
संवाद 24 डेस्क। आंखों की रोशनी केवल रेटिना या ऑप्टिक नर्व पर निर्भर नहीं करती। आंख के सामने मौजूद पारदर्शी ऊतक कॉर्निया भी दृष्टि की प्रक्रिया में अहम भूमिका निभाता है। जब चोट, संक्रमण, बीमारी या किसी अन्य कारण से कॉर्निया में गंभीर क्षति या धुंधलापन आ जाता है, तो प्रकाश ठीक तरह से आंख के भीतर नहीं पहुंच पाता और दृष्टि कमजोर हो सकती है। गंभीर मामलों में इसे कॉर्नियल ब्लाइंडनेस कहा जाता है। भारत में इस समस्या का एक बड़ा उपचार-आधारित संकट दाता कॉर्निया की उपलब्धता से जुड़ा है। 2026 की एक समीक्षा में भारत में लगभग 12 लाख लोगों के कॉर्नियल ब्लाइंडनेस से प्रभावित होने और हर वर्ष 25,000-30,000 नए मामलों का अनुमान दिया गया है।
परंपरागत रूप से गंभीर कॉर्नियल बीमारी में स्वस्थ दाता की कॉर्नियल टिश्यू से प्रत्यारोपण किया जाता है। लेकिन मांग और उपलब्धता के बीच अंतर के कारण हर जरूरतमंद मरीज को समय पर दाता कॉर्निया मिलना आसान नहीं है। यही वह चुनौती है, जिसने वैज्ञानिकों को कृत्रिम और बायोइंजीनियर्ड कॉर्निया जैसे विकल्प विकसित करने की दिशा में आगे बढ़ाया है।
AIIMS में कृत्रिम कॉर्निया पर क्यों टिकी हैं उम्मीदें?
दिल्ली स्थित एम्स के डॉ. राजेंद्र प्रसाद सेंटर फॉर ऑप्थैल्मिक साइंसेज में कॉर्नियल उपचार और ट्रांसप्लांट से जुड़ा शोध लंबे समय से चल रहा है। वर्ष 2016 से AIIMS में बायोइंजीनियर्ड कॉर्निया पर अध्ययन शुरू किया गया था। 2022 की रिपोर्ट के अनुसार 2016 से 2018 के बीच 10 मरीजों में इसका प्रत्यारोपण किया गया और 2021 में 17 अन्य मरीजों में इसका इस्तेमाल किया गया था। रिपोर्ट में बताया गया था कि इन मरीजों में दृष्टि में सुधार देखा गया और प्रत्यारोपित कॉर्निया के रिजेक्शन की समस्या सामने नहीं आई।
हालांकि, इस उपलब्धि को समझते समय यह अंतर जरूरी है कि कृत्रिम या बायोइंजीनियर्ड कॉर्निया हर प्रकार के कॉर्नियल अंधत्व का सार्वभौमिक इलाज नहीं है। मरीज की बीमारी, कॉर्निया की कितनी परतें प्रभावित हैं, आंख की दूसरी संरचनाओं की स्थिति और पहले हुए उपचार जैसे कई कारकों के आधार पर विशेषज्ञ उपचार का विकल्प तय करते हैं।
क्या यह तकनीक सचमुच डोनर की जरूरत खत्म कर देगी?
यही इस तकनीक की सबसे बड़ी उम्मीद है, लेकिन फिलहाल इसे पूरी तरह डोनर कॉर्निया का विकल्प कहना जल्दबाजी होगी।
2025 में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार AIIMS और IIT दिल्ली की संयुक्त टीम ने ऐसे बायोइंजीनियर्ड कॉर्निया पर काम किया, जिसमें सामान्यतः प्रत्यारोपण के लिए अनुपयुक्त माने जाने वाले दाता कॉर्निया के ऊतक को उपयोगी बनाने की कोशिश की गई। शोधकर्ताओं ने जानवरों पर परीक्षण के बाद AIIMS में क्लिनिकल ट्रायल की दिशा में कदम बढ़ाया। इस तकनीक का उद्देश्य उपलब्ध दाता ऊतक के उपयोग को बढ़ाना और कॉर्नियल ट्रांसप्लांट के लिए प्रतीक्षा कर रहे मरीजों की समस्या कम करना है।
इसलिए वर्तमान स्थिति को ‘डोनर कॉर्निया की जरूरत हमेशा के लिए खत्म’ होने के बजाय दाता ऊतक की कमी को कम करने की दिशा में महत्वपूर्ण शोध कहना ज्यादा तथ्यात्मक होगा।
बायोइंजीनियर्ड कॉर्निया आखिर होता क्या है?
बायोइंजीनियर्ड कॉर्निया सामान्य अर्थ में प्लास्टिक का बना कोई कृत्रिम लेंस नहीं है। आधुनिक तकनीकों में जैविक ऊतक या बायोकम्पैटिबल सामग्री को इस तरह तैयार किया जाता है कि वह आंख के क्षतिग्रस्त हिस्से को संरचनात्मक सहारा दे सके।
AIIMS और IIT दिल्ली से जुड़ी हालिया तकनीक में ऐसे कॉर्नियल ऊतक पर काम किया गया जिसे सामान्य प्रत्यारोपण के लिए उपयुक्त नहीं माना जाता था। शोधकर्ताओं ने उससे कोशिकाओं और संक्रमण संबंधी जोखिमों को हटाकर एक साफ जैविक स्कैफोल्ड तैयार करने की दिशा में काम किया, जिसे मरीज की आंख में कॉर्निया की क्षतिग्रस्त संरचना को सहारा देने के लिए इस्तेमाल किया जा सके। रिपोर्ट के अनुसार यह तकनीक खास तौर पर आंशिक कॉर्नियल स्कारिंग या पतले हुए कॉर्निया वाले कुछ मरीजों के लिए उपयोगी हो सकती है।
यहां ‘कुछ मरीज’ शब्द महत्वपूर्ण है, क्योंकि प्रत्येक कॉर्नियल रोगी इस तकनीक के लिए उपयुक्त हो, ऐसा मानना सही नहीं होगा।
कॉर्निया की कितनी परतें प्रभावित होने पर इलाज मुश्किल हो जाता है?
कॉर्निया एक बहुस्तरीय संरचना है। 2022 में AIIMS से जुड़ी रिपोर्ट में बताया गया था कि उस समय इस्तेमाल किए जा रहे बायोइंजीनियर्ड कॉर्निया से कॉर्निया की छह में से पांच परतों से जुड़े नुकसान को कवर करने की क्षमता पर काम किया जा रहा था, जबकि सबसे पीछे की परत से संबंधित गंभीर क्षति में इसकी उपयोगिता का परीक्षण जारी था।
वर्तमान चिकित्सा विज्ञान में कॉर्नियल बीमारी के कई प्रकार हैं। किसी व्यक्ति की दृष्टि केवल कॉर्निया पर निर्भर नहीं होती; रेटिना, ऑप्टिक नर्व और आंख की अन्य संरचनाओं की स्थिति भी महत्वपूर्ण होती है। इसलिए यदि कॉर्निया में उपचार संभव हो भी जाए, तो हर मरीज में सामान्य दृष्टि लौटने की गारंटी नहीं दी जा सकती।
2025 में AIIMS की नई दिशा ने क्यों बढ़ाई उम्मीद?
AIIMS से जुड़ी 2025 की रिपोर्ट इस क्षेत्र में एक और महत्वपूर्ण बदलाव की ओर इशारा करती है। शोधकर्ताओं ने ऐसे दाता कॉर्निया को उपयोगी बनाने का प्रयास किया, जिन्हें सामान्य प्रत्यारोपण के लिए अनुपयुक्त मानकर छोड़ दिया जाता था। इस तरह की तकनीक सफल होती है तो इसका लाभ केवल एक नए कृत्रिम विकल्प के रूप में नहीं, बल्कि मौजूदा डोनर संसाधनों के बेहतर इस्तेमाल के रूप में भी मिल सकता है।
यह पहल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत में कॉर्नियल ट्रांसप्लांट की जरूरत और उपलब्ध दाता ऊतक के बीच अंतर लंबे समय से चिकित्सा क्षेत्र की चुनौती रहा है। AIIMS में राष्ट्रीय स्तर पर आई बैंकिंग और कॉर्नियल ट्रांसप्लांट से जुड़ी विशेषज्ञता भी विकसित हुई है। 2017 में AIIMS में हुई राष्ट्रीय विशेषज्ञ समूह की बैठक में भारत में आई बैंकिंग और कॉर्नियल ब्लाइंडनेस कम करने के लिए क्षमता निर्माण, प्रशिक्षण और नेटवर्किंग से जुड़े सुझाव दिए गए थे।
कृत्रिम कॉर्निया की कीमत कितनी है?
कृत्रिम कॉर्निया की कीमत का एक ही आंकड़ा बताना भ्रामक हो सकता है, क्योंकि ‘आर्टिफिशियल कॉर्निया’ कई अलग-अलग तकनीकों और उपकरणों को संदर्भित कर सकता है। लागत मरीज की बीमारी, इस्तेमाल होने वाले इम्प्लांट, अस्पताल, सर्जरी की प्रकृति, जांच और ऑपरेशन के बाद की देखभाल पर निर्भर करती है।
एक पुराने भारतीय उदाहरण में लैब-निर्मित कॉर्निया की कीमत करीब 15,000 रुपये और प्रत्यारोपण सर्जरी की लागत करीब 25,000 रुपये बताई गई थी। लेकिन इसे AIIMS की मौजूदा कीमत या आज की सार्वभौमिक लागत नहीं माना जाना चाहिए।
वर्तमान में किसी मरीज को उपचार की वास्तविक लागत जानने के लिए संबंधित अस्पताल के कॉर्निया विशेषज्ञ से जांच के बाद अनुमान लेना जरूरी है। खासकर AIIMS से जुड़ी शोध तकनीक और सामान्य बाजार में उपलब्ध कृत्रिम कॉर्निया को एक ही उत्पाद मानना उचित नहीं है।
क्या हर कॉर्नियल ब्लाइंड मरीज को कृत्रिम कॉर्निया लगाया जा सकता है?
नहीं। यह सबसे जरूरी सावधानी है।
कृत्रिम कॉर्निया या केराटोप्रोस्थेसिस आम तौर पर उन जटिल मामलों में विचार किया जाता है जहां सामान्य दाता कॉर्निया प्रत्यारोपण सफल होने की संभावना कम हो या पहले के प्रत्यारोपण विफल हो चुके हों। वर्तमान चिकित्सा साहित्य में सिंथेटिक कॉर्निया के कई प्रकारों का वर्णन है और इन्हें विशेष परिस्थितियों में इस्तेमाल किया जाता है।
इसके अलावा बायोइंजीनियर्ड कॉर्निया और पारंपरिक केराटोप्रोस्थेसिस को भी एक ही तकनीक नहीं समझना चाहिए। दोनों का डिजाइन, सामग्री, उपयोग और मरीज के चयन के मानदंड अलग हो सकते हैं।
आंखों की रोशनी के लिए आंखों का दान फिर भी क्यों जरूरी है?
कृत्रिम और बायोइंजीनियर्ड कॉर्निया पर शोध तेजी से आगे बढ़ रहा है, लेकिन इससे आंखों के दान का महत्व खत्म नहीं होता। भारत में कॉर्नियल ब्लाइंडनेस से निपटने के लिए आई बैंक और दाता कॉर्निया अभी भी बेहद महत्वपूर्ण हैं।
2026 की समीक्षा के अनुसार भारत में कॉर्नियल ब्लाइंडनेस का बड़ा बोझ है और दाता कॉर्निया की उपलब्धता बढ़ाना अब भी महत्वपूर्ण सार्वजनिक स्वास्थ्य लक्ष्य है। समीक्षा में आई बैंकिंग व्यवस्था को मजबूत करने, प्रशिक्षण बढ़ाने और दाता ऊतक की उपलब्धता बेहतर करने की जरूरत पर जोर दिया गया है।
इसलिए नई तकनीक को आंखों के दान का विकल्प नहीं, बल्कि एक अतिरिक्त उम्मीद और संभावित पूरक समाधान के रूप में देखना अधिक उचित है।
उम्मीद बड़ी है, लेकिन इलाज को लेकर जल्दबाजी नहीं
AIIMS में कृत्रिम और बायोइंजीनियर्ड कॉर्निया पर हुए शोध ने उन मरीजों के लिए नई उम्मीद जरूर जगाई है जो दाता कॉर्निया की कमी के कारण उपचार की प्रतीक्षा करते हैं। पुराने AIIMS अध्ययन में मरीजों में दृष्टि सुधार की रिपोर्ट मिली थी, जबकि हाल के AIIMS-IIT दिल्ली शोध में अनुपयोगी माने जाने वाले दाता ऊतक को उपयोगी जैविक स्कैफोल्ड में बदलने की दिशा में काम आगे बढ़ा है।
लेकिन अभी यह कहना सही नहीं होगा कि कृत्रिम कॉर्निया हर तरह के अंधेपन को ठीक कर देगा या सभी मरीजों को बिना डोनर के दृष्टि मिल जाएगी। कई तकनीकें अभी शोध और क्लिनिकल मूल्यांकन के चरण में हैं। मरीज के लिए उपचार का फैसला केवल कॉर्निया विशेषज्ञ की जांच के बाद ही किया जाना चाहिए।
फिर भी इस शोध की सबसे बड़ी उपलब्धि यही है कि जिस आंख की रोशनी कभी दाता कॉर्निया की उपलब्धता पर निर्भर थी, उसके लिए विज्ञान अब वैकल्पिक रास्ते तलाश रहा है। आने वाले वर्षों में यदि इन तकनीकों की सुरक्षा, प्रभावशीलता और लंबे समय के परिणाम मजबूत साबित होते हैं, तो कॉर्नियल ब्लाइंडनेस के इलाज की तस्वीर बदल सकती है।






