
संवाद 24 डेस्क। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में 8 अगस्त 1942 की तारीख एक निर्णायक मोड़ के रूप में दर्ज है। द्वितीय विश्व युद्ध के बीच मुंबई के तत्कालीन गोवालिया टैंक मैदान में अखिल भारतीय कांग्रेस समिति के अधिवेशन में भारत छोड़ो आंदोलन का प्रस्ताव पारित हुआ। महात्मा गांधी ने अंग्रेजी शासन के खिलाफ निर्णायक संघर्ष का आह्वान करते हुए देशवासियों को ‘करो या मरो’ का संदेश दिया। इसी कारण भारत छोड़ो आंदोलन को अगस्त क्रांति के नाम से भी जाना जाता है। आज गोवालिया टैंक मैदान को अगस्त क्रांति मैदान के नाम से जाना जाता है। भारत सरकार के आजादी का अमृत महोत्सव अभिलेख के अनुसार, आंदोलन का उद्देश्य भारत से ब्रिटिश शासन की समाप्ति और सत्ता के शांतिपूर्ण हस्तांतरण की मांग करना था।
भारत छोड़ो आंदोलन की 84वीं वर्षगांठ के अवसर पर 2026 में भी यह आंदोलन इतिहास और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले विद्यार्थियों के लिए महत्वपूर्ण विषय बना हुआ है। इसकी खासियत केवल यह नहीं थी कि कांग्रेस ने अंग्रेजों से भारत छोड़ने की मांग की, बल्कि यह भी था कि शीर्ष नेतृत्व की तत्काल गिरफ्तारी के बावजूद आंदोलन देश के अनेक हिस्सों में स्थानीय नेतृत्व और आम जनता के बल पर आगे बढ़ा।
आखिर क्यों पड़ी भारत छोड़ो आंदोलन की जरूरत?
भारत छोड़ो आंदोलन अचानक शुरू नहीं हुआ था। इसके पीछे कई वर्षों से चल रही राजनीतिक परिस्थितियां, ब्रिटिश शासन की नीतियां और द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान भारत की स्थिति जिम्मेदार थी। वर्ष 1939 में ब्रिटेन ने भारत को भारतीय नेताओं से व्यापक राजनीतिक सहमति लिए बिना द्वितीय विश्व युद्ध में शामिल कर दिया। कांग्रेस इससे असंतुष्ट थी और ब्रिटिश सरकार से भारतीयों को वास्तविक राजनीतिक अधिकार देने की मांग लगातार बढ़ती गई।
युद्ध के दौरान भारत से सैनिकों, संसाधनों और आर्थिक सहयोग की अपेक्षा की जा रही थी, लेकिन स्वतंत्रता के प्रश्न पर ब्रिटिश सरकार तत्काल निर्णायक कदम उठाने को तैयार नहीं थी। 1942 में जापान की सेनाओं के दक्षिण-पूर्व एशिया में तेजी से आगे बढ़ने और भारत की पूर्वी सीमाओं तक युद्ध का खतरा पहुंचने से स्थिति और गंभीर हो गई। ऐसे समय में ब्रिटेन को भारत का सहयोग चाहिए था, लेकिन भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन तत्काल स्वतंत्रता की मांग पर जोर दे रहा था।
क्रिप्स मिशन की असफलता ने बढ़ाया असंतोष
भारत छोड़ो आंदोलन के तत्काल कारणों में क्रिप्स मिशन की असफलता को महत्वपूर्ण माना जाता है। ब्रिटिश सरकार ने मार्च 1942 में सर स्टैफर्ड क्रिप्स को भारत भेजा। उद्देश्य था कि युद्ध के दौरान भारतीय राजनीतिक दलों का सहयोग हासिल किया जाए और भविष्य की संवैधानिक व्यवस्था पर सहमति बनाई जाए।
क्रिप्स प्रस्ताव में युद्ध के बाद भारत को डोमिनियन स्टेटस देने की बात थी, लेकिन कांग्रेस तत्काल और वास्तविक स्वतंत्रता की मांग कर रही थी। प्रस्ताव में भारतीय संघ से अलग होने की संभावना का प्रावधान भी था, जिसे कांग्रेस ने स्वीकार नहीं किया। बातचीत विफल रही और क्रिप्स मिशन वापस लौट गया। इसके बाद कांग्रेस के भीतर यह भावना मजबूत हुई कि ब्रिटिश सरकार स्वतंत्रता का प्रश्न युद्ध के बाद तक टालना चाहती है।
महात्मा गांधी ने क्रिप्स प्रस्ताव की आलोचना करते हुए उसे प्रसिद्ध रूप से ऐसे ‘पोस्ट-डेटेड चेक’ से जोड़ा था, जिसका भुगतान भविष्य में होना था। यही कारण है कि प्रतियोगी परीक्षाओं में अक्सर यह पूछा जाता है कि गांधी ने किस मिशन के प्रस्ताव को इस उपमा से जोड़ा था—इसका उत्तर है क्रिप्स मिशन।
14 जुलाई से 8 अगस्त तक कैसे तैयार हुई आंदोलन की जमीन?
भारत छोड़ो आंदोलन की औपचारिक पृष्ठभूमि जुलाई 1942 में तैयार हुई। कांग्रेस कार्यसमिति ने 14 जुलाई 1942 को वर्धा में प्रस्ताव पारित करते हुए ब्रिटिश शासन को भारत से समाप्त करने की मांग रखी। नेहरू आर्काइव में सुरक्षित इस प्रस्ताव में कहा गया था कि विदेशी शासन की समाप्ति भारत और विश्व दोनों के हित में आवश्यक है। प्रस्ताव में आगे बड़े पैमाने पर जन-आंदोलन की दिशा में बढ़ने की बात थी।
इसके बाद अगस्त में मुंबई में अखिल भारतीय कांग्रेस समिति की बैठक हुई। 8 अगस्त 1942 को भारत छोड़ो प्रस्ताव को मंजूरी मिली। इसी मंच से गांधी ने निर्णायक संघर्ष का आह्वान किया। भारत सरकार के अभिलेख भी 8 अगस्त 1942 को मुंबई के गोवालिया टैंक मैदान से ‘करो या मरो’ के आह्वान को आंदोलन की निर्णायक शुरुआत से जोड़ते हैं।
9 अगस्त की सुबह ही क्यों बन गई इतिहास की सबसे बड़ी घटनाओं में से एक?
भारत छोड़ो प्रस्ताव पारित होने के कुछ ही घंटों बाद ब्रिटिश सरकार ने कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व के खिलाफ कार्रवाई शुरू कर दी। 9 अगस्त की सुबह महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, सरदार वल्लभभाई पटेल, मौलाना अबुल कलाम आजाद समेत कांग्रेस के अनेक प्रमुख नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया। सरकार को उम्मीद थी कि नेतृत्व को जेल में डालकर आंदोलन को नियंत्रित किया जा सकेगा, लेकिन परिस्थितियां इसके उलट चली गईं।
नेताओं की गिरफ्तारी के बाद आंदोलन का नेतृत्व कई जगह स्थानीय कार्यकर्ताओं, युवाओं, समाजवादियों और भूमिगत संगठनों ने संभाला। यही भारत छोड़ो आंदोलन की सबसे महत्वपूर्ण विशेषताओं में से एक बनी। आंदोलन का कोई एक केंद्रीकृत नेतृत्व लंबे समय तक सक्रिय नहीं रहा, फिर भी देश के विभिन्न हिस्सों में विरोध, हड़ताल, प्रदर्शन और भूमिगत गतिविधियां जारी रहीं।
अरुणा आसफ अली ने फहराया तिरंगा, बनीं ‘अगस्त क्रांति की नायिका’
भारत छोड़ो आंदोलन में अरुणा आसफ अली की भूमिका विशेष रूप से उल्लेखनीय है। 9 अगस्त 1942 को जब कांग्रेस के प्रमुख नेता गिरफ्तार हो चुके थे, तब उन्होंने गोवालिया टैंक मैदान में तिरंगा फहराया और आंदोलन के उत्साह को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसी कारण उन्हें ‘अगस्त क्रांति की नायिका’ के रूप में याद किया जाता है। अमर उजाला की ओर से दिए गए प्रतियोगी परीक्षा संबंधी प्रश्नों में भी यह तथ्य प्रमुखता से शामिल है।
अरुणा आसफ अली के साथ-साथ जयप्रकाश नारायण, राम मनोहर लोहिया और अन्य समाजवादी कार्यकर्ताओं ने भूमिगत रहकर आंदोलन को आगे बढ़ाने में भूमिका निभाई। इससे स्पष्ट होता है कि शीर्ष नेतृत्व की गिरफ्तारी के बाद भी स्वतंत्रता आंदोलन की ऊर्जा समाप्त नहीं हुई थी।
‘भारत छोड़ो’ नारा किसने दिया था?
भारत छोड़ो आंदोलन से जुड़ा एक महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि ‘Quit India’ का नारा यूसुफ मेहरअली से जुड़ा है। वह समाजवादी नेता और स्वतंत्रता सेनानी थे। भारत सरकार के आजादी का अमृत महोत्सव अभिलेख में भी यूसुफ मेहरअली के इस योगदान का उल्लेख है। उन्होंने ‘Quit India’ को एक स्पष्ट राजनीतिक मांग के रूप में लोकप्रिय बनाने में भूमिका निभाई।
यह तथ्य प्रतियोगी परीक्षाओं में अक्सर भ्रम पैदा करता है, क्योंकि आंदोलन का सबसे प्रसिद्ध संदेश ‘करो या मरो’ महात्मा गांधी से जुड़ा है। इसलिए दोनों में अंतर याद रखना जरूरी है ‘Quit India’ नारे का श्रेय यूसुफ मेहरअली को दिया जाता है, जबकि ‘करो या मरो’ का आह्वान गांधी ने किया था।
भूमिगत कांग्रेस रेडियो ने कैसे पहुंचाई आंदोलन की आवाज?
ब्रिटिश सरकार ने आंदोलन के दौरान प्रेस और संचार पर कड़ा नियंत्रण लगाया था। ऐसे समय में उषा मेहता और उनके साथियों ने भूमिगत ‘कांग्रेस रेडियो’ के माध्यम से आंदोलन की खबरें और संदेश जनता तक पहुंचाने का प्रयास किया। यह रेडियो ब्रिटिश सेंसरशिप के बीच स्वतंत्र सूचना के एक महत्वपूर्ण माध्यम के रूप में सामने आया। हाल के ऐतिहासिक पुनरावलोकनों में भी उषा मेहता की इस भूमिका को भारत छोड़ो आंदोलन के महत्वपूर्ण अध्याय के रूप में रेखांकित किया गया है।
उषा मेहता की कहानी यह बताती है कि भारत छोड़ो आंदोलन केवल बड़े राजनीतिक नेताओं का आंदोलन नहीं था। इसमें विद्यार्थियों, युवाओं, महिलाओं और स्थानीय कार्यकर्ताओं ने भी जोखिम उठाकर भाग लिया।
आंदोलन के दौरान बनीं समानांतर सरकारें
भारत छोड़ो आंदोलन का प्रभाव केवल प्रदर्शन और हड़ताल तक सीमित नहीं रहा। देश के कुछ क्षेत्रों में ब्रिटिश प्रशासन के समानांतर स्थानीय शासन व्यवस्थाएं स्थापित करने के प्रयास हुए। बलिया, सतारा और तमलुक ऐसे महत्वपूर्ण उदाहरण हैं जिन्हें भारत छोड़ो आंदोलन के संदर्भ में पढ़ा जाता है।
बलिया में चित्तू पांडेय के नेतृत्व में समानांतर प्रशासन की कोशिश हुई। महाराष्ट्र के सतारा में ‘प्रति सरकार’ के नाम से समानांतर व्यवस्था लंबे समय तक चर्चा में रही। बंगाल के तमलुक क्षेत्र में भी स्थानीय समानांतर प्रशासन का प्रयास हुआ। इसलिए प्रतियोगी परीक्षाओं में ‘समानांतर सरकार’ या ‘Parallel Government’ से संबंधित प्रश्न महत्वपूर्ण माने जाते हैं। अमर उजाला के प्रश्नोत्तर में बलिया को भी इसी संदर्भ में पूछा गया है।
मातंगिनी हाजरा का बलिदान भी आंदोलन की पहचान बना
भारत छोड़ो आंदोलन में महिलाओं की भागीदारी का एक अत्यंत मार्मिक उदाहरण मातंगिनी हाजरा हैं। बंगाल के तमलुक क्षेत्र में उन्होंने तिरंगा लेकर जुलूस का नेतृत्व किया। ब्रिटिश पुलिस की गोलीबारी में वे शहीद हो गईं। उनकी उम्र उस समय 70 वर्ष से अधिक थी और उन्हें स्वतंत्रता आंदोलन में साहस और बलिदान की मिसाल के रूप में याद किया जाता है। अमर उजाला के संबंधित प्रश्न में उनकी उम्र 73 वर्ष बताई गई है और तमलुक की घटना को प्रतियोगी परीक्षा के महत्वपूर्ण तथ्य के रूप में रखा गया है।
मातंगिनी हाजरा की कहानी इस बात का प्रमाण है कि भारत छोड़ो आंदोलन में उम्र या सामाजिक स्थिति भागीदारी की सीमा नहीं बनी। देश के अलग-अलग हिस्सों में सामान्य नागरिक भी औपनिवेशिक शासन के खिलाफ संघर्ष में शामिल हुए।
क्या भारत छोड़ो आंदोलन पूरी तरह अहिंसक रहा?
भारत छोड़ो आंदोलन की वैचारिक पृष्ठभूमि गांधी के नेतृत्व वाले अहिंसक जनसंघर्ष की थी। कांग्रेस ने ब्रिटिश शासन से भारत छोड़ने की मांग की और गांधी ने जनशक्ति तथा सत्याग्रह पर जोर दिया। लेकिन नेताओं की गिरफ्तारी के बाद कई क्षेत्रों में आंदोलन हिंसक रूप भी लेने लगा। रेलवे लाइनें, डाकघर, संचार व्यवस्था और सरकारी प्रतिष्ठान विरोध के निशाने बने। ब्रिटिश सरकार ने इसे दबाने के लिए व्यापक गिरफ्तारियां, पुलिस कार्रवाई और दमन का सहारा लिया।
इसलिए इतिहास में भारत छोड़ो आंदोलन को समझते समय उसके गांधीवादी मूल उद्देश्य और आंदोलन के दौरान विभिन्न क्षेत्रों में घटित घटनाओं के बीच अंतर करना आवश्यक है। आंदोलन का आधिकारिक राजनीतिक आह्वान अहिंसक जनसंघर्ष पर आधारित था, लेकिन नेतृत्व के अचानक जेल जाने के बाद कई जगह घटनाएं नियंत्रण से बाहर चली गईं।
आंदोलन का तत्काल परिणाम क्या रहा?
ब्रिटिश सरकार ने भारी दमन के जरिए आंदोलन को नियंत्रित किया। कांग्रेस के शीर्ष नेता लंबे समय तक जेल में रहे और प्रेस पर सेंसरशिप लागू रही। फिर भी आंदोलन ने ब्रिटिश शासन को यह संकेत दे दिया कि भारत में औपनिवेशिक शासन को अनिश्चितकाल तक बनाए रखना संभव नहीं होगा।
भारत छोड़ो आंदोलन के तुरंत बाद भारत स्वतंत्र नहीं हुआ। स्वतंत्रता करीब पांच वर्ष बाद 15 अगस्त 1947 को मिली। फिर भी 1942 का आंदोलन स्वतंत्रता संघर्ष के अंतिम बड़े जनआंदोलनों में शामिल रहा और उसने स्वतंत्रता की मांग को निर्णायक राजनीतिक दबाव में बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। भारत सरकार के आजादी का अमृत महोत्सव अभिलेख भी इसे ब्रिटिश शासन के खिलाफ निर्णायक चरणों में से एक के रूप में प्रस्तुत करता है।
प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए याद रखें ये महत्वपूर्ण तथ्य
भारत छोड़ो आंदोलन इतिहास के साथ-साथ UPSC, SSC, रेलवे, बैंकिंग, राज्य लोक सेवा आयोग और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं में सामान्य ज्ञान एवं भारतीय इतिहास के महत्वपूर्ण अध्यायों में शामिल है। इससे जुड़े सवाल केवल तारीख पर आधारित नहीं होते, बल्कि नारे, नेता, स्थान, क्रिप्स मिशन, भूमिगत गतिविधियों और समानांतर सरकारों से भी प्रश्न पूछे जा सकते हैं।
महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर
प्रश्न 1: भारत छोड़ो आंदोलन का ऐतिहासिक प्रस्ताव कब पारित हुआ था? उत्तर: 8 अगस्त 1942।
प्रश्न 2: भारत छोड़ो आंदोलन का प्रस्ताव किस संगठन के अधिवेशन में पारित हुआ? उत्तर: अखिल भारतीय कांग्रेस समिति (AICC) के बॉम्बे अधिवेशन में।
प्रश्न 3: भारत छोड़ो आंदोलन का सबसे प्रसिद्ध नारा क्या था? उत्तर: ‘करो या मरो’, जिसका आह्वान महात्मा गांधी ने किया था।
प्रश्न 4: ‘Quit India’ नारा किससे जुड़ा है? उत्तर: यूसुफ मेहरअली।
प्रश्न 5: भारत छोड़ो आंदोलन की शुरुआत से जुड़ा प्रमुख मैदान कौन-सा था? उत्तर: मुंबई का गोवालिया टैंक मैदान, जिसे अब अगस्त क्रांति मैदान कहा जाता है।
प्रश्न 6: 9 अगस्त 1942 को गोवालिया टैंक मैदान में तिरंगा किसने फहराया था? उत्तर: अरुणा आसफ अली।
प्रश्न 7: क्रिप्स मिशन भारत कब आया था? उत्तर: 1942 में, द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान।
प्रश्न 8: भारत छोड़ो आंदोलन से जुड़ा भूमिगत कांग्रेस रेडियो किससे संबंधित है? उत्तर: उषा मेहता।
प्रश्न 9: भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान समानांतर सरकार का प्रमुख उदाहरण किस स्थान से जुड़ा है? उत्तर: बलिया, उत्तर प्रदेश; इसके अलावा सतारा और तमलुक भी महत्वपूर्ण उदाहरण हैं।
प्रश्न 10: भारत छोड़ो आंदोलन का दूसरा लोकप्रिय नाम क्या है? उत्तर: अगस्त क्रांति या अगस्त आंदोलन।
प्रश्न 11: भारत छोड़ो आंदोलन से संबंधित 14 जुलाई 1942 का प्रस्ताव किस संस्था ने पारित किया था? उत्तर: कांग्रेस कार्यसमिति ने वर्धा में यह प्रस्ताव पारित किया था।
प्रश्न 12: भारत की पहली महिला मुख्यमंत्री कौन थीं, जिनका संबंध स्वतंत्रता आंदोलन से भी रहा? उत्तर: सुचेता कृपलानी। वे 1963 में उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बनीं।
इतिहास से वर्तमान तक क्या देता है भारत छोड़ो आंदोलन का संदेश?
भारत छोड़ो आंदोलन का महत्व केवल स्वतंत्रता संग्राम की एक तारीख याद करने तक सीमित नहीं है। यह उस दौर की सामूहिक राजनीतिक चेतना, जनभागीदारी और त्याग का उदाहरण है, जब शीर्ष नेतृत्व की गिरफ्तारी के बावजूद देश के अलग-अलग हिस्सों में लोगों ने अपने स्तर पर संघर्ष जारी रखा।
इस आंदोलन से यह भी समझ में आता है कि किसी बड़े राष्ट्रीय संघर्ष को केवल कुछ नेताओं के नाम से नहीं समझा जा सकता। गांधी, नेहरू, पटेल और मौलाना आजाद जैसे राष्ट्रीय नेताओं के साथ अरुणा आसफ अली, उषा मेहता, मातंगिनी हाजरा, यूसुफ मेहरअली, जयप्रकाश नारायण और राम मनोहर लोहिया जैसे अनेक लोगों की भूमिकाएं इस इतिहास को व्यापक बनाती हैं।
8 अगस्त 1942 को मुंबई से उठी भारत छोड़ो आंदोलन की आवाज ने भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष को निर्णायक चरण में पहुंचा दिया। ‘करो या मरो’ का आह्वान, 9 अगस्त की व्यापक गिरफ्तारियां, भूमिगत आंदोलन, कांग्रेस रेडियो, समानांतर सरकारों और आम नागरिकों के संघर्ष ने इसे भारतीय इतिहास के सबसे महत्वपूर्ण जनआंदोलनों में शामिल कर दिया।
2026 में इसकी 84वीं वर्षगांठ पर भारत छोड़ो आंदोलन को याद करना केवल अतीत को दोहराना नहीं है, बल्कि यह समझना भी है कि स्वतंत्रता लंबे संघर्ष, सामूहिक भागीदारी और असंख्य ज्ञात-अज्ञात लोगों के त्याग से हासिल हुई थी। प्रतियोगी परीक्षाओं की दृष्टि से भी इसकी तारीख, स्थान, प्रमुख नेता, नारे, क्रिप्स मिशन और समानांतर सरकारों से जुड़े तथ्य विशेष रूप से महत्वपूर्ण हैं।






