Smart Label: स्मार्टफोन से कुछ सेकंड में पकड़ा जाएगा नकली सामान! नई एंटी-काउंटरफिट तकनीक ऐसे करेगी असली-नकली की पहचान

संवाद 24 डेस्क। बाजार में नकली उत्पादों की समस्या लगातार गंभीर होती जा रही है। पैकेजिंग, लोगो और डिजाइन की नकल इतनी बारीकी से की जा रही है कि सामान्य ग्राहक के लिए कई बार असली और नकली सामान के बीच अंतर करना आसान नहीं होता। ऐसे में नई तकनीक उपभोक्ताओं के लिए बड़ी राहत बन सकती है। शोधकर्ताओं ने एक स्मार्ट एंटी-काउंटरफिट सिस्टम विकसित किया है, जिसमें विशेष तरह के रिस्पॉन्सिव लेबल और स्मार्टफोन आधारित डिटेक्शन तकनीक का इस्तेमाल किया जाता है। दावा है कि इस प्रणाली की मदद से किसी उत्पाद की प्रामाणिकता की जांच के लिए महंगे और विशेष उपकरणों पर निर्भरता कम की जा सकती है।
इस नई तकनीक की खासियत यह है कि उत्पाद पर लगाए गए सुरक्षा लेबल को स्मार्टफोन आधारित पोर्टेबल डिटेक्टर से जांचा जा सकता है। सिस्टम लेबल के प्रकाश और तापमान के प्रति व्यवहार से बनने वाले ऑप्टिकल सिग्नेचर को रिकॉर्ड करता है और फिर मशीन लर्निंग मॉडल उस जानकारी का विश्लेषण करके वास्तविक और नकली लेबल में अंतर करने की कोशिश करता है।

साधारण लेबल नहीं, स्मार्ट तकनीक से लैस होगा सुरक्षा टैग
नई प्रणाली में इस्तेमाल होने वाला लेबल सामान्य प्रिंटेड स्टिकर से अलग है। शोध में तापमान और प्रकाश के प्रति प्रतिक्रिया देने वाली माइक्रोकैप्सूल संरचना विकसित की गई है। इन माइक्रोकैप्सूल को UV इंक आधारित प्रिंटिंग प्रक्रिया के साथ जोड़ा गया है, जिससे बाहरी परिस्थितियों के प्रभाव में लेबल एक विशिष्ट ऑप्टिकल प्रतिक्रिया उत्पन्न कर सकता है।
शोध-पत्र के अनुसार, इसमें दोहरे कक्ष वाली माइक्रोकैप्सूल संरचना और नैनो-इंटरफेस क्रॉसलिंकिंग एजेंट का इस्तेमाल किया गया है। इसका उद्देश्य लेबल की स्थिरता और उसकी प्रतिक्रिया को बेहतर बनाना है, ताकि वह वास्तविक सप्लाई चेन परिस्थितियों में भी उपयोगी बना रहे। शोधकर्ताओं ने UV इंक की प्रिंटिंग क्षमता को भी इस तरह अनुकूलित किया कि तकनीक को हाई-स्पीड स्क्रीन और इंकजेट प्रिंटिंग जैसी प्रक्रियाओं के साथ इस्तेमाल किया जा सके।

रोशनी पड़ते ही बनेगा अलग ऑप्टिकल सिग्नेचर
इस तकनीक का सबसे दिलचस्प हिस्सा लेबल की प्रकाश और तापमान के प्रति प्रतिक्रिया है। सामान्य प्रिंट की हूबहू नकल करना अपेक्षाकृत आसान हो सकता है, लेकिन किसी विशेष सामग्री के माइक्रोस्ट्रक्चर और उसके प्रकाश के साथ बदलते व्यवहार को दोहराना काफी कठिन होता है। इसी विशेषता का इस्तेमाल एंटी-काउंटरफिट सुरक्षा में किया जा रहा है।
लेबल पर प्रकाश डालने के बाद उससे मिलने वाले संकेतों को स्मार्टफोन आधारित पोर्टेबल डिटेक्टर रिकॉर्ड करता है। इसके बाद प्राप्त डेटा को मशीन लर्निंग मॉडल के जरिए प्रोसेस किया जाता है। यानी सिस्टम केवल यह नहीं देखता कि लेबल कैसा दिखाई दे रहा है, बल्कि यह भी जांचता है कि निर्धारित परिस्थितियों में वह किस तरह प्रतिक्रिया कर रहा है। यही प्रक्रिया नकली लेबल की पहचान को अधिक कठिन बनाने वाली तकनीक का आधार है।

मशीन लर्निंग बताएगी लेबल असली है या नकली
नई तकनीक में स्मार्टफोन आधारित स्पेक्ट्रल सेंसिंग और मशीन लर्निंग का इस्तेमाल किया गया है। शोध-पत्र में पोर्टेबल डिटेक्शन टर्मिनल के लिए SVM-CNN यानी Support Vector Machine और Convolutional Neural Network आधारित मॉडल का उल्लेख किया गया है। यह मॉडल लेबल से प्राप्त सिग्नल का विश्लेषण कर उसकी प्रामाणिकता का वर्गीकरण करता है।
अमर उजाला की रिपोर्ट के अनुसार, परीक्षण के दौरान इस प्रणाली ने वास्तविक और उच्च गुणवत्ता वाले नकली जैसे लेबल के बीच अंतर करने में 97 प्रतिशत से अधिक सटीकता हासिल की। शोध-पत्र में पांच स्तरों वाली उच्च गुणवत्ता की नकली लेबल पहचान के लिए 97.5 प्रतिशत सटीकता दर्ज की गई है। हालांकि इसे व्यापक बाजार में हर प्रकार के नकली उत्पाद की गारंटी के रूप में नहीं समझना चाहिए; वास्तविक परिस्थितियों में प्रदर्शन उत्पाद, लेबल, कैमरा और परीक्षण परिस्थितियों के अनुसार बदल सकता है।

लेबल को मजबूत बनाने के लिए नैनो तकनीक का इस्तेमाल
एंटी-काउंटरफिट लेबल के लिए केवल सुरक्षा संकेत पर्याप्त नहीं हैं। यदि लेबल नमी, गर्मी, कंपन या लंबी सप्लाई चेन के दौरान खराब हो जाए तो उसकी प्रामाणिकता जांचने वाली प्रणाली भी कमजोर पड़ सकती है। इसी चुनौती को ध्यान में रखते हुए शोध में नैनो-इंटरफेस क्रॉसलिंकिंग एजेंट के माध्यम से पॉलिमर नेटवर्क की मजबूती बढ़ाने पर काम किया गया है।
शोध में किए गए परीक्षणों में ठंडी श्रृंखला यानी cold-chain परिस्थितियों के पांच चक्रों के बाद रंग प्रतिधारण दर 83.33 प्रतिशत बताई गई है। 48 घंटे की यांत्रिक कंपन परीक्षण में फ्रैक्चर दर केवल 2 प्रतिशत दर्ज की गई। ये परिणाम संकेत देते हैं कि शोधकर्ताओं ने केवल प्रयोगशाला में पहचान क्षमता पर ही नहीं, बल्कि लेबल की टिकाऊपन और प्रिंटिंग संबंधी व्यावहारिक चुनौतियों पर भी ध्यान दिया है।

QR कोड और होलोग्राम से कितना अलग है यह सिस्टम?
आज बाजार में उत्पाद की प्रामाणिकता जांचने के लिए QR कोड, बारकोड, होलोग्राम, RFID और दूसरे सुरक्षा उपायों का इस्तेमाल होता है। इन तकनीकों की अपनी उपयोगिता है, लेकिन कुछ प्रणालियों में विशेष रीडर या सर्वर आधारित सत्यापन की जरूरत हो सकती है। यूरोपीय संघ की एंटी-काउंटरफिट तकनीक संबंधी गाइड में भी मोबाइल कैमरे से स्कैन किए जा सकने वाले copy-detection patterns और 2D कोड आधारित सुरक्षा तकनीकों का उल्लेख किया गया है।
नई तकनीक का फोकस एक ऐसे स्मार्ट लेबल पर है जिसकी विशिष्ट भौतिक-ऑप्टिकल प्रतिक्रिया को स्मार्टफोन आधारित सिस्टम रिकॉर्ड कर सके। इसका संभावित लाभ यह है कि ग्राहक के पास मौजूद सामान्य स्मार्टफोन को ही सत्यापन प्रक्रिया का हिस्सा बनाया जा सकता है। हालांकि इस प्रणाली को QR कोड या RFID का तत्काल पूर्ण विकल्प कहना अभी जल्दबाजी होगी, क्योंकि बड़े पैमाने पर तैनाती, लागत, मानकीकरण और विभिन्न उत्पादों पर परीक्षण जैसी चुनौतियां महत्वपूर्ण रहेंगी।

नकली दवाओं से लेकर महंगे सामान तक हो सकता है इस्तेमाल
एंटी-काउंटरफिट तकनीक की जरूरत केवल लक्जरी उत्पादों तक सीमित नहीं है। नकली दवाएं, खाद्य पदार्थ, कॉस्मेटिक्स, इलेक्ट्रॉनिक्स और दूसरे उपभोक्ता उत्पाद सीधे ग्राहक की सुरक्षा और स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकते हैं। पहले भी स्मार्टफोन कैमरे के जरिए नकली उत्पाद पहचानने वाली तकनीकों पर शोध हो चुका है। उदाहरण के लिए, एक कंप्यूटर-विजन आधारित अध्ययन में स्मार्टफोन से ली गई तस्वीरों का इस्तेमाल कर नकली उत्पादों की पहचान करने की संभावना दिखाई गई थी।
कुछ अन्य शोधों में तो बिना बोतल खोले स्मार्टफोन कैमरे से तरल खाद्य पदार्थों में मिलावट या नकली उत्पाद की पहचान करने की तकनीक भी विकसित की गई है। LiquidHash नामक प्रणाली ने बोतल के भीतर बनने वाले हवा के बुलबुलों की गति और आकार का विश्लेषण करके नकली तरल उत्पादों की पहचान का तरीका प्रस्तुत किया था।
इन उदाहरणों से स्पष्ट है कि स्मार्टफोन को केवल संचार और इंटरनेट का उपकरण मानने के बजाय भविष्य में उसे पोर्टेबल सत्यापन उपकरण के रूप में भी इस्तेमाल किया जा सकता है।

कंपनियों और ग्राहकों दोनों के लिए बदल सकता है खेल
यदि ऐसी तकनीक बड़े पैमाने पर व्यावसायिक रूप से लागू होती है, तो इसका फायदा केवल उपभोक्ताओं को ही नहीं बल्कि निर्माताओं और रिटेलर्स को भी मिल सकता है। किसी उत्पाद की सप्लाई चेन में अलग-अलग स्तरों पर उसकी प्रामाणिकता जांची जा सके तो नकली सामान के बाजार में पहुंचने से पहले ही उसकी पहचान की संभावना बढ़ सकती है। स्मार्टफोन आधारित सत्यापन से महंगे समर्पित उपकरणों पर निर्भरता भी कम हो सकती है।
ब्रांड सुरक्षा के क्षेत्र में पहले से ही ऐसी तकनीकों पर काम हो रहा है, जिनमें उत्पाद या पैकेजिंग की सूक्ष्म विशेषताओं को डिजिटल तरीके से सत्यापित किया जाता है। नए शोध का महत्व इस बात में है कि इसमें responsive printing materials, माइक्रोकैप्सूल और मशीन लर्निंग आधारित स्मार्टफोन डिटेक्शन को एक ही सिस्टम में जोड़ने का प्रयास किया गया है।

क्या हर ग्राहक तुरंत इस तकनीक का इस्तेमाल कर सकेगा?
यह सवाल सबसे महत्वपूर्ण है। किसी शोध में सफल परीक्षण और बाजार में आम उपभोक्ता के लिए उपलब्ध तकनीक, दोनों अलग बातें हैं। मौजूदा शोध में पोर्टेबल डिटेक्शन टर्मिनल और मशीन लर्निंग मॉडल का इस्तेमाल किया गया है। इसलिए वास्तविक उपभोक्ता उपयोग के लिए एक सरल ऐप, कैमरा आधारित इंटरफेस, डेटाबेस या क्लाउड सत्यापन व्यवस्था और बड़े पैमाने पर उत्पाद-विशिष्ट मॉडल विकसित करने की आवश्यकता हो सकती है।
इसके अलावा अलग-अलग स्मार्टफोन कैमरों में सेंसर क्षमता, लेंस, एक्सपोजर और सॉफ्टवेयर प्रोसेसिंग अलग होती है। इसलिए प्रयोगशाला में हासिल सटीकता को हर मोबाइल और हर रोशनी की स्थिति में समान मानना उचित नहीं होगा। इस तकनीक के व्यापक इस्तेमाल से पहले विभिन्न ब्रांडों, पैकेजिंग सामग्रियों और वास्तविक बाजार परिस्थितियों में स्वतंत्र परीक्षण महत्वपूर्ण होंगे।

भारत में भी मोबाइल आधारित प्रामाणिकता जांच का महत्व बढ़ रहा
भारत में भी मोबाइल और डिजिटल माध्यमों से उत्पाद या डिवाइस की प्रामाणिकता जांचने की दिशा में पहले से प्रयास हो रहे हैं। उदाहरण के लिए, दूरसंचार विभाग की Know Your Mobile (KYM) सुविधा के जरिए ग्राहक IMEI नंबर की मदद से मोबाइल डिवाइस की वैधता जांच सकते हैं। सरकार के अनुसार IMEI को फोन में *#06# डायल करके या पैकेजिंग और बिल से प्राप्त किया जा सकता है। यदि IMEI ब्लैकलिस्टेड, डुप्लीकेट या पहले से उपयोग में पाया जाए तो ऐसे डिवाइस से बचने की सलाह दी जाती है।
इसी तरह भारतीय मानक ब्यूरो यानी BIS के BIS Care App में लाइसेंस विवरण और हॉलमार्क वाले आभूषण के HUID की प्रामाणिकता जांचने जैसी सुविधाएं मौजूद हैं। इससे पता चलता है कि स्मार्टफोन आधारित सत्यापन धीरे-धीरे उपभोक्ता सुरक्षा के महत्वपूर्ण डिजिटल उपकरणों में शामिल हो रहा है।

तकनीक सफल हुई तो नकली सामान के खिलाफ बढ़ेगी उपभोक्ता की ताकत
नकली उत्पादों की सबसे बड़ी चुनौती यही है कि उपभोक्ता खरीदारी के समय हमेशा किसी विशेषज्ञ या विशेष उपकरण की मदद नहीं ले सकता। यदि भविष्य में स्मार्टफोन कैमरे और एक साधारण एप्लिकेशन की मदद से किसी पैकेजिंग के सुरक्षा लेबल की विश्वसनीय जांच संभव होती है, तो उपभोक्ता के हाथ में एक अतिरिक्त सुरक्षा उपकरण आ सकता है।
हालांकि ऐसी तकनीक को लेकर उत्साह के साथ सावधानी भी जरूरी है। किसी एक डिजिटल संकेत या लेबल को देखकर उत्पाद को स्वतः सुरक्षित मान लेना उचित नहीं होगा। नकली उत्पाद बनाने वाले भी समय के साथ नई तकनीकों की नकल करने की कोशिश कर सकते हैं। इसलिए बहु-स्तरीय सुरक्षा, सुरक्षित डेटाबेस, नियमित अपडेट और सप्लाई चेन ट्रैकिंग जैसे उपाय भविष्य में भी जरूरी रहेंगे। QR कोड और एंटी-काउंटरफिट मार्किंग की नकल को लेकर शोध भी यह दिखाता है कि केवल एक सुरक्षा फीचर पर निर्भर रहना जोखिमपूर्ण हो सकता है।

कैमरा बनेगा भरोसे का नया डिजिटल पहरेदार?
स्मार्टफोन आधारित यह एंटी-काउंटरफिट तकनीक इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें स्मार्ट सामग्री, रिस्पॉन्सिव माइक्रोकैप्सूल, UV प्रिंटिंग, स्पेक्ट्रल सेंसिंग और मशीन लर्निंग जैसी कई तकनीकों को एक साथ जोड़ने का प्रयास किया गया है। शोध में 97.5 प्रतिशत तक पहचान सटीकता और लेबल की स्थिरता से जुड़े सकारात्मक परिणाम सामने आए हैं।
यदि इसे बड़े पैमाने पर व्यावसायिक उत्पादन और उपभोक्ता उपयोग के लिए सफलतापूर्वक विकसित किया जाता है, तो आने वाले समय में ग्राहक किसी महंगे उपकरण के बजाय अपने स्मार्टफोन से ही उत्पाद की प्रामाणिकता जांचने की स्थिति में आ सकते हैं। फिलहाल इसे एक उभरती हुई तकनीक के रूप में देखना उचित होगा, जिसके व्यापक बाजार उपयोग के लिए और अधिक वास्तविक परिस्थितियों में परीक्षण तथा मानकीकरण की जरूरत होगी।
नकली सामान की पहचान के लिए तकनीक की यह दौड़ अब केवल होलोग्राम या QR कोड तक सीमित नहीं रह गई है। आने वाले समय में किसी उत्पाद की असलियत उसके लेबल के उस सूक्ष्म व्यवहार में छिपी हो सकती है, जिसे इंसानी आंख नहीं देख पाएगी, लेकिन आपका स्मार्टफोन पहचान लेगा।

Geeta Singh
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