
संवाद 24, नागपुर। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने कहा है कि आज के समय में केवल शारीरिक स्वास्थ्य पर ध्यान देना पर्याप्त नहीं है, बल्कि मानसिक स्वास्थ्य को भी समान प्राथमिकता देना आवश्यक है। उनका कहना था कि नई पीढ़ी में बढ़ते अकेलेपन, मानसिक तनाव और जीवन की छोटी-छोटी चुनौतियों के सामने टूट जाने की प्रवृत्ति समाज के लिए गंभीर चिंता का विषय है। इस चुनौती का समाधान केवल चिकित्सा व्यवस्था से नहीं, बल्कि परिवार, समाज और भारतीय जीवन मूल्यों पर आधारित संवाद संस्कृति से संभव है। उन्होंने यह विचार रविवार को नागपुर में समर्पण वेलनेस सेंटर के लोकार्पण कार्यक्रम के दौरान व्यक्त किए। मानसिक स्वास्थ्य को लेकर विश्व स्तर पर बढ़ती चिंताओं के बीच उनका यह संबोधन भारतीय सामाजिक संरचना और पारिवारिक मूल्यों की प्रासंगिकता को रेखांकित करने वाला माना जा रहा है।
‘बच्चा रोए तो मोबाइल नहीं, संवाद दीजिए’
डॉ. भागवत ने अपने संबोधन में आधुनिक पारिवारिक जीवन की बदलती तस्वीर पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि आज अधिकांश परिवारों में बच्चों के साथ संवाद की जगह मोबाइल फोन ने ले ली है। उन्होंने कहा कि जब बच्चा रोता है तो उसे शांत कराने के लिए उसके हाथ में मोबाइल थमा दिया जाता है, जबकि वास्तव में उसे माता-पिता के स्नेह, समय और संवाद की आवश्यकता होती है। उनका कहना था कि बचपन में विकसित होने वाले अनुभव ही आगे चलकर व्यक्ति के व्यक्तित्व और मानसिक संतुलन की नींव बनते हैं। यदि परिवार बच्चों के साथ समय नहीं बिताएगा तो उनका भावनात्मक विकास प्रभावित होगा।
छोटी असफलताओं पर टूट रहे युवा, समाज के लिए चेतावनी
सरसंघचालक ने कहा कि वर्तमान समय में ऐसी घटनाएं बढ़ रही हैं, जिनमें बारहवीं की परीक्षा में असफल होने, माता-पिता की डांट पड़ने या अन्य सामान्य परिस्थितियों के कारण भी युवा आत्महत्या जैसा गंभीर कदम उठा लेते हैं। उन्होंने कहा कि यह केवल व्यक्तिगत समस्या नहीं, बल्कि पूरे समाज के सामने खड़ी मानसिक चुनौती है। उनका मानना है कि बच्चों और युवाओं में ऐसा मन विकसित करना होगा जो जीवन के उतार-चढ़ाव और कठिन परिस्थितियों का धैर्यपूर्वक सामना कर सके। इसके लिए परिवार और समाज दोनों को मिलकर सकारात्मक वातावरण तैयार करना होगा।
दादी-नानी की कहानियां केवल मनोरंजन नहीं, मानसिक संस्कार भी थीं
डॉ. भागवत ने भारतीय परिवार व्यवस्था का उल्लेख करते हुए कहा कि पहले संयुक्त परिवारों में दादी-नानी बच्चों को कहानियां सुनाया करती थीं। इन कहानियों के माध्यम से बच्चों में धैर्य, साहस, नैतिकता और जीवन के मूल्य सहज रूप से विकसित होते थे। आज संयुक्त परिवारों के कम होने और डिजिटल माध्यमों के बढ़ते प्रभाव के कारण यह परंपरा तेजी से समाप्त होती जा रही है। उन्होंने कहा कि केवल तकनीक से बच्चों का समग्र विकास संभव नहीं है। परिवार में संवाद, संस्कार और आत्मीयता का वातावरण भी उतना ही आवश्यक है।
ग्रंथों के अध्ययन की परंपरा से मिलती थी मानसिक मजबूती
उन्होंने कहा कि भारतीय समाज में ग्रंथ पढ़ने तथा परिवार में कथा-वाचन की परंपरा केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं थी, बल्कि वह मानसिक और बौद्धिक विकास का भी महत्वपूर्ण माध्यम थी। ऐसी परंपराएं व्यक्ति को जीवन की कठिनाइयों से जूझने की शक्ति देती थीं। उन्होंने संकेत दिया कि आधुनिक जीवनशैली में इन परंपराओं के कमजोर होने का प्रभाव युवाओं के मानसिक स्वास्थ्य पर भी दिखाई दे रहा है। इसलिए समाज को इन सकारात्मक परंपराओं को नए रूप में पुनर्जीवित करने की आवश्यकता है।
‘मन स्वस्थ होगा तभी शरीर भी स्वस्थ रहेगा’
अपने संबोधन में डॉ. भागवत ने स्पष्ट कहा कि स्वास्थ्य का अर्थ केवल रोगमुक्त शरीर नहीं है। यदि मन अस्वस्थ होगा तो उसका प्रभाव शरीर पर भी पड़ेगा। उन्होंने कहा कि शरीर की बीमारी मन को कमजोर करती है और मानसिक असंतुलन व्यक्ति के व्यवहार को भी प्रभावित करता है। अस्वस्थ व्यक्ति शीघ्र क्रोधित हो जाता है तथा निर्णय लेने की क्षमता भी प्रभावित होती है। इसलिए मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य को अलग-अलग नहीं देखा जा सकता।
‘मन ही बंधन और मोक्ष का कारण’
भारतीय दर्शन का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि मनुष्य के जीवन में मन की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहा कि मनुष्य के जन्म के साथ ही मन का निर्माण प्रारंभ हो जाता है और यह उसके अनुभवों के आधार पर विकसित होता है। यदि जीवन में सकारात्मक अनुभव और संस्कार मिलते हैं तो मन मजबूत और संतुलित बनता है, जबकि नकारात्मक अनुभव व्यक्ति को भीतर से कमजोर कर सकते हैं। उन्होंने कहा कि भारतीय चिंतन में मन को ही मनुष्य के बंधन और मोक्ष का कारण बताया गया है। इसलिए मन के निर्माण की प्रक्रिया को समझना और उसे सही दिशा देना अत्यंत आवश्यक है।
भारतीय मनोविज्ञान के अध्ययन की आवश्यकता पर दिया बल
डॉ. भागवत ने कहा कि भारत में मन, चेतना और मानसिक संतुलन को लेकर अत्यंत समृद्ध ज्ञान परंपरा रही है। उन्होंने कहा कि आधुनिक मनोविज्ञान के साथ-साथ भारतीय मनोविज्ञान का भी गंभीर अध्ययन होना चाहिए। भारतीय दर्शन, योग, अध्यात्म और विभिन्न शास्त्रों में मन के स्वरूप तथा उसके विकास पर व्यापक विचार किया गया है। उनका मत था कि यदि इस ज्ञान का वैज्ञानिक अध्ययन और समकालीन संदर्भों में उपयोग किया जाए तो मानसिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान दिया जा सकता है।
‘ज्ञान जितना पूर्ण होगा, समाज का उतना ही होगा कल्याण’
सरसंघचालक ने कहा कि किसी भी शास्त्र या ज्ञान परंपरा का विकास अंततः मानव कल्याण के लिए होना चाहिए। जब ज्ञान पूर्णता की ओर बढ़ता है तो उसका लाभ पूरे समाज को मिलता है। उन्होंने कहा कि मानसिक स्वास्थ्य, चिकित्सा विज्ञान और भारतीय ज्ञान परंपरा के समन्वय से भविष्य में समाज को अधिक प्रभावी दिशा मिल सकती है। उन्होंने इस क्षेत्र में शोध और अध्ययन को प्रोत्साहित करने की आवश्यकता भी बताई।
विश्व स्तर पर भी बढ़ रही है मानसिक स्वास्थ्य की चिंता
विशेषज्ञों का मानना है कि मानसिक स्वास्थ्य आज विश्व स्तर पर सार्वजनिक स्वास्थ्य का एक प्रमुख विषय बन चुका है। डिजिटल जीवनशैली, सामाजिक अलगाव, प्रतिस्पर्धा और पारिवारिक संरचना में बदलाव जैसे कारणों से तनाव, अवसाद और अकेलेपन की समस्याएं बढ़ रही हैं। ऐसे समय में परिवार आधारित संवाद, सामाजिक सहयोग और सकारात्मक जीवन मूल्यों पर आधारित दृष्टिकोण को कई विशेषज्ञ भी महत्वपूर्ण मानते हैं। इसी संदर्भ में डॉ. भागवत का संबोधन भारतीय सामाजिक अनुभवों और पारिवारिक व्यवस्था की भूमिका को सामने लाता है।
परिवार और समाज की साझी जिम्मेदारी का संदेश
अपने संबोधन के अंत में डॉ. मोहन भागवत ने कहा कि नई पीढ़ी को केवल आधुनिक सुविधाएं देना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उन्हें मानसिक रूप से सक्षम, आत्मविश्वासी और संवेदनशील बनाना भी आवश्यक है। उन्होंने कहा कि बच्चों और युवाओं को अकेलेपन से बचाना, उनके साथ नियमित संवाद बनाए रखना तथा परिवार में आत्मीय वातावरण तैयार करना आज समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है। यदि परिवार, समाज और शैक्षणिक संस्थान मिलकर इस दिशा में कार्य करें तो मानसिक रूप से सशक्त, संतुलित और चुनौतियों का सामना करने वाली नई पीढ़ी का निर्माण किया जा सकता है। यही स्वस्थ समाज और विकसित राष्ट्र की मजबूत आधारशिला बनेगा।






