और बाथरूम की दिशा को लेकर ‘पश्चिम या उत्तर-पश्चिम में बनाएं और उत्तर-पूर्व में न बनाएं’ वाली सलाह भारतीय वास्तु परंपरा में व्यापक रूप से प्रचलित है। कई समकालीन वास्तु स्रोत भी इसी दिशा-क्रम को प्राथमिकता देते हैं। (Homeli)
लेकिन एक तथ्यात्मक दृष्टिकोण यह भी स्पष्ट करता है कि वास्तु की दिशाओं से जुड़े शुभ-अशुभ परिणामों को आधुनिक वैज्ञानिक भवन-विज्ञान के प्रमाणित नियम के रूप में प्रस्तुत नहीं किया जाना चाहिए। इसके विपरीत, उचित वेंटिलेशन, पर्याप्त प्रकाश, सुरक्षित प्लंबिंग, प्रभावी ड्रेनेज, स्वच्छता, नमी नियंत्रण, accessibility और संरचनात्मक सुरक्षा वास्तविक और प्रमाणित भवन-आवश्यकताएं हैं। भारत का National Building Code भी भवन सेवाओं और सैनिटेशन को इसी व्यापक तकनीकी दृष्टिकोण से देखता है। (BIS)
इसलिए यदि नया घर बनाया जा रहा है और परिवार वास्तु मान्यताओं का पालन करना चाहता है, तो पश्चिम या वायव्य में शौचालय रखने की परंपरागत सलाह को डिजाइन का एक विचार बनाया जा सकता है। उत्तर-पूर्व को खाली रखने की इच्छा भी वास्तु परंपरा के अनुरूप हो सकती है। लेकिन अंतिम नक्शा बनाते समय इंजीनियरिंग, स्वच्छता, हवा, रोशनी, जल-निकासी और स्थानीय भवन नियमों को पीछे नहीं छोड़ा जाना चाहिए।
आखिरकार अच्छा बाथरूम वह नहीं है जिसकी दिशा केवल किसी कम्पास से सही निकलती हो; अच्छा बाथरूम वह है जो साफ हो, सूखा रहे, पर्याप्त रोशनी और हवा पाए, पानी और अपशिष्ट को सुरक्षित ढंग से बाहर ले जाए और वर्षों तक बिना परेशानी के इस्तेमाल किया जा सके। वास्तु को अपनाना हो तो उसे समझदारी के साथ अपनाना बेहतर है—विश्वास अपनी जगह, लेकिन सुरक्षित और स्वस्थ घर की बुनियाद हमेशा ठोस वास्तुकला और सही इंजीनियरिंग पर ही टिकती है।






