वाशिंगटन को तेहरान का अल्टीमेटम: ‘जब तक शर्तें पूरी नहीं होंगी, तब तक अमेरिका से कोई अंतिम बात नहीं!’

संवाद 24 तेहरान। मध्य पूर्व (Middle East) में लंबे समय से जारी भू-राजनीतिक तनाव और सैन्य टकराव के बीच वैश्विक कूटनीति के गलियारे से एक बहुत बड़ी खबर आ रही है। ईरान ने महाशक्ति अमेरिका (USA) को बेहद कड़े शब्दों में चेतावनी देते हुए स्पष्ट कर दिया है कि वह किसी भी दबाव या धमकी के आगे झुकने वाला नहीं है। ईरानी संसद के प्रमुख और देश के मुख्य वार्ताकार मोहम्मद बागेर गालीबफ (Mohammad Bagher Ghalibaf) ने एक बेहद तल्ख बयान जारी करते हुए साफ कहा है कि जब तक वाशिंगटन प्रशासन दोनों देशों के बीच हुए समझौते के तहत अपनी प्रतिबद्धताओं और शर्तों को पूरी तरह से लागू नहीं करता, तब तक किसी भी तरह की अंतिम शांति वार्ता आगे नहीं बढ़ेगी। ईरान के इस सख्त रुख ने दोनों देशों के बीच शांति बहाली की चल रही कोशिशों पर फिलहाल एक बड़ा सवालिया निशान लगा दिया है।

अंतिम समझौते पर हस्ताक्षर करने से पहले ईरान ने रखी शर्त
ईरानी रणनीतिकारों के अनुसार, अमेरिका के साथ बातचीत का सिलसिला केवल तभी आगे बढ़ सकता है जब अंतरिम समझौते या समझौता ज्ञापन (MoU) के तहत तय किए गए प्रावधानों को पूरी तरह से जमीन पर उतारा जाए। ईरान का कहना है कि पूर्व में दोनों पक्षों के बीच इस्लामाबाद समझौता ज्ञापन (Islamabad MoU) जैसी वार्ताओं के तहत जो सहमति बनी थी, अमेरिका को पहले उसका शत-प्रतिशत पालन करना होगा। ईरान के शीर्ष अधिकारियों का मानना है कि केवल खोखले वादों और मौखिक आश्वासनों के आधार पर कोई भी नया या अंतिम समझौता नहीं किया जाएगा। ईरानी विदेश मंत्रालय के सूत्रों का यह भी कहना है कि अमेरिका को अपनी ईमानदारी साबित करने के लिए पहले उठाये गए कदमों (जैसे तेल बिक्री से जुड़े नियम और प्रतिबंधों की समीक्षा) को पूरी तरह से लागू रखना होगा। जब तक इन प्राथमिक शर्तों का क्रियान्वयन सुनिश्चित नहीं होता, तेहरान अंतिम चरण की वार्ता के मेज पर नहीं बैठेगा।

‘धमकियों के साए में नहीं होगी बातचीत, हमारे पास युद्ध के विकल्प भी तैयार’
ईरानी नेतृत्व ने अमेरिका को चेताते हुए कहा है कि प्रतिबंधों, प्रतिबंधात्मक कदमों या सैन्य धमकियों के साए में कोई भी कूटनीतिक हल नहीं निकाला जा सकता। मुख्य वार्ताकार गालीबफ ने सरकारी मीडिया के माध्यम से संदेश देते हुए कहा कि दुश्मन के शब्दों या खोखले वादों पर भरोसा करने का कोई आधार नहीं है। ईरान की सुरक्षा केवल उसकी अपनी सेना और उसके लोगों के हौसलों पर टिकी है। इसके साथ ही, तेहरान की ओर से यह भी साफ कर दिया गया है कि यदि अमेरिका समझौते का उल्लंघन करता है या किसी भी तरह के सैन्य दबाव का इस्तेमाल करता है, तो ईरान भी चुप नहीं बैठेगा। ईरानी अधिकारियों के अनुसार, देश के पास युद्ध के मैदान में उतरने के नए और बेहद आक्रामक विकल्प पूरी तरह तैयार हैं। वे अपनी संप्रभुता और जनता के अधिकारों की रक्षा के लिए किसी भी हद तक जाने को प्रतिबद्ध हैं।

लेबनान संकट और अरबों डॉलर की फ्रीज संपत्ति भी बनी बड़ी रुकावट
इस पूरे विवाद के पीछे केवल परमाणु कार्यक्रम ही नहीं, बल्कि कुछ अन्य बेहद संवेदनशील क्षेत्रीय मुद्दे भी बड़ी वजह बनकर उभरे हैं। ईरान ने अमेरिका के सामने स्पष्ट किया है कि जब तक लेबनान में चल रहा भीषण सैन्य संघर्ष पूरी तरह समाप्त नहीं हो जाता और वहां से विदेशी सैन्य बलों की पूर्ण वापसी नहीं हो जाती, तब तक किसी व्यापक समझौते की कल्पना नहीं की जा सकती। इसके अलावा, आर्थिक मोर्चे पर भी पेंच फंसा हुआ है। ईरान ने अपनी प्राथमिक मांगों में साफ कहा है कि विभिन्न अंतरराष्ट्रीय बैंकों में फ्रीज (जब्त) की गई उसकी अरबों डॉलर की संपत्तियों को अमेरिका जल्द से जल्द रिलीज करे। तकनीकी वार्ताओं के लिए ईरानी प्रतिनिधिमंडल कतर की राजधानी दोहा जैसी जगहों का रुख भी कर रहा है, ताकि अपनी आर्थिक मांगों को मनवाया जा सके। लेकिन कुल मिलाकर राजनीतिक और सैन्य स्तर पर ईरान के इस ताजा अल्टीमेटम ने जो बाइडन और डोनाल्ड ट्रंप की अमेरिकी रणनीतियों के सामने एक नई और बेहद पेचीदा अंतरराष्ट्रीय चुनौती खड़ी कर दी है।

Madhvi Singh
Madhvi Singh

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